“तपस्या से मिली सत्ता, दंभ से डूबी गाथा”
ममता दीदी के जुझारूपन को सलाम तो बनता है।
कीचड़ से कमल तक का सफर – अपने दम पर।
ना ‘विरासत’ का तमगा, ना ‘परिवारवाद’ का ठप्पा।
सड़क से सचिवालय तक – सिर्फ हौसले की स्याही से लिखी इबारत।
पर इतिहास गवाह है…
रावण ने भी तप किया था। शीश चढ़ाए थे महादेव को।
बल, बुद्धि, वरदान – सब अपनी तपस्या से कमाए थे।
पर जब ‘मैं ही मैं’ का नशा चढ़ा, तो लंका सोने की थी, पर राख हो गई।
क्यों? क्योंकि उसने ‘न्याय’ और ‘सत्ता’ का फर्क मिटा दिया था।
वही चूक यहां भी हुई…
जब लगा कि पूरा तंत्र मुट्ठी में है।
जब लगा कि एक समीकरण वोट-बैंक बन गया है।
जब लगा कि हर आवाज़ ‘पालतू’ है – विधायक से लेकर सिपाही तक।
तब ‘बंगाल’ राज्य नहीं, ‘निजी जागीर’ लगने लगा।
और जागीर में क्या होता है?
शेरनी राज करती है।
भेड़िए पहरे देते हैं। चीलें मंडराती हैं।
और हिरण-खरगोश? वो डरते हैं। सहमते हैं। चुप रहते हैं।
पर जंगल का एक नियम है – चुनाव नाम की आंधी हर 5 साल आती है।
इस बार हवा का रुख बदला था।
‘बड़े जंगल’ से शिकारी आए थे। उन्होंने देखा –
“शेरनी से सिर्फ हिरण नहीं, उसके अपने भेड़िए भी तंग हैं।
चीलें भी अब उड़ते-उड़ते थक गई हैं।”
तो 4 मई के बाद की धमकी काम नहीं आई।
क्योंकि तोता, मैना, बंदर, खरगोश – सबने चुपचाप एक सुर पकड़ लिया।
ना दहाड़ काम आई, ना पंजा।
जंगल ने फैसला सुना दिया – ‘अब बहुत हुआ’।
जो बच गए, वो आज खुद शिकारी का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं।
क्योंकि जंगल का दूसरा नियम है – “डर जब हद से बढ़ जाए, तो वो बगावत बन जाता है।”
असल में पूरा आर्यावर्त करवट ले रहा है।
कहीं विस्तार की बेल फैल रही है…
कहीं सिमटते साए अपना वजूद टटोल रहे हैं…
ये सत्ता का नहीं, समय का चक्र है।
जो खुद को ‘काल’ समझ बैठे, उसे काल ही निगल जाता है।
सीख मिली….
कि तपस्या से सत्ता मिलती है, पर दंभ से चली जाती है।
कि जब शासक खुद को ‘जंगल का राजा’ समझ ले, तो जनता ‘शिकारी’ बन जाती है।
कि लोकतंत्र में कोई ‘अजर-अमर’ नहीं होता। EVM का बटन ही ब्रह्मास्त्र है।
और हां…
शेरनी का सम्मान है, पर जंगल सबका है।
राज वही करता है जो हिरण की धड़कन भी सुन ले।
वरना इतिहास उठाकर देख लो – दशानन भी मिट्टी हुआ, लोकतंत्र में तो ‘एकानन’ की क्या बिसात?



