20 साल धूप में इडली बेचने वाली मां को लगा बेटा “बस ऑफिस में कुर्सी बदल रहा है,” लेकिन मंच पर उसका नाम गूंजते ही पूरी कंपनी खड़ी हो गई और बेटे ने कहा, “मेरी असली वजह यही हैं।”
जिस दिन सावित्री अपने हाथों में अब भी भाप और चावल के घोल की गंध लिए उस चमचमाते कांच के दफ्तर में पहुंची, उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि कुछ ही मिनटों बाद पूरा सभागार खड़ा होकर तालियां बजाएगा, और मंच पर खड़ा उसका बेटा सबके सामने कहेगा कि वह सिर्फ उसकी मां नहीं, उसकी असली वजह है।
लेकिन उस सुबह की शुरुआत इतनी बड़ी नहीं थी। वह बाकी दिनों जैसी ही थी—सिवाय इसके कि सावित्री ने 20 साल में पहली बार अपना ठेला आधे दिन के लिए बंद किया था।
दिल्ली के बाहरी हिस्से की उस मजदूर बस्ती में लोग उसे “इडली वाली सावित्री” के नाम से जानते थे। सुबह 4 बजे उठना, चूल्हा जलाना, भिगोए चावल-उड़द पीसना, बड़ी भगोनी में सांभर चढ़ाना, नारियल की चटनी घिसना, फिर स्टील के डब्बों में सब भरकर स्कूल, बस अड्डे और फिर औद्योगिक इलाके के बाहर ठेला लगाना—यही उसका जीवन था। बरसात में भीगा हुआ तिरपाल, मई-जून की चिलचिलाती धूप, ट्रैफिक का धुआं, म्युनिसिपैलिटी वालों की डांट, गुंडा टैक्स, और दिन के अंत में मुड़ी-तुड़ी नोटों की गड्डी। उसी से उसने घर चलाया, कर्ज चुकाया, बेटे की फीस भरी, उसके कोचिंग फॉर्म खरीदे, पहली सेकेंड-हैंड लैपटॉप दिलाई और वह काले जूते भी, जिनमें उसका बेटा पहली बार कॉलेज इंटरव्यू देने गया था।
उसका बेटा आरव बचपन से अलग था। कम बोलने वाला। जो चीज भीतर लग जाती, उसे जबड़े भींचकर पूरा करने वाला। जब उसका बाप 1 दूसरी औरत के साथ चला गया था, तब आरव सिर्फ 8 साल का था। उस रात सावित्री ने उसे पहली बार रोते हुए देखा था। अगले दिन वही लड़का उसकी भगोनी उठाकर बोला था, “अम्मा, मैं हूं न।”
वह सचमुच था।
स्कूल से लौटकर ठेले पर बैठना, छुट्टे पैसे गिनना, रात को बर्तन धोते-धोते पढ़ाई करना, फिर स्कॉलरशिप निकाल लेना। धीरे-धीरे उसकी भाषा बदलने लगी। “कॉलेज” की जगह “कैंपस” कहने लगा। “नौकरी” की जगह “प्रोफाइल।” “अफसर” की जगह “लीडरशिप।” सावित्री आधा समझती थी, आधा नहीं। मगर 1 बात समझती थी—उसका बेटा उस सड़क के लिए पैदा नहीं हुआ था जिस पर वह खुद 20 साल से खड़ी थी।
कुछ महीने पहले आरव ने फोन पर बस इतना कहा था, “अम्मा, अगले शुक्रवार मेरी नई जिम्मेदारी का कार्यक्रम है। समय से आना। अच्छे से तैयार होकर आना।”
“अरे, तू है क्या उस कंपनी में? मैनेजर-वैनजर?”
आरव हंस पड़ा था। “बस, समझ लो कुर्सी बदल रही है।”
“कुर्सी बदल रही है मतलब?”
