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आज का पंचांग: जानिए तिथि अनुसार शुभ कार्य, संकष्ट चतुर्थी और कुलदेवी कृपा का महत्व

Daily panchang,तिथि के अनुसार करने योग्य कार्य एवं जब कुलदेवी घर में प्रवेश करती है तब केवल धन ही नहीं हमारा भाग्य भी बदल जाता है

🌤️ दिनांक – 02 जून 2026
🌤️ दिन – मंगलवार
🌤️ विक्रम संवत 2083
🌤️ शक संवत -1948
🌤️ अयन – उत्तरायण
🌤️ ऋतु – ग्रीष्म ॠतु
🌤️ मास – अधिक ज्येष्ठ
🌤️ पक्ष – कृष्ण
🌤️ तिथि – द्वितीया शाम 07:01 तक तत्पश्चात तृतीया
🌤️ नक्षत्र – मूल रात्रि 10:06 तक तत्पश्चात पूर्वाषाढा
🌤️ योग – साध्य सुबह 07:16 तक तत्पश्चात शुभ
🌤️*राहुकाल – शाम 03:57 से शाम 05:37 तक*
🌤️ सूर्योदय – 05:57
🌤️ सूर्यास्त – 07:15
दिशाशूल – उत्तर दिशा मे

तिथि के अनुसार करने योग्य कार्य एवं जब कुलदेवी घर में प्रवेश करती है तब केवल धन ही नहीं हमारा भाग्य भी बदल जाता है आओ जानें

प्रतिपदा तिथि :👉 प्रतिपदा तिथि में गृह निर्माण, गृह प्रवेश, वास्तुकर्म, विवाह, यात्रा, प्रतिष्ठा, शान्तिक तथा पौष्टिक कार्य आदि सभी मंगल कार्य किए जाते हैं. कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा में चन्द्रमा को बली माना गया है और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में चन्द्रमा को निर्बल माना गया है. इसलिए शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में विवाह, यात्रा, व्रत, प्रतिष्ठा, सीमन्त, चूडा़कर्म, वास्तुकर्म तथा गृहप्रवेश आदि कार्य नहीं करने चाहिए।

द्वित्तीया तिथि👉 विवाह मुहूर्त, यात्रा करना, आभूषण खरीदना, शिलान्यास, देश अथवा राज्य संबंधी कार्य, वास्तुकर्म, उपनयन आदि कार्य करना शुभ माना होता है परंतु इस तिथि में तेल लगाना वर्जित है।

तृतीया तिथि👉 तृतीया तिथि में शिल्पकला अथवा शिल्प संबंधी अन्य कार्यों में, सीमन्तोनयन, चूडा़कर्म, अन्नप्राशन, गृह प्रवेश, विवाह, राज-संबंधी कार्य, उपनयन आदि शुभ कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं।

चतुर्थी तिथि👉 सभी प्रकार के बिजली के कार्य, शत्रुओं का हटाने का कार्य, अग्नि संबंधी कार्य, शस्त्रों का प्रयोग करना आदि के लिए यह तिथि अच्छी मानी गई है. क्रूर प्रवृति के कार्यों के लिए यह तिथि अच्छी मानी गई है।

पंचमी तिथि👉 पंचमी तिथि सभी प्रवृतियों के लिए यह तिथि उपयुक्त मानी गई है. इस तिथि में किसी को ऋण देना वर्जित माना गया है।

षष्ठी तिथि👉 षष्ठी तिथि षष्ठी तिथि में युद्ध में उपयोग में लाए जाने वाले शिल्प कार्यों का आरम्भ, वास्तुकर्म, गृहारम्भ, नवीन वस्त्र पहनने जैसे शुभ कार्य इस तिथि में किए जा सकते हैं. इस तिथि में तैलाभ्यंग, अभ्यंग, पितृकर्म, दातुन, आवागमन, काष्ठकर्म आदि कार्य वर्जित हैं।

