Home » ताजा खबर » “गाय सेवा का महत्व, श्राद्ध की परंपरा और मंत्र-जप की शक्ति: धर्म, विज्ञान और जीवन का संतुलन”

“गाय सेवा का महत्व, श्राद्ध की परंपरा और मंत्र-जप की शक्ति: धर्म, विज्ञान और जीवन का संतुलन”

गाय को हर दिन पहली रोटी खिलाने के धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व क्या है एवं पित्रों का तर्पण श्राद्ध क्यों किया जाता है आओ जानें

हिन्दू धर्म में गाय को रोटी खिलाने का विशेष महत्व होता है. ऐसी मान्यता है गाय में 33 कोटि देवाताओं का वास होता है. हिन्दू मान्यताओं में गाय को मां का दर्जा दिया गया है.ऐसा माना जाता है कि आप हर दिन गाय को रोटी खिलाकर करोड़ों देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं.*

साथ ही यह भी मान्यता है कि गाय को रोटी, चारा या गुड़ आदि खिलाने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है. इससे कुंडली में पितृ और शनि दोष दूर होते हैं.

आपको बता दें गाय को रोटी खिलाने के पीछे केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी है. आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से…

धार्मिक महत्व
अगर आप गाय को रोटी खिलाते हैं, तो इससे श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है. क्योंकि भगवान कृष्ण को गाय बहुत प्रिय थी. इससे आपके जीवन में सकारात्मकता आती है. मान्यता है गाय को रोटी खिलाने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है, क्योंकि इसमें सभी देवताओं का वास होता है.

वैज्ञानिक महत्व्
गाय के दूध में स्वर्ण तत्व होता है, जो रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है. वहीं, गौमाता को रोटी खिलाने से समाज और पर्यावरण को भी लाभ मिलता है, इससे मानवता का विकास होता है साथ ही, गौ संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है.

गाय से जुड़ी जरूरी बातें
* गाय को लेकर कहा जाता है कि इसके गले में घंटी जरूर बांधें क्योंकि इसकी आवाज से वास्तु दोष दूर होते हैं.

* यह भी कहा जाता है कि गाय की खुर्र में नागदेवता का वास होता है. ऐसे में जहां भी गाय का वास होता है वहां सांप-बिच्छू नहीं आते. इसके अलावा एक आंख में सूर्य और दूसरी में चंद्र देव विराजते हैं.

* वहीं, गाय की पूंछ में हनुमान जी का वास होता है, जिससे बुरी नजर नहीं लगती है. इसका झाड़ा लगाने से नजर उतर जाती है. आपको बता दें कि काली गाय की सेवा करने से ग्रह दोष दूर होते हैं. इसके अलावा गाय की सेवा करने से अटके हुए कार्य संपन्न होते हैं. यह घर की सुख शांति को भी बनाए रखता है.

* गाय के दूध में घी, मक्खन, दही, गोबर और गो मूत्र में कई रोगों को नाश करने की क्षमता होती है. इन्हें आयुर्वेद में असाध्य रोगों को ठीक करने में मदद ली जाती है।

नमक का महत्व स्वास्थ्य और ज्योतिष में भूमिका

नमक का स्वास्थ्य पर प्रभाव:- खाने में नमक का होना बेहद आवश्यक है। इसके बिना भोजन का स्वाद अधूरा सा लगता है। चिकित्सकों के अनुसार, नमक हमारे शरीर के लिए आवश्यक है, क्योंकि इसमें आयोडीन होता है, जो हमारे मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने में मदद करता है।

यदि शरीर में नमक की कमी हो जाए, तो रक्तचाप में गिरावट आ सकती है और व्यक्ति कमजोरी महसूस कर सकता है। इस प्रकार, नमक का हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान है।

ज्योतिष में नमक का महत्व
* आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ज्योतिष शास्त्र में भी नमक की एक खास भूमिका है। इसके अनुसार, नमक में अद्भुत शक्तियाँ होती हैं, जो न केवल आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं, बल्कि सुख और समृद्धि भी लाती हैं।

* आज हम आपको एक ऐसा उपाय बताने जा रहे हैं, जिससे आप अपने जीवन में लाभ उठा सकते हैं। जब भी आप नमक खरीदें, तो उसमें एक लौंग मिलाना न भूलें। इसके अलावा, नमक को परमात्मा के समक्ष भोग के रूप में अर्पित करें।

* लौंग मिलाने का उद्देश्य यह है कि परिवार के सभी सदस्य जब उस नमक का सेवन करेंगे, तो उन्हें सकारात्मक वाइब्रेशन प्राप्त होगा। भोग लगाने से नमक प्रसाद बन जाता है, जो आपके घर में और भी अधिक सकारात्मकता लाता है।

