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बिल्ववृक्ष का रहस्य: भगवान शिव का साक्षात स्वरूप क्यों माना जाता है बेल का पेड़?

बिल्ववृक्ष का रहस्य भगवान शिव का साक्षात स्वरूप कैसे है आओ जानें

(बेल के पेड़ के नीचे करें ये उपाय, पाएं अपार लाभ)

परिचय

बिल्ववृक्ष (बेल का पेड़) भगवान शिव का साक्षात स्वरूप माना गया है। शिव पुराण और वनस्पति शास्त्र में इसका विस्तृत महात्म्य वर्णित है। इस वृक्ष में स्वयं भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) तीनों का वास होता है। इसकी सेवा और पूजा से व्यक्ति को अपार लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

गोचर कुंडली मे जिस वर्ष शनि और गुरु दोनों सप्तम भाव या लग्न को देखते हों,तब विवाह के योग बनते हैं।

राहु, केतु और शनि जैसे ग्रहों की दृष्टि या युति विवाह में बाधा डालती है।
शनि का प्रभाव सातवे स्थान पर हो तो विवाह में देरी होती है
उपाय :-*सोमवार से शुरू करके प्रतिदिन तुलसी जी व शालीग्राम जी की पूजा कर 7 परिक्रमा करे।
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बिल्ववृक्ष की महिमा

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2. 68 तीर्थों का फल: इस वृक्ष की एक प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करने से व्यक्ति को 68 तीर्थों के दर्शन और स्नान का पुण्य प्राप्त होता है।
3. पापों का नाश: जानबूझकर किए गए जीव हिंसा के पाप भी इस वृक्ष के पास जाने और इसकी उपासना करने से नष्ट हो जाते हैं।
4. अक्षय फल: इस वृक्ष के नीचे बैठकर कोई भी अनुष्ठान, जप या तप करने से उसका फल अक्षय (कभी न खत्म होने वाला) हो जाता है।
5. दान का महत्व: बिल्ववृक्ष के नीचे किया गया दान कई जन्मों के संचित पापों का नाश कर देता है।

स्पर्श और दर्शन के लाभ

1. स्पर्श मात्र से पाप नाश: इस पवित्र वृक्ष को छूने मात्र से ही मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं।
2. दर्शन का पुण्य: केवल इसके दर्शन करने से भी व्यक्ति को उतना ही पुण्य मिलता है जितना किसी तीर्थयात्रा से मिलता है।
3. शिव पुराण पारायण: इस वृक्ष के नीचे बैठकर शिव पुराण का पाठ करने या “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करने से अपार पुण्य की प्राप्ति होती है।
4. जल अर्पण: बिल्ववृक्ष की जड़ में जल चढ़ाने से शिवलिंग का अभिषेक करने के बराबर पुण्य मिलता है।

घर में बिल्ववृक्ष होने के फल

1. मोक्ष की प्राप्ति: यदि किसी के घर के आंगन में बिल्ववृक्ष होता है, तो उसका मोक्ष निश्चित माना गया है। भगवान शिव की विशेष कृपा उस पर बनी रहती है।
2. ऋषि पद की प्राप्ति: इस वृक्ष के नीचे मिट्टी का शिवलिंग बनाकर 16,000 बार पूजा करने से व्यक्ति ऋषि पद को प्राप्त कर लेता है।
3. शिव का निवास: यदि कोई नया शिवलिंग घर में स्थापित करना चाहता है, तो पहले उसे बिल्ववृक्ष के नीचे 16,000 बार पूजा करके उस शिवलिंग को वहाँ से घर लाना चाहिए। ऐसा करने से भगवान शिव उस घर में सदा के लिए निवास करते हैं।

दान और यज्ञ के फल

1. धन-धान्य में वृद्धि: बिल्ववृक्ष के नीचे बैठकर किसी ब्राह्मण को भोजन कराने से आने वाली कई पीढ़ियों तक घर में धन-धान्य की कमी नहीं रहती।
2. अपार लक्ष्मी: इस वृक्ष के नीचे श्रीसूक्त का यज्ञ या शिव के किसी भी मंत्र का जाप करने से माँ लक्ष्मी की अपार कृपा प्राप्त होती है।

