महर्षि पुलस्त्य ने देवर्षि नारद से कहा— “हे नारद! हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठने के बाद भी महाराज युधिष्ठिर का मन पूरी तरह शांत नहीं था। महाभारत के युद्ध में अपने ही सगे-संबंधियों, गुरुओं और बंधुओं के मारे जाने का शोक उनके भीतर कहीं न कहीं सुलग रहा था। वे हर रात सोते समय कुरुक्षेत्र के मैदान में तड़पती आत्माओं और चीखों को महसूस करते थे।
युधिष्ठिर ने महर्षि धौम्य और व्यास जी को अपने पास बुलाया और हाथ जोड़कर पूछा— ‘हे ऋषिवर! युद्ध में जो करोड़ों निर्दोष सैनिकों का रक्त बहा है, उस वंश-नाश के पाप से मुक्ति का क्या मार्ग है? मैं अपनी आत्मा को इस बोझ से कैसे मुक्त करूँ?'”
महर्षि व्यास जी ने उन्हें सांत्वना दी और कहा— हे धर्मराज! क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध पाप नहीं होता, लेकिन पृथ्वी के शुद्धिकरण और पितरों की परम तृप्ति के लिए तुम्हें एक ‘महा-अश्वमेध यज्ञ’ का अनुष्ठान करना चाहिए। इस यज्ञ के पूरा होने से धरती का सारा संताप मिट जाएगा। युधिष्ठिर ने सहर्ष इस आज्ञा को स्वीकार किया और यज्ञ की तैयारियां शुरू कर दीं।
यज्ञ की तैयारियों के बीच ही, आकाश मंडल में भयंकर और विचित्र खगोलीय परिवर्तन होने लगे। द्वापर युग का अंतिम चरण आ चुका था। एक दिन जब महाराज युधिष्ठिर अपने महल की छत पर खड़े थे, तो उन्होंने देखा कि प्रकृति अपना स्वभाव बदल रही है।
व्यास जी ने युधिष्ठिर को पास बुलाकर काल के उस गुप्त रहस्य के बारे में बताया जो ७८वें अध्याय का सबसे मुख्य भाग है। व्यास जी ने कहा:
“हे युधिष्ठिर! देखो, समय का पहिया घूम चुका है। अब द्वापर युग विदा ले रहा है और पृथ्वी पर ‘कलयुग’ (काले युग) के आने के संकेत दिखने लगे हैं। कलयुग के आते ही मनुष्यों की बुद्धि, स्वभाव और धर्म पूरी तरह बदलने लगेंगे।”
व्यास जी ने कलयुग के जो शुरुआती लक्षण बताए, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं:
धार्मिक पाखंड: लोग वेदों और शास्त्रों को केवल धन कमाने और दूसरों को ठगने का जरिया बनाने लगेंगे। सच्चे संतों का आदर कम होगा और ढोंगी पूजे जाएंगे।
रिश्तों में खटास: भाई-भाई के बीच का प्रेम समाप्त हो जाएगा। धन के लिए लोग अपने ही माता-पिता और मित्रों को धोखा देने में तनिक भी संकोच नहीं करेंगे।
प्रकृति का प्रकोप: फसलें अपनी पौष्टिकता खो देंगी, वर्षा समय पर नहीं होगी और पृथ्वी पर नए-नए अज्ञात रोग फैलने लगेंगे, जिससे मनुष्यों की आयु घटने लगेगी।
लोग केवल बाहरी सुंदरता और वासना के पीछे भागेंगे। शील और मर्यादा का ह्रास होने लगेगा।
इन भयानक लक्षणों को सुनकर युधिष्ठिर व्याकुल हो गए। उन्होंने व्यास जी से कहा— हे गुरुदेव! यदि कलयुग का आना निश्चित है, तो मुझे उससे पहले इस पृथ्वी को पवित्र करने के लिए अपना यज्ञ तुरंत शुरू करना चाहिए।
महाराज युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर के राजसी घोड़े (अश्व) को छोड़ा, जिसके पीछे गांडीवधारी अर्जुन अपनी सेना लेकर चले ताकि चारों दिशाओं के राजाओं को यज्ञ का आमंत्रण दिया जा सके। कुरुक्षेत्र की उसी पावन भूमि पर, जहाँ महाभारत का युद्ध हुआ था, एक बहुत ही विशाल और भव्य यज्ञशाला का निर्माण किया गया।
देश-विदेश के हज़ारों परम प्रतापी ब्राह्मणों, ऋषियों और मुनियों को आदर सहित कुरुक्षेत्र बुलाया गया। यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित की गई और वेदमंत्रों की आहुतियों से पूरा ब्रह्मांड गूंज उठा। इस यज्ञ के धुएं से कुरुक्षेत्र के आकाश में मंडरा रहे युद्ध के सारे काले बादल और नकारात्मक ऊर्जा पल भर में समाप्त हो गई।
