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ब्राह्मण भोज का रहस्य, तिलक के नियम और मंत्रों की अद्भुत शक्ति

ब्राह्मण भोज कब से शुरू हुआ एवं किस अंगुली से करें तिलक,मंन्त्रों की शक्ति क्या है आओ जानें

विष्णु पुराण में एक कथा लेख मिलता है एक समय सभी ऋषि यों की एक पंचायत हुई जिसमें यह निर्णय करना था की यज्ञ का भाग तीनों देवों में से किसको दिया जाए प्रथम परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि को चुना गया भृगु मुनि ने भगवान शंकर को जाकर प्रणाम कियातो शंकर जी उन्हें गले मिलने के लिए खड़े हुए मुनि ने मना कर दिया कि आप अघोरी हो मुर्दे की भस्म कमाते हो हम आपसे गले नहीं मिल सकते भगवान शंकर क्रोधित हो गए फिर भृगू मुनि अपने पिता के यहां गए तो अपने पिता ब्रह्मा जी को प्रणाम नहीं किया ब्रह्मा जी भी कुपित हो गए कितना उद्दंड बालक है पिता को प्रणाम नहीं करता भृगु मुनि बैकुंठ धाम गए तो भगवान विष्णु सो रहे थे तो सोते हुए विष्णु की छाती में लात जाकर मारी भगवान विष्णु ने ब्राह्मण का चरण पकड़ा और कहा ब्राह्मण देव आपका चरण बड़ा कोमल है मेरी छाती बड़ी कठोर है आपको कहीं लगी तो नहीं प्रभु मुनि ने तुरंत भगवान विष्णु के चरण छुए और क्षमा याचना करते हुए कहा प्रभु यह एक परीक्षा का भाग था जिसमें हमें यह चुनना था कि किसी यज्ञ का प्रथम भाग दिया जाए तो सर्वसम्मति से आपको चुना जाता है तब भगवान विष्णु ने कहा कि जितना में यज्ञ तपस्या से प्रसन्न नहीं होता उतना में ब्राह्मण को भोजन कराए जाने से होता हूं भृगु जी ने पूछा महाराज ब्राह्मण के भोजन करने से आप तृप्त कैसे होते हैं तो विष्णु भगवान ने कहा ब्राह्मण को जो आप दान देते हैं या जो भोजन कराते हैं एक तो वह सात्विक प्रवृत्ति के होते हैं वेद अध्ययन वेद पठन करने वाले होते हैं ब्राह्मण ही मुझे ब्रह्मा और महेश तीनों का ज्ञान समाज को कराते हैं हर अंग का कोई ना कोई देवता है जैसे आंखों के देवता सूरज जैसे कान के देवता बसु जैसे त्वचा के देवता वायु देव मंन के देवता इंद्र वैसे ही आत्मा के रूप में मैं भी वास करता हूं ब्राह्मण भोजन करके तृप्ति की अनुभूति करें तो वह तृप्ति ब्राह्मण के साथ मुझे और उन देवताओं को भी प्रत्यक्ष भोग लगाने के समान है जो आहुति हम यज्ञ कुंड में देते हैं स्वाहा कहकर ठीक उसी प्रकार की आहुति ब्राह्मण के मुख्य में लगती है इसलिए यह परंपरा ऋषि यों ने प्रारंभ की की कोई भी धार्मिक कार्य हो तो ब्राह्मण को भोजन कराया जाए जिससे प्रत्यक्ष लाभ मिले कहते हैं ना आत्मा सो परमात्मा हमारे पूजा पाठ हवन इत्यादि का फल तभी हमें मिलता है जब परमात्मा प्रसन्न होता है आस्तिक मनसे किया हुआ पुण्य दान अवश्य फलता है और सात्विक ब्रत्ती वाले को ही दान पुण्य भोजन कराना चाहिए हर पूजा-पाठ के उपरांत दक्षिणा और भोज अवश्य कराना चाहिए यह आपकी यथाशक्ति पर निर्भर है अगर ब्राह्मण सात्विक वृत्ति का है आप जो भी उसे दोगे जो भी खिलाओगे उसी से प्रशन्न हो जाएगा चाणक्य का एक श्लोक याद आता है

विप्राणा्म भोजनौ तुष्यंति मयूरं घन गर्जिते ।
साधवा पर संपत्तौ खल़़ःपर विपत्ति सू ।।

आप चाहे गरीबों को भोजन कराएं चाहे गौ माता को भोजन कराएं या ब्राह्मण को भोजन कराएं मतलब आत्मा की तृप्ति से है सामने वाले की आत्मा तृप्त तो परमात्मा प्रसन्न है आशा करता हूं आप लोगों को मेरी बात समझ में आई होगी जिसको नहीं आनी है तो नहीं आनी है तर्क वितर्क करने के कोई लाभ नहीं आप विष्णु पुराण पढ़िए!