सप्तमी तिथि👉 विवाह मुहुर्त, संगीत संबंधी कार्य, आभूषणों का निर्माण और नवीन आभूषणों को धारण किया जा सकता है. यात्रा, वधु-प्रवेश, गृह-प्रवेश, राज्य संबंधी कार्य, वास्तुकर्म, चूडा़कर्म, अन्नप्राशन, उपनयन संस्कार, आदि सभी शुभ कार्य किए जा सकते हैं।

अष्टमी तिथि👉 इस तिथि में लेखन कार्य, युद्ध में उपयोग आने वाले कार्य, वास्तुकार्य, शिल्प संबंधी कार्य, रत्नों से संबंधित कार्य, आमोद-प्रमोद से जुडे़ कार्य, अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले कार्यों का आरम्भ इस तिथि में किया जा सकता है।

नवमी तिथि👉 नवमी तिथि में शिकार करने का आरम्भ करना, झगड़ा करना, जुआ खेलना, शस्त्र निर्माण करना, मद्यपान तथा निर्माण कार्य तथा सभी प्रकार के क्रूर कर्म इस तिथि में किए जाते हैं।

दशमी तिथि👉 दशमी तिथि में राजकार्य अर्थात वर्तमान समय में सरकार से संबंधी कार्यों का आरम्भ किया जा सकता है. हाथी, घोड़ों से संबंधित कार्य, विवाह, संगीत, वस्त्र, आभूषण, यात्रा आदि इस तिथि में की जा सकती है. गृह-प्रवेश, वधु-प्रवेश, शिल्प, अन्न प्राशन, चूडा़कर्म, उपनयन संस्कार आदि कार्य इस तिथि में किए जा सकते हैं।

एकादशी तिथि👉 एकादशी तिथि में व्रत, सभी प्रकार के धार्मिक कार्य, देवताओं का उत्सव, सभी प्रकार के उद्यापन, वास्तुकर्म, युद्ध से जुडे़ कर्म, शिल्प, यज्ञोपवीत, गृह आरम्भ करना और यात्रा संबंधी कार्य किए जा सकते हैं।

द्वादशी तिथि👉 इस तिथि में विवाह, तथा अन्य शुभ कर्म किए जा सकते हैं. इस तिथि में तैलमर्दन, नए घर का निर्माण करना तथा नए घर में प्रवेश तथा यात्रा का त्याग करना चाहिए।

त्रयोदशी तिथि👉 संग्राम से जुडे़ कार्य, सेना के उपयोगी अस्त्र-शस्त्र, ध्वज, पताका के निर्माण संबंधी कार्य, राज-संबंधी कार्य, वास्तु कार्य, संगीत विद्या से जुडे़ काम इस दिन किए जा सकते हैं. इस दिन यात्रा, गृह प्रवेश, नवीन वस्त्राभूषण तथा यज्ञोपवीत जैसे शुभ कार्यों का त्याग करना चाहिए।

चतुर्दशी👉 चतुर्दशी तिथि में सभी प्रकार के क्रूर तथा उग्र कर्म किए जा सकते हैं. शस्त्र निर्माण इत्यादि का प्रयोग किया जा सकता है. इस तिथि में यात्रा करना वर्जित है. चतुर्थी तिथि में किए जाने वाले कार्य इस तिथि में किए जा सकते हैं।

पूर्णमासी👉 पूर्णमासी जिसे पूर्णिमा भी कहते हैं, इस तिथि में शिल्प, आभूषणों से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं. संग्राम, विवाह, यज्ञ, जलाशय, यात्रा, शांति तथा पोषण करने वाले सभी मंगल कार्य किए जा सकतेज हैं। अमावस्या इस तिथि में पितृकर्म मुख्य रुप से किए जाते हैं. महादान तथा उग्र कर्म किए जा सकते हैं. इस तिथि में शुभ कर्म तथा स्त्री का संग नहीं करना चाहिए।

