सम्पूर्ण धर्मराज चित्रगुप्त परिवार का ऐसा दुर्लभ और अलौकिक चित्र इससे पूर्व शायद ही कभी किसी ने देखा हो। अनेक चित्रकारों ने भगवान चित्रगुप्त के चित्र बनाए, परंतु अधिकांश चित्रों में माताओं को चरणों में बैठी हुई मुद्रा में ही चित्रित किया गया।
निस्संदेह भारतीय संस्कृति में पत्नी का पति के चरणों में बैठना सम्मान, श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है, किन्तु प्रत्येक चित्र में शक्ति-स्वरूपा माताओं को केवल उसी रूप में सीमित कर देना उचित प्रतीत नहीं होता। नारी केवल समर्पण नहीं, वह शक्ति है, सहधर्मिणी है, सिंहासन की सहभागी है। कभी तो ऐसा चित्र होना चाहिए जहाँ माताएँ प्रभु के साथ सम्मानपूर्वक विराजमान दिखाई दें, न कि केवल सेवा करती हुई।
शायद यही वह दुर्लभ और साहसिक चिंतन है, जिसे पहली बार इतनी सुंदरता और भव्यता के साथ #उत्कर्ष_खरे_जी ने अपने चित्र में साकार किया है। इस चित्र में भगवान चित्रगुप्त का सम्पूर्ण परिवार राजसी वैभव के साथ जीवंत दिखाई देता है। माताएँ प्रभु के समीप आदरपूर्वक विराजमान हैं, राजकुमार तेज और पराक्रम के प्रतीक प्रतीत होते हैं, और सम्पूर्ण दृश्य ऐसा आभास देता है मानो किसी दिव्य लोक का साक्षात् दर्शन हो रहा हो।
यह केवल एक चित्र नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही कल्पनाओं से अलग हटकर किया गया एक अभिनव प्रयास है। संभवतः इससे पहले किसी ने भगवान चित्रगुप्त के सम्पूर्ण परिवार को इतनी गरिमा, संतुलन और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के साथ चित्रित करने का साहस नहीं किया। Utkarsh Khare का इस अनुपम, दुर्लभ और विचारोत्तेजक कृति के लिए हृदय से साधुवाद एवं अभिनंदन के पात्र हैं।