वास्तु दोष निवारण उपाय
अक्सर लोग अपने घर में धन की कमी से परेशान रहते हैं। इसके लिए खूब मेहनत भी करते हैं मगर फिर भी मनमुताबिक आमदनी नहीं हो पाती है। अगर आप भी ऐसी परेशानियों का सामना कर रहे हैं तो इसका कारण वास्तु दोष भी हो सकता है। घरों में वास्तु दोष का प्रकोप होने से खुशहाली चली जाती है। ऐसी स्थिति में किसी न किसी रूप से संकट आपके घर पर बना रहता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में कुछ चीजें रखना अशुभ माना जाता है। इन चीजों को घर में रखने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे घर में दरिद्रता का वास हो सकता है। आज हम आपको ऐसी ही 4 चीजों के बारे में बताएंगे जिन्हें घर में भूलकर भी नहीं रखना चाहिए।*

1. जंग लगा हुआ लोहा
वास्तु शास्त्र में जंग लगे हुए लोहे को घर में रखना अत्यंत अशुभ माना जाता है। जंग लगा हुआ लोहा नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक होता है। ऐसा माना जाता है कि जंग लगे हुए लोहे को घर में रखने से धन की हानि होती है और घर में कलह-क्लेश बढ़ता है।

2. बंद घड़ी-
वास्तु शास्त्र के मुताबिक बंद घड़ी का घर में होना भी अशुभ माना जाता है। बंद घड़ी का मतलब है कि समय रुक गया है। ऐसा माना जाता है कि बंद घड़ी को घर में रखने से जीवन में तरक्की रुक जाती है और नकारात्मकता बढ़ती है।

3. खाली पर्स
वास्तु शास्त्र में खाली पर्स को भी अशुभ माना जाता है। खाली पर्स का मतलब है कि आपके जीवन में धन की कमी है। ऐसा माना जाता है कि खाली पर्स को घर में रखने से धन की देवी लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं और घर से चली जाती हैं।

4. इस्तेमाल में न आने वाले जूते

वास्तु शास्त्र में इस्तेमाल में न आने वाले जूतों को भी अशुभ माना जाता है। इस्तेमाल में न आने वाले जूते घर में नकारात्मक ऊर्जा को जमा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस्तेमाल में न आने वाले जूतों को घर में रखने से जीवन में बाधाएं आती हैं।

वास्तु वह विज्ञान है जो किसी भी स्थान के पंच तत्वों को नियंत्रित करने में मदद करता है। वास्तु शास्त्र हमारे जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने का एक अच्छा साधन है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में कुछ चीजें रखना अशुभ माना जाता है। इन चीजों को घर में रखने से नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे घर में दरिद्रता का वास हो सकता है। इसलिए, हमें इन चीजों से बचना चाहिए और वास्तु शास्त्र के अनुसार घर को व्यवस्थित रखना चाहिए।

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किस अंगुली से करें तिलक

हमारे सनातन धर्म की पूजा-पद्धति में तिलक का विशेष महत्व है। बिना तिलक धारण किए कोई पूजा सफल नहीं मानी जाती। ब्राह्मणों के लिए तो तिलक धारण करना अनिवार्य है। बिना तिलक किए हुए ब्राह्मण का मुख देखना अशुभ माना गया है।

शास्त्रों में तिलक धारण के करने के नियम व मंत्र बताए गए हैं। क्या आप जानते हैं किस अंगुली से किसे तिलक किया जाना चाहिए

1. तर्जनी (Index Finger)- दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुली से पितृगणों को अर्थात् पिण्ड को तिलक किया जाता है।

2. मध्यमा (Middle Finger)- दाहिने हाथ की मध्यमा अंगुली से स्वयं तिलक धारण किया जाता है।

3. अनामिका (Ring Finger)- दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली से भगवान व देवों को तिलक किया जाता है।

4. अंगुष्ठ (Thumb)- दाहिने हाथ के अंगूठे से अतिथि को तिलक किया जाता है।

।। जय श्री कृष्ण ।।

मंन्त्रों की शक्ति क्या है

मंत्र क्या है ?क्या होती है मंत्र शक्ति ? भगवान राम ने भी शबरी को नवधाभक्ति का उपदेश देते समय कहा था। मंत्र जाप मम दृढ़ विस्वासा।