उम्र ज्यादा हो गई है शादी नहीं होरही क्या करें
कुछ जातक/जातिकाओ की उम्र 40 तक के पार पहुँच जाती है फिर भी शादी होने का नाम नही लेता,उम्र ज्यादा हो गई हैं या उम्र निकलती जा रही हैं और बहुत उम्र शादी की निकल चुकी हैं तब शादी होगी या नही और अब कब तक हो जाएगी और क्या उपाय करने से शादी हो जाएगी आदि? शनि मंगल राहु केतु शादी न होने देने के लिए जिम्मेदार बने रहते है कुंण्डली के 7वे भाव स्वामी औऱ 7वा भाव अगर
कमजोर है और शनि राहु केतु या शनि मंगल से बहुत ज्यादा पीड़ित हैं पुरूष कुण्डली है तब शुक्र और स्त्री कुंडली हैं तब गुरु बहुत कमजोर है कुण्डली मे तब शादी होने का नाम नही लेती और उम्र निकलती जाती है।
अब ऐसी स्थिति होने पर 7वे भाव से और 7वे भाव स्वामी से कही न कही शादी के ग्रहो गुरु या चन्द्र शुक्र का संबध बना है तब शादी होगी ऐसी स्थिति में 7वे भाव संबधि दशा का समय आने पर शादी जरूर हो जाएगी चाहे देर से शादी होगी, उपाय करने से जल्दी शादी के रास्ते बन जाते है बाकी गुरु शुक्र चन्द्र 7वे भाव से सम्बन्ध नही कर रहे हैं केवल 7 वे भाव से शनि मंगल या शनि राहु केतु संबध है तब शादी होना मुश्किल होगा। अब कुछ उदाहरणो से समझते है शादी कब तक हो जाएगी अगर उम्र ज्यादा हो गई हैं और शादी की उम्र निकलती जा रही हैं तो।
वृष लग्न 7वे भाव स्वामी मंगल है राहु केतु और 7वा भाव शनि से पीड़ित है तब शादी बहुत देर से ही होगी और शादी भी यहाँ तब होगी अगर 7वे भाव या 7वे भाव स्वामी मंगल से कही न कही गुरु या शुक्र चन्द्र या कुण्डली के अच्छे भाव स्वामियों के सम्बन्ध होगा तब शादी होगी देर से होगी उपाय करने से हो जाएगी।
मकर लग्न में 7वे भाव स्वामी चन्द्र शनि मंगल से सम्बन्ध बनाकर बैठे है शुक्र और गुरु कुण्डली मे थोडा कमजोर है तब शादी की उम्र निकलती जाएगी यहाँ देर से ही शादी होगी, शादी भी तब होगी देर से जब 7वे भाव से या चन्द्र से गुरु या शुक्र का संबध होगा तब देर से 7वे भाव स्वामी या 7वे भाव संबधि दशा आने पर शादी होगी।
मीन लग्न में 7वे भाव स्वामी बुध 8वे या 6वे भाव मे जाकर शनि राहु से संबध में है तब शादी यहाँ 35-40 की उम्र तक आते-आते ही हो पाएगी, जल्दी शादी ऐसी स्थिति में उपाय करने से ही हो पाएगी।
नोट:-देर से शादी और शादी की उम्र निकलती जा रही हैं शादी के योग होने जरूरी है तब ही देर से शादी अगर लिखी है तब हो पाएगी शादी योग होना जरूरी है।
ज्योतिष से संबंधित एवं कुंडली,पितृदोष वास्तुदोष से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए संपर्क करें

जब कुलदेवी घर में प्रवेश करती हैं, तब केवल धन नहीं… भाग्य भी बदल जाता है।

जिस घर में कुलदेवी की कृपा होती है, वहाँ दरिद्रता अधिक समय तक टिक नहीं पाती।
घर के आंगन में सुख, शांति और समृद्धि स्वयं चलकर आने लगती है।
कई बार अचानक रुके हुए काम बनने लगते हैं, घर में अन्न की कमी दूर होने लगती है और परिवार के चेहरे पर चमक लौट आती है — यह केवल संयोग नहीं, कुलदेवी की अदृश्य कृपा मानी जाती है।

