‼️क्या जंतर मंतर छू मंतर हो चुका है???‼️🥺
_क्या जादूगरों की आड़ में भोपे भी शामिल तो नहीं??_🫢
✍️सुरेन्द्र चतुर्वेदी
जंतर मंतर अब छू मंतर हो चुका है❓या फिर आंदोलन का नया अध्याय शुरू हो चुका है❓🙄
यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि कुछ आंदोलनकारी नेताओं और टीवी की बहसों में लगातार दिखाई देने वाले चेहरों का आरोप है कि समझौते के बावजूद प्रदर्शनकारियों को चुन-चुनकर गिरफ़्तार किया जा रहा है। यदि वास्तव में लिखित समझौते का उल्लंघन करते हुए शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई हो रही है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है। सरकार को अपने हस्ताक्षर की गरिमा बचानी ही होगी।लिखित समझौते का सम्मान केवल कागज़ का नहीं, शासन की विश्वसनीयता का प्रश्न होता है।👍
लेकिन इसी सवाल के साथ एक दूसरा सवाल भी उतनी ही मजबूती से खड़ा होता है। क्या जंतर मंतर पर मौजूद हर व्यक्ति छात्र था❓क्या हर वह चेहरा, जो मंच के आसपास दिखाई दिया, पेपर लीक से पीड़ित युवाओं की लड़ाई लड़ रहा था❓या फिर उस भीड़ में ऐसे लोग भी शामिल थे जिनका छात्र आंदोलन से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था और जिनका आपराधिक या असामाजिक गतिविधियों का रिकॉर्ड पहले से मौजूद है❓🥺
यही वह बिंदु है जहाँ भावनाओं और क़ानून की राह अलग हो जाती है।🙋♂️
पेपर लीक के ख़िलाफ़ छात्रों का आंदोलन न्यायपूर्ण था। लाखों युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ हुआ था। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा इसी जनदबाव का परिणाम माना गया। इस फैसले का स्वागत होना चाहिए। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि आंदोलन की आड़ लेकर यदि कोई असामाजिक तत्व सक्रिय हुआ हो तो उसे भी “आंदोलनकारी” का सुरक्षा कवच दे दिया जाए❓😨
लोकतंत्र प्रदर्शन का अधिकार देता है, अपराध का लाइसेंस नहीं।❌
यदि पुलिस केवल इसलिए किसी व्यक्ति को छोड़ दे कि वह कभी आंदोलन के मंच पर दिखाई दिया था, जबकि उसके ख़िलाफ़ स्वतंत्र और ठोस आपराधिक साक्ष्य मौजूद हैं, तो यह क़ानून के साथ अन्याय होगा।😒
दूसरी ओर यदि पुलिस छात्र नेताओं, निर्दोष प्रदर्शनकारियों और आंदोलन से जुड़े युवाओं को ही निशाना बनाकर समझौते की भावना को तोड़ रही है, तो यह भी उतना ही गंभीर अपराध है।😱
सरकार को साफ़-साफ़ बताना होगा—कितने लोगों पर कार्रवाई केवल आंदोलन में शामिल होने के कारण हुई और कितनों पर उनके पुराने या स्वतंत्र आपराधिक मामलों के आधार पर❓ नाम, तथ्य और आधार सार्वजनिक होने चाहिए। पारदर्शिता ही हर संदेह का सबसे बड़ा जवाब है।👍
आज सबसे बड़ा ख़तरा यही है कि कहीं आंदोलन और अपराध के बीच की रेखा जानबूझकर धुंधली न कर दी जाए। क्योंकि जब अपराधी ख़ुद को आंदोलनकारी घोषित करने लगते हैं और सरकार हर आंदोलनकारी को संदिग्ध मानने लगती है, तब लोकतंत्र दोनों तरफ से घायल होता है।🤨
मैं छात्रों के साथ हूँ। पेपर लीक के ख़िलाफ़ उठी आवाज़ के साथ हूँ। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े का स्वागत करता हूँ। लेकिन मैं उस सोच के साथ नहीं हो सकता जो आंदोलन की पवित्रता को अपराधियों की ढाल बना दे। छात्र और अपराधी एक ही तराज़ू में नहीं तौले जा सकते। दोनों को एक ही चादर से ढंकना सबसे बड़ा अन्याय होगा! छात्रों के साथ भी और कानून के साथ भी।🤷♂️
अब सरकार को तय करना है कि वह क़ानून का राज स्थापित करेगी या संदेह का। और आंदोलन के स्वयंभू ठेकेदारों को भी तय करना होगा कि वे छात्रों की लड़ाई लड़ रहे हैं या हर उस चेहरे की पैरवी कर रहे हैं जो भीड़ का फायदा उठाकर कानून से बच निकलना चाहता है।😯
जंतर मंतर की असली जीत तभी होगी जब निर्दोष छात्र सुरक्षित रहें, दोषी अपराधी बच न सकें और लोकतंत्र यह संदेश दे कि आंदोलन का सम्मान होगा, लेकिन अपराध का कभी नहीं।❌
Diclaimer : इसका हमारी The भारत SSSRK News24x7 समाचार और राष्ट्र दर्शन (सबसे तेज़, सबसे आगे…),
यह एक आंकलन मात्र है…