विशेष उपाय और उनके फल

उपाय फल
बिल्ववृक्ष लगाना (बोना) 1 करोड़ शिवालयों का दान करने जितना पुण्य
वृक्ष के नीचे 3 रात (त्रिरात्रि) क्रिया करना सभी घोर पापों का नाश और शिवलोक की प्राप्ति
वृक्ष के नीचे यज्ञ, जप या कथा करना जीवन में सुख-समृद्धि और शांति
बिल्वाष्टकम का पाठ करना भगवान शिव की विशेष कृपा और सभी मनोरथ सिद्ध।

वेद को छोड़ने के दुष्परिणाम

१.मनमानी पूजा पद्धतियां-

पिछले ३० – ४० वर्षों में हिंदुत्व को लेकर व्यावसायिक संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों और राजनीतिज्ञों ने हिंदू धर्म के लोगों को पूरी तरह से गफलत में डालने का जाने-अनजाने भरपूर प्रयास किया, जो आज भी जारी है। हिंदू धर्म की मनमानी व्याख्या और मनमाने नीति-नियमों के चलते खुद को व्यक्ति एक चौराहे पर खड़ा पाता है। समझ में नहीं आता कि इधर जाऊँ या उधर।भ्रमित समाज लक्ष्यहीन हो जाता है। लक्ष्यहीन समाज में मनमाने तरीके से परम्परा का जन्म और विकास होता है, जोकि होता आया है। मनमाने मंदिर बनते हैं, मनमाने देवता जन्म लेते हैं और पूजे जाते हैं। मनमानी पूजा पद्धति, चालीसाएँ, प्रार्थनाएँ विकसित होती है। व्यक्ति पूजा का प्रचलन जोरों से पनपता है। ईश्वर को छोड़कर संत, कथावाचक या पोंगा पंडितों को पूजने का प्रचलन बढ़ता है।

२ . धर्म का अपमान :

आए दिन धर्म का मजाक उड़ाया जाता है, मसलन कि किसी ने लिख दी लालू चालीसा, किसी ने बना दिया अमिताभ का मंदिर। रामलीला करते हैं और राम के साथ हनुमानजी का भी मजाक उड़ाया जाता है। राम के बारे में कुतर्क किया जाता है, कृष्ण पर चुटकुले बनते हैं। दुर्गोत्सव के दौरान दुर्गा की मूर्ति के पीछे बैठकर शराब पी जाती हैं आदि अनेकों ऐसे उदाहरण है तो रोज देखने को मिलते हैं। एक कथा वाचक कहता है स्त्रियों को दंडवत् प्रणाम नहीं करना चाहिए उनके स्तनों से धरती ढोल जाएगी। एक कहता है स्त्रियों को गायत्री मंत्र नहीं पढ़ना चाहिए दुसरा कहता स्त्रियाँ अशुद्ध होती है यज्ञोपवित नही डाल सकती । अगर प्रश्न करें कि ऐसा क्यों तो कोई संतोष जनक उत्तर नहीं होता। एक कहेगा सोमवार को यह न करें मंगल को यह करें वैसा न करे वीरानापन को गाय को रोटी खिलायें क्या बाक़ी दिन भूखी मारें शनिवार को काले कुत्ते को रोटी दे क्या बकवास मचा रखी है इन पोंगा पंडितों और कथा वाचकों ने।
गीता को पढ़ने और जीवन में ढालने की शिक्षा देने की अपेक्षा अब तो कथावाचक चौराहों पर हर माह लाखों रू० खर्च करवा कर और लेकर भागवत कथा का आयोजन करते हैं। यज्ञ के महत्व को समझे बगैर वेद विरुद्ध यज्ञ किए जाते हैं और अब तमाम वह सारे उपक्रम नजर आने लगे हैं जिनका सनातन धर्म से कोई वास्ता नहीं है।

३ .बाबाओं के चमचे
अनुयायी होना दूसरी आत्महत्या है।’- ॐ को छोड़कर आज का युवा अपने-अपने बाबाओं के लॉकेट को गले में लटकाकर घुमते रहते हैं। उसे लटकाकर वे क्या घोषित करना चाहते हैं यह तो हम नहीं जानते या उनका मुफ़्त में प्रचार करना है। लेकिन कुछ युवा तो नौकरी या व्यावसायिक हितों के चलते उक्त संत या बाबाओं से जुड़ते हैं लेकिन इन्हीं कुछ बाबाओं के जीवन में इतने दुख और भय हैं कि हाथ में चार-चार अँगूठी, गले में लॉकेट, ताबीज और न जाने क्या-क्या। गुरु को भी पूजो, भगवान को भी पूजो और ज्योतिष जो कहे उसको भी, सब तरह के उपक्रम कर लो…धर्म के विरुद्ध जाकर भी कोई कार्य करना पड़े तो वह भी कर लो।समाज बाबाओं में बंट गया धार्मिक एकता रही कहाँ ?