सनातन परंपरा में कुलदेवी को पूरे वंश की रक्षक शक्ति कहा गया है।
जब परिवार अपने कुलदेवी का स्मरण, पूजा और सम्मान करता है, तब देवी अपने भक्तों के जीवन से संकटों को दूर कर मार्ग प्रशस्त करती हैं।

संस्कृत श्लोक:

“या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”

अर्थ — जो देवी समस्त प्राणियों में मातृ स्वरूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार प्रणाम है।

कहते हैं जिस घर में प्रतिदिन दीपक जलाकर कुलदेवी का स्मरण किया जाता है, वहाँ नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं कर पाती और घर धन-धान्य से भरने लगता है।
कुलदेवी केवल रक्षा ही नहीं करतीं, बल्कि अपने भक्तों के आत्मविश्वास और भाग्य को भी जागृत करती हैं।

यदि आपक़ो अपनी कुलदेवी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल रही है तो परसनल मैसेज में अपने पैत्रिक स्थान लिखें कुलदेवी का नाम पता हों सकता है।

विघ्नों और मुसीबते दूर करने के लिए
03 जून 2026 बुधवार को संकष्ट चतुर्थी (चन्द्रोदय रात्रि 09:51)
शिव पुराण में आता हैं कि हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी ( पूनम के बाद की ) के दिन सुबह में गणपतिजी का पूजन करें और रात को चन्द्रमा में गणपतिजी की भावना करके अर्घ्य दें और ये मंत्र बोलें :
ॐ गं गणपते नमः ।
ॐ सोमाय नमः ।
‪ चतुर्थी‬ तिथि विशेष
चतुर्थी तिथि के स्वामी ‪भगवान गणेश‬जी हैं।
हिन्दू कैलेण्डर में प्रत्येक मास में दो चतुर्थी होती हैं।
पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्ट चतुर्थी कहते हैं।अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं।
शिवपुराण के अनुसार “महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्षके। पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा ॥
“ अर्थात प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को की हुई महागणपति की पूजा एक पक्ष के पापों का नाश करनेवाली और एक पक्षतक उत्तम भोगरूपी फल देनेवाली होती है ।

कोई कष्ट हो तो
हमारे जीवन में बहुत समस्याएँ आती रहती हैं, मिटती नहीं हैं ।, कभी कोई कष्ट, कभी कोई समस्या | ऐसे लोग शिवपुराण में बताया हुआ एक प्रयोग कर सकते हैं कि, कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (मतलब पुर्णिमा के बाद की चतुर्थी ) आती है | उस दिन सुबह छः मंत्र बोलते हुये गणपतिजी को प्रणाम करें कि हमारे घर में ये बार-बार कष्ट और समस्याएं आ रही हैं वो नष्ट हों |
छः मंत्र इस प्रकार हैं –
ॐ सुमुखाय नम: : सुंदर मुख वाले; हमारे मुख पर भी सच्ची भक्ति प्रदान सुंदरता रहे ।
ॐ दुर्मुखाय नम: : मतलब भक्त को जब कोई आसुरी प्रवृत्ति वाला सताता है तो… भैरव देख दुष्ट घबराये ।
ॐ मोदाय नम: : मुदित रहने वाले, प्रसन्न रहने वाले । उनका सुमिरन करने वाले भी प्रसन्न हो जायें ।
ॐ प्रमोदाय नम: : प्रमोदाय; दूसरों को भी आनंदित करते हैं । भक्त भी प्रमोदी होता है और अभक्त प्रमादी होता है, आलसी । आलसी आदमी को लक्ष्मी छोड़ कर चली जाती है । और जो प्रमादी न हो, लक्ष्मी स्थायी होती है ।

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Author: sssrknews

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