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पूर्णिमासी व्रत 30 मई शनिवार क़ो किया जाएगा,पूर्णिमा व्रत कथा महत्व पूजा विधि की अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए हमें संदेश लिखें

अधिमासे नरो व्यास ! तीर्थे पुरुषोत्तमाभिधे।
स्नात्वा दत्त्वा च दानानि तेषां लोकाः सनातनाः॥
जो मनुष्य पुरुषोत्तम मास में पुरुषोत्तम नामक पवित्र तीर्थ या भगवान विष्णु के निमित्त किसी भी पवित्र नदी में स्नान करता है और अपने सामर्थ्य के अनुसार दान देता है, उसे कभी नष्ट न होने वाला परमधाम (वैकुंठ लोक) प्राप्त होता है।

शुभ काम में क्यों बनाई गई नारियल फोड़ने की परंपरा
सनातन धर्म के ज्यादातर धार्मिक संस्कारों में नारियल का विशेष महत्व है। कोई भी व्यक्ति जब कोई नया काम शुरू करता है तो भगवान के सामने नारियल फोड़ता है। चाहे शादी हो, त्योहार हो या फिर कोई महत्वपूर्ण पूजा, पूजा की सामग्री में नारियल आवश्यक रूप से रहता है। नारियल को संस्कृत में श्रीफल के नाम से जाना जाता है।
विद्वानों के अनुसार यह फल बलि कर्म का प्रतीक है। बलि कर्म का अर्थ होता है उपहार या नैवेद्य की वस्तु। देवताओं को बलि देने का अर्थ है, उनके द्वारा की गई कृपा के प्रति आभार व्यक्त करना या उनकी कृपा का अंश के रूप मे देवता को अर्पित करना।
एक समय सनातन धर्म में मनुष्य और जानवरों की बलि सामान्य बात थी। तभी आदि शंकराचार्य ने इस अमानवीय परंपरा को तोड़ा और मनुष्य के स्थान पर नारियल चढ़ाने की शुरुआत की। नारियल कई तरह से मनुष्य के मस्तिष्क से मेल खाता है। नारियल की जटा की तुलना मनुष्य के बालों से, कठोर कवच की तुलना मनुष्य की खोपड़ी से और नारियल पानी की तुलना खून से की जा सकती है। साथ ही, नारियल के गूदे की तुलना मनुष्य के दिमाग से की जा सकती है।

नारियल फोड़ने का महत्व
नारियल फोड़ने का मतलब है कि आप अपने अहंकार और स्वयं को भगवान के सामने समर्पित कर रहे हैं। माना जाता है कि ऐसा करने पर अज्ञानता और अहंकार का कठोर कवच टूट जाता है और ये आत्मा की शुद्धता और ज्ञान का द्वार खोलता है, जिससे नारियल के सफेद हिस्से के रूप में देखा जाता है।

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Author: sssrknews

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