मंत्र शब्दों का संचय होता है, जिससे इष्ट को प्राप्त कर सकते हैं और अनिष्ट बाधाओं को नष्ट कर सकते हैं । मंत्र इस शब्द में ‘मन्’ का तात्पर्य मन और मनन से है और ‘त्र’ का तात्पर्य शक्ति और रक्षा से है ।

अगले स्तर पर मंत्र अर्थात जिसके मनन से व्यक्ति को पूरे ब्रह्मांड से उसकी एकरूपता का ज्ञान प्राप्त होता है । इस स्तर पर मनन भी रुक जाता है मन का लय हो जाता है और मंत्र भी शांत हो जाता है । इस स्थिति में व्यक्ति जन्म-मृत्यु के फेरे से छूट जाता है ।

मंत्रजप के अनेक लाभ हैं, उदा. आध्यात्मिक प्रगति, शत्रु का विनाश, अलौकिक शक्ति पाना, पाप नष्ट होना और वाणी की शुद्धि।

मंत्र जपने और ईश्वर का नाम जपने में भिन्नता है । मंत्रजप करने के लिए अनेक नियमों का पालन करना पडता है; परंतु नामजप करने के लिए इसकी आवश्यकता नहीं होती । उदाहरणार्थ मंत्रजप सात्त्विक वातावरण में ही करना आवश्यक है; परंतु ईश्वर का नामजप कहीं भी और किसी भी समय किया जा सकता है ।

मंत्रजप से जो आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न होती है उसका विनियोग अच्छे अथवा बुरे कार्य के लिए किया जा सकता है । यह धन कमाने समान है; धन का उपयोग किस प्रकार से करना है, यह धन कमाने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है ।

मंत्र का मूल भाव होता है- मनन। मनन के लिए ही मंत्रों के जप के सही तरीके धर्मग्रंथों में उजागर है। शास्त्रों के मुताबिक मंत्रों का जप पूरी श्रद्धा और आस्था से करना चाहिए। साथ ही एकाग्रता और मन का संयम मंत्रों के जप के लिए बहुत जरुरी है। माना जाता है कि इनके बिना मंत्रों की शक्ति कम हो जाती है और कामना पूर्ति या लक्ष्य प्राप्ति में उनका प्रभाव नहीं होता है।

यहां मंत्र जप से संबंधित कुछ जरूरी नियम और तरीके बताए जा रहे हैं, जो गुरु मंत्र हो या किसी भी देव मंत्र और उससे मनचाहे कार्य सिद्ध करने के लिए बहुत जरूरी माने गए हैं- – मंत्रों का पूरा लाभ पाने के लिए जप के दौरान सही मुद्रा या आसन में बैठना भी बहुत जरूरी है। इसके लिए पद्मासन मंत्र जप के लिए श्रेष्ठ होता है। इसके बाद वीरासन और सिद्धासन या वज्रासन को प्रभावी माना जाता है।

– मंत्र जप के लिए सही वक्त भी बहुत जरूरी है। इसके लिए ब्रह्ममूर्हुत यानी तकरीबन 4 से 5 बजे या सूर्योदय से पहले का समय श्रेष्ठ माना जाता है। प्रदोष काल यानी दिन का ढलना और रात्रि के आगमन का समय भी मंत्र जप के लिए उचित माना गया है।

– अगर यह वक्त भी साध न पाएं तो सोने से पहले का समय भी चुना जा सकता है।
– मंत्र जप प्रतिदिन नियत समय पर ही करें।
– एक बार मंत्र जप शुरु करने के बाद बार-बार स्थान न बदलें। एक स्थान नियत कर लें। – मंत्र जप में तुलसी, रुद्राक्ष, चंदन या स्फटिक की 108 दानों की माला का उपयोग करें। यह प्रभावकारी मानी गई है।

– कुछ विशेष कामनों की पूर्ति के लिए विशेष मालाओं से जप करने का भी विधान है। जैसे धन प्राप्ति की इच्छा से मंत्र जप करने के लिए मूंगे की माला, पुत्र पाने की कामना से जप करने पर पुत्रजीव के मनकों की माला और किसी भी तरह की कामना पूर्ति के लिए जप करने पर स्फटिक की माला का उपयोग करें।

