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13 लाख टन कचरा हटाया, 100 एकड़ जमीन हुई खाली! IAS आशीष सिंह के Bio-Mining काम की सोशल मीडिया पर चर्चा

Fact Check: वायरल पोस्ट में किए गए दावे की पूरी कहानी और Bio-Mining अभियान की हकीकत

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक पोस्टर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें IAS अधिकारी आशीष सिंह के सफाई अभियान की जमकर तारीफ की जा रही है। पोस्टर में दावा किया गया है कि उन्होंने महज 6 महीने में करीब 13 लाख टन पुराने कचरे को हटाकर 100 एकड़ जमीन खाली कराई।

पोस्टर में इस काम की तुलना नेताओं के कथित ‘फोटोशूट वाली सफाई’ से भी की गई है। हालांकि, वायरल पोस्ट में दिए गए आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि को लेकर सवाल बने हुए हैं।

क्या है वायरल पोस्ट का दावा?

वायरल पोस्टर में कहा गया है कि IAS अधिकारी आशीष सिंह ने बड़े पैमाने पर पुराने कचरे को हटाने का काम कराया। पोस्ट में दावा किया गया है कि करीब 13 लाख टन कचरा हटाकर 100 एकड़ जमीन को साफ कराया गया।

पोस्टर के साथ कचरे के बड़े ढेर और उसके बाद खाली हुई जमीन की तस्वीरें भी शेयर की गई हैं। इसी आधार पर सोशल मीडिया यूजर्स अधिकारी के काम की तारीफ कर रहे हैं।

मामला प्रयागराज के बसवार डंपिंग ग्राउंड से जुड़ा

उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, यह मामला उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित बसवार कचरा डंपिंग ग्राउंड से जुड़ा बताया जा रहा है। यहां लंबे समय से जमा लेगेसी वेस्ट को हटाने के लिए Bio-Mining तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

इस प्रक्रिया का उद्देश्य पुराने कचरे को वैज्ञानिक तरीके से अलग करना और डंपिंग साइट की जमीन को दोबारा उपयोग के योग्य बनाना था।

क्या सच में 13 लाख टन कचरा और 100 एकड़ जमीन?

वायरल पोस्ट में 13 लाख टन कचरा और 100 एकड़ जमीन का आंकड़ा दिया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों में बड़े पैमाने पर लेगेसी वेस्ट हटाने और जमीन खाली कराने की जानकारी मिलती है, लेकिन वायरल पोस्ट में बताए गए इन दोनों आंकड़ों की अंतिम आधिकारिक पुष्टि संबंधित नगर निगम या प्रशासनिक रिकॉर्ड से करना जरूरी है।

इसलिए इन आंकड़ों को बिना आधिकारिक दस्तावेज के निश्चित अंतिम आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा।

Bio-Mining क्या होता है?

Bio-Mining में पुराने और जमा हुए कचरे को मशीनों के जरिए अलग-अलग हिस्सों में छांटा जाता है।

इस प्रक्रिया में आमतौर पर—

  • मिट्टी और बारीक सामग्री को अलग किया जाता है।
  • प्लास्टिक और अन्य रिसाइकिल होने वाली सामग्री को छांटा जाता है।
  • धातु जैसी सामग्री को अलग करके दोबारा उपयोग किया जा सकता है।
  • अनुपयोगी सामग्री का निर्धारित तरीके से निपटारा किया जाता है।
  • कचरे के पुराने ढेर को हटाकर जमीन को दोबारा उपयोग के योग्य बनाया जाता है।

इस तरह वर्षों से जमा कचरे की समस्या को कम करने के साथ-साथ डंपिंग साइट की जमीन को भी वापस उपयोग में लाने की कोशिश की जाती है।

सोशल मीडिया पर क्यों हो रही तारीफ?

वायरल पोस्ट में इस अभियान को ‘काम बनाम प्रचार’ के तौर पर पेश किया गया है। पोस्ट में दावा किया गया है कि जहां कुछ नेता सफाई अभियान के दौरान फोटो खिंचवाने को लेकर चर्चा में रहते हैं, वहीं आशीष सिंह के नेतृत्व में जमीन पर बड़े स्तर पर काम हुआ।

सोशल मीडिया यूजर्स भी पोस्ट को शेयर करते हुए इसे स्वच्छता और प्रशासनिक काम का उदाहरण बता रहे हैं।

Bio-Mining से क्या फायदे होते हैं?

1. पर्यावरण को फायदा
पुराने कचरे के ढेर से होने वाले प्रदूषण और दुर्गंध को कम करने में मदद मिल सकती है।

2. जमीन का दोबारा इस्तेमाल
कचरा हटने के बाद डंपिंग साइट की जमीन को अन्य उपयोग के लिए विकसित किया जा सकता है।

3. स्वास्थ्य संबंधी जोखिम में कमी
कचरे के बड़े ढेर के आसपास रहने वाले लोगों को बदबू, धुएं और अन्य प्रदूषण संबंधी परेशानियों से राहत मिल सकती है।

4. पुराने कचरे का निपटारा
लेगेसी वेस्ट को लंबे समय से चली आ रही समस्या के रूप में देखा जाता है। Bio-Mining इसके वैज्ञानिक निपटारे का एक तरीका है।

Fact Check: वायरल दावा कितना सही?

वायरल पोस्ट में प्रयागराज में बड़े पैमाने पर लेगेसी वेस्ट हटाने के अभियान का उल्लेख है और Bio-Mining के जरिए कचरा साफ करने का काम वास्तविक परियोजना से जुड़ा बताया जाता है।

हालांकि, 13 लाख टन कचरा, 100 एकड़ जमीन और सिर्फ 6 महीने की अवधि जैसे विशिष्ट आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित नगर निगम/प्रशासन से करना जरूरी है।

Verdict: दावा आंशिक रूप से सही, आंकड़ों की पुष्टि जरूरी

यानी वायरल पोस्ट पूरी तरह मनगढ़ंत नहीं है, लेकिन इसमें दिए गए आंकड़ों को आधिकारिक पुष्टि के बिना अंतिम तथ्य मानना सही नहीं होगा।

नोट: यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों और सोशल मीडिया पर वायरल दावे के आधार पर तैयार की गई है। अधिकारी का पद, परियोजना की अवधि और कचरे/जमीन से जुड़े सटीक आंकड़ों की पुष्टि संबंधित सरकारी विभाग से की जानी चाहिए।

काम बोलता है, फोटो नहीं!

अगर किसी शहर में वर्षों से जमा कचरे के पहाड़ को हटाकर जमीन को दोबारा उपयोग के योग्य बनाया जाता है, तो यह निश्चित रूप से शहरी स्वच्छता और पर्यावरण के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम है। ऐसे अभियानों की सफलता का आकलन सोशल मीडिया के दावों से नहीं, बल्कि आधिकारिक आंकड़ों और जमीन पर हुए वास्तविक काम से किया जाना चाहिए।

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