सामूहिकता का अर्थ है – एक-दूसरे पर पारस्परिक निर्भरता, लेकिन हमारा अहंकार हमें सामूहिक नहीं होने देता।
“सामूहिकता एक ऐसी चीज़ है जिसे जितना हमने समझा है, उससे भी कहीं अधिक गहराई से इसे समझना होगा। सामूहिकता में सबसे पहले जब हम यह कहते हैं कि यह शरीर अनेक कोशिकाओं से बना हुआ एक सामूहिक यंत्र है, तब इससे हम क्या समझते हैं? इसमें पहली चीज़ यह है कि सामूहिकता में हमें यह मानना होगा कि यह एक-दूसरे के ऊपर परस्पर निर्भरता है। हमें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। जैसे पुरुष को स्त्री पर निर्भर होना पड़ता है, और स्त्री को पुरुष पर निर्भर रहना पड़ता है।”
“लेकिन जब अहंकार बीच में आ जाता है, तो यह अहंकार केवल आपको एक-दूसरे से अलग ही नहीं करता – और यह केवल यहीं तक ही नहीं रुकता – अपितु यह अहंकार आपको यह भी सिखाता है कि आपको किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहना है। आपको दूसरों पर निर्भर होना पड़ेगा। आपने दूसरों का अनुचित लाभ नहीं उठाना, लेकिन पहली महत्वपूर्ण चीज़ यह है कि आपको दूसरों पर और दूसरे लोगों को आप पर निर्भर होना पड़ेगा।”
प.पू. माताजी श्री निर्मला देवी जी