४ . मनमानी व्याख्या के संगठन :

पहले ही भ्रम का जाल था कुछ संगठनों ने और भ्रम फैला रखा है उनके अनुसार ब्रह्म सत्य नहीं है शिव सत्य है और शंकर अलग है। अभी तक यह निर्णय नहीं हो सका की ब्रह्मा विष्णु महेश देवी में कौन सब से बड़ा है। एक पुराण दुसरी पुराण निंदा करती है,अभी तक यह निर्णय नहीं हुआ कि कौन सी पुराण सर्व श्रेष्ठ है राधा कौन है श्री कृष्ण की पत्नी राधा है या रूकमणी यह मसला नहीं सुलझ रहा। एक संत या संगठन गीता के बारे में कुछ कहता है, तो दूसरा कुछ ओर। एक राम को भगवान मानता है तो दूसरा महापुरूष। हालाँकि राम और कृष्ण को छोड़कर अब लोग शनि की शरण में रहने लगे हैं।वेद, पुराण और गीता की मनमानी व्याख्याओं के दौर से मनमाने रीति-रिवाज और पूजा-पाठ विकसित होते गए। लोग अनेकों संप्रदाय में बँटते गए और बँटते जा रहे हैं। संत निरंकारी संप्रदाय, ब्रह्माकुमारी संगठन, जय गुरुदेव, गायत्री परिवार, कबिर पंथ, साँई पंथ, राधास्वामी मत आदि अनेकों संगठन और सम्प्रदाय में बँटा हिंदू समाज वेद को छोड़कर भ्रम की स्थिति में नहीं है तो क्या है?संप्रदाय तो सिर्फ दो ही थे- शैव और वैष्णव। फिर इतने सारे संप्रदाय कैसे और क्यूँ हो गए। प्रत्येक संत अपना नया संप्रदाय बनाना क्यूँ चाहता है? क्या भ्रमित नहीं है आज का हिंदू?
इन लोगों ने वैदिक विकासवाद के सारे सिद्धांत और समय व गणित की धारणा को ताक में रख दिया है।

५ . धर्म या जीवन पद्धति :

हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है- ये वाक्य बहुत सालों से बहुत से लोग और संगठन प्रचारित करते रहे हैं। इस्लाम, ईसाई, बौद्ध और जैन सभी सम्प्रदाय है। धर्म अर्थात आध्यात्मिक मार्ग, मोक्ष मार्ग। धर्म अर्थात जो सबको धारण किए हुए हो।
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियं आत्मनः |
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ||१३१|| [२|१२] (६८)
अर्थात – ‘‘श्रुंति – वेद, स्मृति – वेदानुकूल सत्पुरूषों का आचार जो सनातन अर्थात् वेद द्वारा परमेश्वर प्रतिपादित कर्म को धर्म कहा गया है।
लेकिन हिंदुत्व तो धर्म नहीं है। जब धर्म नहीं है तो उसके कोई पैगंबर और अवतारी भी नहीं हो सकते। उसके धर्मग्रंथों को फिर धर्मग्रंथ कहना छोड़ो, उन्हें जीवन ग्रंथ कहो। धर्म ही लोगों को जीवन जीने की पद्धति बताता है, अधर्म नहीं।

वेद बुलाते हैं तुम्हें :

