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1962 का युद्ध: जब वीर जवान लड़े, लेकिन राजनीति हार गई

समय था 1962 नवंबर
चीन भारत सीमा पर – माइनस टेंपरेचर,
उससे कुछ ही समय पहले नेहरू अपने भारत देश को मिली वीटो पावर थाली में परोस कर चीन को सौंप चुके थे
“हमें इसकी जरूरत नहीं चीन बड़ा भाई है”
उसी बड़े भाई ने अचानक बॉर्डर पर पीठ में छुरा भोंक दिया था,
नेहरू नेपाल हवाई अड्डे पर उतर रहे थे, ( 1959 में नेपाल के तत्कालीन त्रिभवन साहब का ऑफर ” आप हमारे नेपाल को अपने भारत में मिला लीजिए ” को ठुकरा कर
उन्हें बताया गया कि चीन ने भारत पर हमला कर दिया है, कोई ध्यान नहीं दिया इस बात पर
भारत के पास 08 अक्टूबर 1932 को एयर फोर्स बन चुकी थी जबकि चीन की बनी 11 नवंबर 1949 में

बावजूद इसके वायु सेना को युद्ध में नहीं उतरने दिया गया ,
क्या कहा

“the war will escalete”
युद्ध बढ़ जाएगा

माइनस टेंपरेचर में हमारे वीर जवान कागज जैसे सोल के जूतों में लड़े ( पी टी shoes कहते हैं, हमारी सेना में उन्हें )
कोई स्वेटर जैकेट भी नहीं
गोला बारूद की सप्लाई काट दी गई
खाने की रसद तक नहीं पहुंची
उन तक , 20 अक्टूबर 1962को शुरू हुआ युद्ध 21 नवंबर को लगभग एकतरफा ( क्योंकि चीन ने 62,000 स्क्वायर किलोमीटर हथिया लिया था, जो आज ‘एक्सई चीन है”) उसका उद्देश्य पूरा हो गया था,

जवानों की शहादत और 62,000 स्क्वायर किलोमीटर भूमि अपने (….) चीन को
सौंपने के बाद
संसद में दिया गया जवाब दिल को रूह को आज भी
खंजर सा नश्तर सा चुभ रहा है

“Not a blade of grass grows there”

वहाँ घास का एक तिनका भी नहीं उगता ।

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Author: sssrknews

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