सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों को मतदान का अधिकार देने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिका में यह मांग की गई है कि जेलों में स्थानीय कैदियों के लिए मतदान केंद्र स्थापित किए जाएं और इसके लिए आवश्यक दिशानिर्देश जारी किए जाएं।
जनहित याचिका में दिए गए तर्क
याचिकाकर्ता ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(5) को चुनौती दी है, जो वर्तमान में सभी कैदियों को मतदान के अधिकार से वंचित करती है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह पूर्ण प्रतिबंध समानता के संवैधानिक सिद्धांतों और नागरिकों के मतदान अधिकार का उल्लंघन करता है।
याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब विचाराधीन कैदी अभी दोषी सिद्ध नहीं हुए हैं, तो उन्हें मतदान से क्यों रोका जा रहा है, जबकि जमानत पर रिहा व्यक्ति अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। इसके साथ ही, इसमें भारत के सख्त प्रतिबंध की तुलना अन्य लोकतांत्रिक देशों की उदार नीतियों से की गई है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) मामले का भी उल्लेख किया है, जिसमें मतदान को एक संवैधानिक अधिकार माना गया था। यह 1997 के अनुकूल चंद्र प्रधान बनाम भारत संघ मामले से भिन्न दृष्टिकोण है, जिसमें मतदान को केवल वैधानिक अधिकार बताया गया था।