हे मुनियों! इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर ने कलयुग के आने से ठीक पहले कुरुक्षेत्र की भूमि पर महा-अश्वमेध यज्ञ प्रारंभ करके पृथ्वी के संतुलन को बनाए रखा।
महर्षि पुलस्त्य ने देवर्षि नारद से कहा— “हे देवर्षि! गांडीवधारी अर्जुन उस राजसी यज्ञीय घोड़े (अश्व) की रक्षा करते हुए पूरे आर्यावर्त (भारतवर्ष) की परिक्रमा करके, सभी राजाओं से कर (उपहार) लेकर ससम्मान हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र की पावन यज्ञशाला में वापस लौट आए। अर्जुन के सुरक्षित लौटते ही महाराज युधिष्ठिर की आँखों में संतोष के आंसू आ गए।
कुरुक्षेत्र की वह यज्ञशाला साक्षात देवलोक जैसी प्रतीत हो रही थी। सोने के खंभे, रत्नों से सजे मंडप और देश-विदेश से आए लाखों ऋषियों, मुनियों और राजाओं के शिविर वहाँ लगे हुए थे। यज्ञशाला में घी, दूध और दिव्य औषधियों की ऐसी प्रचुर आहुतियाँ दी जा रही थीं कि उस पवित्र धुएं से कुरुक्षेत्र का पूरा आकाश सुगंधित हो उठा था।
यज्ञ अपने अंतिम और सबसे मुख्य चरण पर पहुँचा, जिसे ‘पूर्णाहूति’ कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास, धौम्य और याज्ञवल्क्य जैसे प्रकांड मुनियों ने जब अंतिम वेदमंत्रों का सस्वर उच्चारण शुरू किया, तो मंत्रों के तपोबल से अंतरिक्ष का मार्ग खुल गया।
और तब एक परम अलौकिक चमत्कार हुआ!
सनातन इतिहास में ऐसा बहुत कम हुआ है, लेकिन युधिष्ठिर के इस निष्पाप यज्ञ में स्वयं देवराज इंद्र, अग्निदेव, वायुदेव, वरुणदेव और अष्ट वसु प्रत्यक्ष रूप से (साक्षात साकार रूप धारण करके) आकाश मार्ग से नीचे उतरे। उनके पीछे गंधर्व और अप्सराएं मधुर गान कर रही थीं।
देवताओं ने अपने दिव्य हाथों को आगे बढ़ाकर युधिष्ठिर द्वारा दी गई आहुतियों और यज्ञ के भाग को साक्षात ग्रहण किया। उन्होंने महाराज युधिष्ठिर को आशीर्वाद देते हुए कहा— हे धर्मराज! कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर जो संताप और शोक छाया हुआ था, आज तुम्हारे इस पवित्र यज्ञ से वह पूरी तरह धुल चुका है। पृथ्वी पुनः निष्पाप हो गई है।
यज्ञ की पूर्णाहूति के बाद महाराज युधिष्ठिर ने दान का वह कीर्तिमान स्थापित किया .
करोड़ों गायों, स्वर्ण मुद्राओं, दिव्य वस्त्रों और भूमि का दान ब्राह्मणों, अनाथों और निर्धनों को दिया गया।
यज्ञ के समापन पर एक ऐसा महा-भण्डारा (अन्नकूट) शुरू हुआ, जहाँ कोई भी मनुष्य, पशु या पक्षी भूखा नहीं रहा।
युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर के राजकोष का द्वार सबके लिए खोल दिया। दान पाते ही प्रजा आनंद से नाच उठी और चारों तरफ जयघोष गूंज उठा।यज्ञ के पवित्र जल (अवभृथ स्नान) से जब महाराज युधिष्ठिर और द्रौपदी ने स्नान किया, तो उनके मन पर लगा महाभारत के युद्ध का अंतिम शोक, ग्लानि और पाप का बोझ हमेशा के लिए समाप्त हो गया। उनका हृदय साक्षात गंगाजल की तरह निर्मल हो गया।
शौनकादि ऋषियों से कहते हैं— हे मुनियों! इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर का महा-अश्वमेध यज्ञ परम वैभव और पवित्रता के साथ संपन्न हुआ। पांडवों ने अपने जीवन का सबसे बड़ा धार्मिक कर्तव्य पूरा कर लिया और पृथ्वी को कलयुग के प्रभाव से लड़ने की आत्मिक शक्ति प्रदान की।
!!जय श्री कृष्णा!!
Diclaimer : इसका हमारी The भारत SSSRK News24x7 समाचार और राष्ट्र दर्शन (सबसे तेज़, सबसे आगे…),
यह एक आंकलन मात्र है…





