अमेरिका के H-1B वीज़ा नियमों में संभावित बदलावों को लेकर भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने आधिकारिक बयान जारी किया है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की जा रही है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “हमने अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग द्वारा जारी प्रस्तावित नियम-निर्माण नोटिस देखा है। उद्योग समेत सभी हितधारकों के पास अपनी राय रखने के लिए एक महीने का समय है। जैसा कि पहले भी कहा गया है, कुशल प्रतिभाओं की आवाजाही और आदान-प्रदान ने भारत और अमेरिका दोनों में तकनीकी विकास, नवाचार, आर्थिक वृद्धि और प्रतिस्पर्धा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। हम उद्योग समेत सभी पक्षों से संवाद जारी रखेंगे और आशा करते हैं कि इन पहलुओं पर गंभीरता से विचार होगा।”
उन्होंने बताया कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी 22 सितंबर को न्यूयॉर्क में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो से मुलाकात के दौरान H-1B वीज़ा का मुद्दा उठाया था। जायसवाल ने कहा, “विदेश मंत्रालय और वाशिंगटन डीसी स्थित हमारा दूतावास लगातार अमेरिकी प्रशासन से संपर्क में है। अमेरिकी पक्ष ने भी आगे की प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) जारी किए हैं। यह स्थिति अभी विकसित हो रही है और विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है।”
भारतीय पेशेवरों पर असर
19 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत 21 सितंबर से अमेरिकी कंपनियों को हर H-1B आवेदन के लिए 1 लाख डॉलर शुल्क देना होगा। पहले यह शुल्क कंपनी के आकार के आधार पर 2,000 से 5,000 डॉलर तक होता था। नया नियम खासतौर पर उन भारतीय पेशेवरों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, जो अमेरिका में टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और हेल्थकेयर क्षेत्र में काम करने के इच्छुक हैं।
H-1B वीज़ा की पृष्ठभूमि
H-1B वीज़ा की शुरुआत 1990 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल में हुई थी। आज भारतीय कर्मचारी इस वीज़ा के सबसे बड़े लाभार्थी हैं। पिछले साल स्वीकृत कुल H-1B वीज़ाओं में से 71% भारतीयों को और 11.7% चीनी नागरिकों को मिले थे।
NATO महासचिव के दावे को खारिज
विदेश मंत्रालय ने NATO महासचिव मार्क रूट के उस बयान को भी पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि अमेरिकी टैरिफ दबाव के चलते भारत ने रूस से यूक्रेन युद्ध पर उसकी रणनीति समझाने को कहा। मंत्रालय ने इसे “तथ्यों से परे और पूरी तरह आधारहीन” बताया और कहा कि ऐसी कोई बातचीत नहीं हुई है। साथ ही NATO प्रमुख को भविष्य में इस तरह के बयान देने से पहले सावधानी बरतने की सलाह दी।