वैदिक मंत्रों के जप के प्रकार : 1. वैखरी, 2. मध्यमा, 3. पश्यंती और 4. परा

1. वैखरी : उच्च स्वर से जो जप किया जाता है। उसे वैखरी मंत्र जप कहते हैं।

2. मध्यमा : इसमें होंठ भी नहीं हिलते व दूसरा कोई व्यक्ति मंत्र को सुन भी नहीं सकता।

3. पश्यंती : जिस जप में जिह्वा भी नहीं हिलती, हृदयपूर्वक जप होता है। और जप के अर्थ में हमारा चित्त तल्लीन होता जाता है उसे पश्यंती मंत्र जाप कहते हैं।

4. परा : मंत्र के अर्थ में हमारी वृत्ति स्थिर होने की तैयारी हो, मंत्र जप करते-करते आनंद आने लगे तथा बुद्धि परमात्मा में स्थिर होने लगे, उसे परा मंत्र जप कहते हैं।

जप का प्रभाव : वैखरी से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव मध्यमा में होता है। मध्यमा से 10 गुना प्रभाव पश्यंती में तथा पश्यंती से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव परा में होता है। इस प्रकार परा में स्थित होकर जप करें तो वैखरी का हजार गुना प्रभाव हो जाएगा।

पौराणिक मंत्र के प्रकार :-

पौराणिक मंत्र जप के प्रकार : 1. वाचिक, 2. उपांशु और 3. मानसिक।

1. वाचिक : जिस मंत्र का जप करते समय दूसरा सुन ले, उसको वाचिक जप कहते हैं।

2. उपांशु : जो मंत्र हृदय में जपा जाता है।

उसे उपांशु जप कहते हैं।

3. . मानसिक : जिसका मौन रहकर जप करें, उसे मानसिक जप कहते हैं।

वैज्ञानिकों का भी मानना है। कि ध्वनि तरंगें ऊर्जा का ही एक रूप हैं। मंत्र में निहित बीजाक्षरों में उच्चारित ध्वनियों से शक्तिशाली विद्युत तरंगें उत्पन्न होती हैं। जो चमत्कारी प्रभाव डालती हैं।

सकारात्मक ध्वनियां शरीर के तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं। जबकि नकारात्मक ध्वनियां शरीर की ऊर्जा तक का ह्रास कर देती हैं। मंत्र और कुछ नहीं, बल्कि सकारात्मक ध्वनियों का समूह है। जो विभिन्न शब्दों के संयोग से पैदा होते हैं।

मंत्रों की ध्वनि से हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों सकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं। स्थूल शरीर जहां स्वस्थ होने लगता हैं। वहीं जब सूक्ष्म शरीर प्रभावित होता है। तो हम में या तो सिद्धियों का उद्भव होने लगता है। या हमारा संबंध ईथर माध्यम से हो जाता है। और इस तरह हमारे मन व मस्तिष्क से निकली इच्छाएं फलित होने लगती हैं।

निश्चित क्रम में संग्रहीत विशेष वर्ण जिनका विशेष प्रकार से उच्चारण करने पर एक निश्चित अर्थ निकलता है। अंत: मंत्रों के उच्चारण में अधिक शुद्धता का ध्यान रखा जाता है। अशुद्ध उच्चारण से इसका दुष्प्रभाव भी हो सकता है।

रामचरित मानस में मंत्र जप को भक्ति का 5 वां प्रकार माना गया है। मंत्र जप से उत्पन्न शब्द शक्ति संकल्प बल तथा श्रद्धा बल से और अधिक शक्तिशाली होकर अंतरिक्ष में व्याप्त ईश्वरीय चेतना के संपर्क में आती है। जिसके फलस्वरूप मंत्र का चमत्कारिक प्रभाव साधक को सिद्धियों के रूप में मिलता है।

शाप और वरदान इसी मंत्र शक्ति और शब्द शक्ति के मिश्रित परिणाम हैं। साधक का मंत्र उच्चारण जितना अधिक स्पष्ट होगा, मंत्र बल उतना ही प्रचंड होता जाएगा।

मंत्रों में अनेक प्रकार की शक्तियां निहित होती है। जिसके प्रभाव से देवी-देवताओं की शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र एक ऐसा साधन है। जो मनुष्य की सोई हुई सुसुप्त शक्तियों को सक्रिय कर देता है।