– किसी विशेष जप के संकल्प लेने के बाद निरंतर उसी मंत्र का जप करना चाहिए।
– मंत्र जप के लिए कच्ची जमीन, लकड़ी की चौकी, सूती या चटाई अथवा चटाई के आसन पर बैठना श्रेष्ठ है। सिंथेटिक आसन पर बैठकर मंत्र जप से बचें। – मंत्र जप दिन में करें तो अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें और अगर रात्रि में कर रहे हैं तो मुंह उत्तर दिशा में रखें।

– मंत्र जप के लिए एकांत और शांत स्थान चुनें। जैसे- कोई मंदिर या घर का देवालय। – मंत्रों का उच्चारण करते समय यथासंभव माला दूसरों को न दिखाएं। अपने सिर को भी कपड़े से ढंकना चाहिए। – माला का घुमाने के लिए अंगूठे और बीच की उंगली का उपयोग करें।

– माला घुमाते समय माला के सुमेरू यानी सिर को पार नहीं करना चाहिए, जबकि माला पूरी होने पर फिर से सिर से आरंभ करना चाहिए। मंत्र क्या है …..

‘मंत्र’ का अर्थ शास्त्रों में ‘मन: तारयति इति मंत्र:’ के रूप में बताया गया है, अर्थात मन को तारने वाली ध्वनि ही मंत्र है। वेदों में शब्दों के संयोजन से ऐसी ध्वनि उत्पन्न की गई है, जिससे मानव मात्र का मानसिक कल्याण हो। ‘बीज मंत्र’ किसी भी मंत्र का वह लघु रूप है, जो मंत्र के साथ उपयोग करने पर उत्प्रेरक का कार्य करता है। यहां हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि बीज मंत्र मंत्रों के प्राण हैं या उनकी चाबी हैं

जैसे एक मंत्र-‘श्रीं’ मंत्र की ओर ध्यान दें तो इस बीज मंत्र में ‘श’ लक्ष्मी का प्रतीक है, ‘र’ धन सम्पदा का, ‘ई’ प्रतीक शक्ति का और सभी मंत्रों में प्रयुक्त ‘बिन्दु’ दुख हरण का प्रतीक है। इस तरह से हम जान पाते हैं कि एक अक्षर में ही मंत्र छुपा होता है। इसी तरह ऐं, ह्रीं, क्लीं, रं, वं आदि सभी बीज मंत्र अत्यंत कल्याणकारी हैं। हम यह कह सकते हैं कि बीज मंत्र वे गूढ़ मंत्र हैं, जो किसी भी देवता को प्रसन्न करने में कुंजी का कार्य करते हैं

मंत्र शब्द मन +त्र के संयोग से बना है !मन का अर्थ है सोच ,विचार ,मनन ,या चिंतन करना ! और “त्र ” का अर्थ है बचाने वाला , सब प्रकार के अनर्थ, भय से !लिंग भेद से मंत्रो का विभाजन पुरुष ,स्त्री ,तथा नपुंसक के रूप में है !पुरुष मन्त्रों के अंत में “हूं फट ” स्त्री मंत्रो के अंत में “स्वाहा ” ,तथा नपुंसक मन्त्रों के अंत में “नमः ” लगता है ! मंत्र साधना का योग से घनिष्ठ सम्बन्ध है……

मंत्रों की शक्ति तथा इनका महत्व ज्योतिष में वर्णित सभी रत्नों एवम उपायों से अधिक है।

मंत्रों के माध्यम से ऐसे बहुत से दोष बहुत हद तक नियंत्रित किए जा सकते हैं जो रत्नों तथा अन्य उपायों के द्वारा ठीक नहीं किए जा सकते।

ज्योतिष में रत्नों का प्रयोग किसी कुंडली में केवल शुभ असर देने वाले ग्रहों को बल प्रदान करने के लिए किया जा सकता है तथा अशुभ असर देने वाले ग्रहों के रत्न धारण करना वर्जित माना जाता है क्योंकि किसी ग्रह विशेष का रत्न धारण करने से केवल उस ग्रह की ताकत बढ़ती है, उसका स्वभाव नहीं बदलता।

इसलिए जहां एक ओर अच्छे असर देने वाले ग्रहों की ताकत बढ़ने से उनसे होने वाले लाभ भी बढ़ जाते हैं, वहीं दूसरी ओर बुरा असर देने वाले ग्रहों की ताकत बढ़ने से उनके द्वारा की जाने वाली हानि की मात्रा भी बढ़ जाती है। इसलिए किसी कुंडली में बुरा असर देने वाले ग्रहों के लिए रत्न धारण नहीं करने चाहिएं।