“अम्मा, आप आओ। बाकी वहीं बताऊंगा।”
सावित्री ने ज्यादा नहीं कुरेदा। गरीब मांएं पूछना कम और मान लेना ज्यादा सीख जाती हैं। उसने सोचा, लड़का ऑफिस में थोड़ा ऊपर चढ़ गया होगा। कोई विभागीय जिम्मेदारी मिली होगी। क्या पता 1 कमरा भी मिल गया हो। उसे खुशी हुई। डर भी लगा। बड़े दफ्तर बड़े लोगों के होते हैं। वहां उसके जैसी औरतें मेहमान भी कम ही लगती हैं।
उसने पिछली रात अपनी 1 हल्की क्रीम रंग की साड़ी निकाली, जो उसने सिर्फ 3 बार पहनी थी—1 शादी में, 1 स्कूल समारोह में और 1 बार पड़ोसन के बेटे की सगाई पर। इस्तरी खुद की। ब्लाउज की ढीली हुक खुद टांकी। टैक्सी के लिए 300 रुपए अलग रखे, जबकि इसका मतलब था कि इस हफ्ते वह घर के लिए आधा किलो कम दाल खरीदेगी।
उसे परवाह नहीं थी।
यह उसके बेटे का दिन था।
जब वह दफ्तर पहुंची तो पहले ही कदम पर उसे लगा जैसे वह गलती से किसी और दुनिया में आ गई हो। ऊंची कांच की दीवारें, संगमरमर की चमक, इत्र की महक, तेज़ एसी, चमकीले जूते, अंग्रेजी में बातें करते लोग। उसने रिसेप्शन पर जाकर कहा, “मेरा बेटा आरव मिश्रा यहां काम करता है। उसने बुलाया है।”
रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने पहले उसे देखा, फिर स्क्रीन देखी, फिर अचानक सीधी होकर बोली, “जी मैम, हम आपका इंतजार कर रहे थे।”
“मेरा?”
“जी, कृपया इधर आइए।”
यह सुनते ही सावित्री के कदम डगमगा गए। उसे 1 बड़े सभागार में ले जाया गया। सामने विशाल स्क्रीन थी, नीली रोशनी, फूलों की सजावट, और सबसे आगे लगी आरक्षित सीटें। 1 सीट पर साफ लिखा था—“श्रीमती सावित्री मिश्रा।”
वह घबरा गई। “मैं यहां? आगे?”
प्रोटोकॉल वाला लड़का मुस्कुराया। “सीधे निर्देश हैं, मैडम।”
“किसके?”
“सर के।”
सर।
सावित्री ने गर्दन उठाकर चारों ओर देखा। आरव कहीं नजर नहीं आया। उसके आसपास भारी घड़ियां पहने पुरुष, सलीकेदार साड़ियों में महिलाएं, और 2 पंक्तियां पीछे बैठा 1 आदमी धीमे स्वर में दूसरे से कह रहा था, “आज नए प्रबंध निदेशक का ऐलान है।”
प्रबंध निदेशक।
यह शब्द सावित्री के कानों में अटक गया।
फिर सभागार की लाइटें धीमी हुईं। मंच पर 1 सफेद बालों वाले बड़े अधिकारी आए। उन्होंने कंपनी की वृद्धि, भविष्य, विरासत और नई नेतृत्व यात्रा की बातें शुरू कीं। सावित्री आधा सुन रही थी, आधा चारों तरफ अपने बेटे को ढूंढ रही थी।
और तभी उस अधिकारी ने मुस्कुराकर कहा—
“आज हम सिर्फ अपने नए प्रमुख का स्वागत नहीं करेंगे। आज हम उस मां का भी सम्मान करेंगे, जिसके हाथों की भाप, धूप और त्याग ने इस आदमी को यहां तक पहुंचाया।”
अगले ही पल स्क्रीन बदली।
और उस पर सावित्री का पुराना ठेला दिखाई दिया—नीले तिरपाल वाला, भाप छोड़ती इडली की भगोनी, और पीछे खड़ी वह खुद… छोटी उम्र की, थकी हुई, मगर सीधी… और उसकी कमर से चिपका 10 साल का आरव।
सावित्री का गला बंद हो गया।
तभी मंच के पीछे से उसके बेटे की आवाज़ आई—
“अम्मा… अब छिपना बंद करो। यह सीट किसी मेहमान के लिए नहीं थी। यह आपकी थी। क्योंकि नया प्रबंध निदेशक… मैं हूं।”