वेदो अखिलो धर्ममूलम्- अर्थात सब धर्मों का मूल वेद है। वेद ही एकमात्र ऐसा धर्मग्रन्थ है जो उपदेश देता है कि और कुछ नहीं ‘तू मनुष्य बन क्योंकि मनुष्य बनने पर तो सारा संसार ही तेरा परिवार होगा’ । संसार का कोई अन्य तथाकथित धर्म-ग्रन्थ इसकी तुल्यता नहीं कर सकता। वेद का सन्देश संकीर्णता,संकुचितता, पक्षपात, घृणा जातीयता,प्रान्तीयता और साम्प्रदायिकता से कहीं ऊंचा है।
वेदों में धर्म, योग, विज्ञान, जीवन, समाज और ब्रह्मांड की उत्पत्ति, पालन और संहार का विस्तृत उल्लेख है। विद्वानों अनुसार ‘वेद’ ही हिंदुओं के धर्मग्रंथ थे और हैं। आज फिर आवश्यकता है लौटें वेदों कि ओर सभी मत संमप्रदायो को जोड़े वेदों के साथ।

त्रिक भाव क्या होता है? कुण्डली में क्यों माना जाता है खतरनाक

वैदिक ज्योतिष में हर कुंण्डली में 12 भाव होते हैं, जिनमें 6वां, 8वां और 12वां भाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं इन्हें त्रिक भाव या दुष्ट भाव कहा जाता है.
माना जाता है कि ये भाव जीवन में संघर्ष, बाधाएं, स्वास्थ्य समस्याएं और आर्थिक उतार-चढ़ाव से जुड़े होते हैं इन तीनों भावों को कई बार ‘कुण्डली का छिद्र’ भी कहा जाता है, क्योंकि ये व्यक्ति के जीवन में छुपी हुई समस्याओं और अचानक आने वाली चुनौतियों का संकेत देते हैं।
जब इन भावों का प्रभाव कमजोर या अशुभ होता है, तो जातक को मानसिक तनाव, धन संबंधी परेशानियां और स्वास्थ्य संकटों का सामना करना पड़ सकता है इसी वजह से त्रिक भावों का अध्ययन ज्योतिष में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि ये जीवन के कठिन पहलुओं और उनके संभावित समाधान को समझने में मदद करते हैं।
कुण्डली का छठा भाव क्या कहता है
संघर्ष, रोग और शत्रु पक्ष (छठा भाव)
कुण्डली का छठा भाव रोग, शत्रु, कर्ज, कानूनी विवाद और कार्यस्थल के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है जब यह भाव कमजोर या पीड़ित होता है, तो व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, मानसिक तनाव और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है यह भाव व्यक्ति की संघर्ष क्षमता और कठिन परिस्थितियों से लड़ने की ताकत को भी दर्शाता है।

आठवां भाव कुण्डली का सबसे गूढ़ और रहस्यमयी
रहस्य, संकट और परिवर्तन (आठवां भाव)
आठवां भाव कुंण्डली का सबसे गूढ़ और रहस्यमयी भाव माना जाता है यह अचानक होने वाले परिवर्तन, दुर्घटनाओं, मानसिक दबाव और जीवन में गहरे उतार-चढ़ाव का संकेत देता है इस भाव के प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में अप्रत्याशित घटनाएं घट सकती हैं, जो उसे भावनात्मक और मानसिक रूप से प्रभावित करती हैं साथ ही यह भाव गुप्त ज्ञान और आध्यात्मिक विषयों से भी जुड़ा होता है।

कुण्डली का बारहवां भाव
व्यय, हानि और अलगाव (बारहवां भाव)
बारहवां भाव खर्च, हानि, अस्पताल व्यय, जेल, नींद की समस्या और अपनों से दूरी का संकेत देता है इस भाव के कारण व्यक्ति के धन का व्यय बढ़ सकता है और जीवन में एकाकीपन की स्थिति बन सकती है हालांकि यह भाव विदेश यात्रा, मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति का भी प्रतीक माना जाता है, जो व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है।

त्रिक भाव का वास्तविक महत्व
ज्योतिष के अनुसार त्रिक भाव केवल नकारात्मक नहीं होते यदि इन भावों के स्वामी ग्रह अनुकूल स्थिति में हों तो यह ‘विपरीत राजयोग’ बना सकते हैं यह योग व्यक्ति को संघर्ष के बाद बड़ी सफलता, सम्मान और आर्थिक उन्नति दिला सकता है सही दृष्टिकोण और उपायों के साथ ये भाव जीवन में परिवर्तन और प्रगति का मार्ग भी खोलते हैं।

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Author: sssrknews

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