वहीं दूसरी ओर किसी ग्रह विशेष का मंत्र उस ग्रह की ताकत बढ़ाने के साथ-साथ उसका किसी कुंडली में बुरा स्वभाव बदलने में भी पूरी तरह से सक्षम होता है। इसलिए मंत्रों का प्रयोग किसी कुंडली में अच्छा तथा बुरा असर देने वाले दोनो ही तरह के ग्रहों के लिए किया जा सकता है।

साधारण हालात में नवग्रहों के मूल मंत्र तथा विशेष हालात में एवम विशेष लाभ प्राप्त करने के लिए नवग्रहों के बीज मंत्रों तथा वेद मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए।

मंत्र जाप- मंत्र जाप के द्वारा सर्वोत्तम फल प्राप्ति के लिए मंत्रों का जाप नियमित रूप से तथा अनुशासनपूर्वक करना चाहिए। वेद मंत्रों का जाप केवल उन्हीं लोगों को करना चाहिए जो पूर्ण शुद्धता एवम स्वच्छता का पालन कर सकते हैं।

किसी भी मंत्र का जाप प्रतिदिन कम से कम 108 बार जरूर करना चाहिए। सबसे पहले आप को यह जान लेना चाहिए कि आपकी कुंडली के अनुसार आपको कौन से ग्रह के मंत्र का जाप करने से सबसे अधिक लाभ हो सकता है तथा उसी ग्रह के मंत्र से आपको जाप शुरू करना चाहिए।

बीज मंत्र- एक बीजमंत्र, मंत्र का बीज होता है । यह बीज मंत्र के विज्ञान को तेजी से फैलाता है । किसी मंत्र की शक्ति उसके बीज में होती है । मंत्र का जप केवल तभी प्रभावशाली होता है जब योग्य बीज चुना जाए । बीज, मंत्र के देवता की शक्ति को जागृत करता है ।

प्रत्येक बीजमंत्र में अक्षर समूह होते हैं।

उदाहरण के लिए – ॐ, ऐं,क्रीं, क्लीम्
उनको बोलते हैं बीज मंत्र।

उसका अर्थ खोजो तो समझ में नही आएगा लेकिन अंदर की शक्तियों को विकसित कर देते हैं। सब बीज मंत्रो का अपना-अपना प्रभाव होता है। जैसे ॐ कार बीज मंत्र है ऐसे २० दूसरे भी हैं।

ॐ बं ये शिवजी की पूजा में बीज मंत्र लगता है। ये बं बं…. अर्थ को जो तुम बं बं…..जो शिवजी की पूजा में करते हैं। इस बं के उच्चारण करने से वायु प्रकोप दूर हो जाता है। गठिया ठीक हो जाता है। शिव रात्रि के दिन सवा लाख जप करो तो इष्ट सिद्धि भी मिलती है। बं… शब्द उच्चारण से गैस ट्रबल कैसी भी हो भाग जाती है।

खं शब्द👉 खं…. हार्ट-टैक कभी नही होता है। हाई बी.पी., लो बी.पी. कभी नही होता ५० माला जप करें, तो लीवर ठीक हो जाता है। १०० माला जप करें तो शनि देवता के ग्रह का अशुभ प्रभाव चला जाता है।

ऐसे ही ब्रह्म परमात्मा का कं शब्द है। ब्रह्म वाचक। तो ब्रह्म परमात्मा के ३ विशेष मंत्र हैं। ॐ, खं और कं।

ऐसे ही रामजी के आगे भी एक बीज मंत्र लग जाता है – रीं रामाय नम:।।

कृष्ण जी के मंत्र के आगे बीज मंत्र लग जाता है क्लीं कृष्णाय नम:।।

जैसे एक-एक के आगे, एक-एक के साथ शून्य लगा दो तो १० गुना हो गया।

ऐसे ही आरोग्य में भी ॐ हुं विष्णवे नम:। तो हुं बिज मंत्र है।

ॐ बिज मंत्र है। विष्णवे विष्णु भगवान का सुमिरन है।

बीजमन्त्रों से स्वास्थ्य-सुरक्षा
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बीजमन्त्र लाभ

कं मृत्यु के भय का नाश,
त्वचारोग व रक्त विकृति में।

ह्रीं मधुमेह, हृदय की धड़कन में।

घं स्वपनदोष व प्रदररोग में।

भं बुखार दूर करने के लिए।

क्लीं पागलपन में।

सं बवासीर मिटाने के लिए।

वं भूख-प्यास रोकने के लिए।

लं थकान दूर करने के लिए।

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Author: sssrknews

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