श्राद्ध न करनेवालेको कष्ट

श्राद्ध न करनेसे मृत प्राणी के कष्टों की कोई सीमा नहीं होती। पर श्राद्ध न करनेवालेको भी पग-पगपर कष्टका सामना करना पड़ता है। मृत प्राणी बाध्य होकर श्राद्ध न करनेवाले अपने सगे-सम्बन्धियोंका रक्त चूसने लगता है –

श्राद्धं न कुरुते मोहात् तस्य रक्तं पिबन्ति ते । (ब्रह्मपुराण)

साथ-ही-साथ वे शाप भी देते हैं-

…पितरस्तस्य शापं दत्त्वा प्रयान्ति च। (नागरखण्ड)

फिर इस अभिशप्त गृहस्थ परिवारको जीवनभर कष्ट-ही-कष्ट झेलना पड़ता है। उस परिवार में पुत्र नहीं उत्पन्न होता, कोई नीरोग नहीं रहता, लम्बी आयु नहीं होती, दुर्घटना होती रहती है बच्चो को भी दुख तकलीफ आती रहती है। किसी तरह कल्याण नहीं प्राप्त होता और मरनेके बाद नरक भी जाना पड़ता है।
उपनिषद्में भी कहा गया है कि ‘देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्’ (तै०उप० १।११।१)। अर्थात् देवता तथा पितरोंके कार्योंमें मनुष्यको कदापि प्रमाद नहीं करना चाहिये।
पिता जीवित हैं तो पिता ही हर अमावस्या पर तीर्थजल में खड़े होकर पूर्वजों के लिये तर्पण आदि करें वह भी काले तिल मिश्रित। और ब्राह्मण भोज व देवी स्वधा स्तोत्र तो अनिवार्य है ही । कुछ न हो तो तर्पण के बाद गौ को चारा ही खिला दें। पितरों के लिए श्री शिव पूजा व श्री हरि पूजा भी कर सकते हैं।

गयामें श्राद्ध करनेकी अत्यधिक महिमा है। शास्त्रोंमें लिखा है-

जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात्।

गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिर्युत्रस्य पुत्रता ॥

(श्रीमद्देवीभागवत ६।४।१५)

जीवनपर्यन्त माता-पिताकी आज्ञाका पालन करने, श्राद्ध में खूब भोजन कराने ( सामर्थ्य के अनुसार) और गयातीर्थमें पितरोंका पिण्डदान अथवा गयामें श्राद्ध करनेवाले पुत्रका पुत्रत्व सार्थक है।

‘ गयाभिगमनं कर्तुं यः शक्तो नाभिगच्छति…..

‘जो गया जानेमें समर्थ होते हुए भी नहीं जाता है, उसके पितर सोचते हैं कि उनका सम्पूर्ण परिश्रम निरर्थक है।

अतः मनुष्यको पूरे प्रयत्नके साथ गया जाकर सावधानीपूर्वक विधि-विधानसे पिण्डदान करना चाहिये।’

विविध श्राद्ध-

उत्तमषोडशीके श्राद्धोंकी पुनरावृत्तिका निम्नलिखित क्रम है-

(१) ऊनमासिक (पाक्षिक) – मृत्युतिथिसे ठीक बीसवें दिन ।

(२) प्रथम मासिक-प्रथम मासके पूर्ण होनेपर द्वितीय मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(३) त्रैपाक्षिक-मृत्युतिथिसे डेढ़ महीनेपर उसी तिथिको ।

(४) द्वितीय मासिक-तृतीय मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(५) तृतीय मासिक-चतुर्थ मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(६) चतुर्थ मासिक-पंचम मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(७) पंचम मासिक-षष्ठ मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(८) ऊनषाण्मासिक-मृत्युतिथिसे साढ़े पाँच महीनेपर उसी तिथिको।

(९) षाण्मासिक-सप्तम मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(१०) सप्तम मासिक- अष्टम मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(११) अष्टम मासिक- नवम मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(१२) नवम मासिक-दशम मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(१३) दशम मासिक- एकादश मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(१४) एकादश मासिक- द्वादश मासके प्रथम दिन मृत्युतिथिपर।

(१५) ऊनाब्दिक-मृत्युतिथिसे साढ़े ग्यारह महीनेपर उसी तिथिको।

(१६) आब्दिक (वार्षिक) – बारहवें मासके पूर्ण होनेपर त्रयोदश मासके प्रथम दिन (वार्षिक मृत्युतिथिपर)।
शेष विधि गरुड पुराण.।

ASTROLOGY VASTU EXPERTS

sssrknews
Author: sssrknews

इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया जारी करें

Leave a Comment

Share This