अमीरजादों का “संस्कार पैकेज”
Delhi में रील बनाते-बनाते एक युवक की जान चली गई। गाड़ी नाबालिग चला रहा था, पर आत्मविश्वास पूर्ण वयस्कों जैसा—क्योंकि पापा का विश्वास था, “बेटा है, संभाल लेंगे।” आजकल सम्पन्न परिवारों में बच्चों को दो चीज़ें जन्म से मिलती हैं—लक्ज़री कार की चाबी और यह भरोसा कि कानून भी घरेलू स्टाफ की तरह “मैनेज” हो जाएगा।
संस्कार? वह तो इंटीरियर डेकोरेशन की तरह ड्राइंग रूम में शोपीस बनाकर रखे जाते हैं। शिक्षा? वह डिग्री तक सीमित है; चरित्र निर्माण सिलेबस में नहीं आता। रील पर लाइक चाहिए, सड़क पर ब्रेक नहीं।
जब गलती होती है तो बयान तैयार रहता है—“बच्चे हैं, गलती हो गई।” सच तो यह है कि गलती बच्चों से कम, पालने वालों से ज्यादा हुई है। कालीन के नीचे छिपाई गई गंध कभी-न-कभी बाहर आती ही है—बस तब तक कोई निर्दोष उसकी कीमत चुका चुका होता है।







