1979 में दिल्ली की 20 वर्षीय शशि बाला, जो छह महीने की गर्भवती थीं, दहेज की मांग पूरी न होने पर जिंदा जला दी गईं। इस दर्दनाक घटना को “किचन हादसा” बताकर दबाने की कोशिश हुई, लेकिन उनकी मां सत्या रानी चड्डा ने हार मानने से इनकार कर दिया।
जब न्याय के लिए दरवाजे खटखटाए गए, तो कानून ने कहा कि शादी के बाद की मांग दहेज नहीं मानी जाएगी। एक मां के लिए यह सिर्फ बेटी की मौत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की बेरुखी थी। इसके बाद सत्या रानी चड्डा ने अदालतों से लेकर सड़कों तक लंबी लड़ाई लड़ी और अपने दर्द को आंदोलन में बदल दिया।
* 1979 में गर्भवती शशि बाला की दहेज हत्या हुई
* घटना को “किचन हादसा” बताकर दबाने की कोशिश हुई
* मां सत्या रानी चड्डा ने 34 साल तक न्याय की लड़ाई लड़ी
* 1987 में “शक्ति शालिनी” संस्था की स्थापना की
* संस्था आज भी दहेज और घरेलू हिंसा पीड़ित महिलाओं की मदद करती है
* उनकी लड़ाई के बाद IPC की धारा 498A लागू हुई
* IPC 304B में “दहेज मृत्यु” को कानूनी पहचान मिली
* Evidence Act में बदलाव कर आरोपियों की जवाबदेही बढ़ाई गई
NCRB की 2023 रिपोर्ट के अनुसार, आज भी भारत में हर साल 6,000 से अधिक महिलाएं दहेज हत्या का शिकार होती हैं। सत्या रानी चड्डा की कहानी सिर्फ एक मां के संघर्ष की नहीं, बल्कि हजारों बेटियों के लिए न्याय की आवाज़ बनने की कहानी है।
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