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142 की रफ्तार, 12 साल पुराना कर्ज़ और एक बेटी की ज़िंदगी

मैं उसे 142 किमी/घंटा की रफ्तार से गाड़ी चलाने पर चालान काटने ही वाली थी, लेकिन जैसे ही मैंने उसकी कनपटी पर वह पुराना निशान देखा, मेरी रगों में खून जम-सा गया।
वह वही था।
वह आदमी जिसने बारह साल पहले मेरी जान बचाई थी… और आज किस्मत मुझसे कह रही थी कि अब उसकी बारी है।

जुलाई का तपता हुआ मंगलवार था। दिल्ली–आगरा एक्सप्रेसवे पर दोपहर के ढाई बज रहे थे। सूरज सिर के ठीक ऊपर था, और डामर की सड़क गर्मी से चमक रही थी, जैसे पिघल रही हो। हवा में उठती गर्म लहरें दूर के नज़ारे को थरथराता हुआ दिखा रही थीं।
ट्रैफिक पुलिस की सब-इंस्पेक्टर कविता शर्मा ने अपने काले चश्मे ठीक किए और स्पीड गन पर नज़र डाली। एक काली बीएमडब्ल्यू बिजली की तरह गुज़री—रफ्तार: 142 किमी/घंटा। जबकि सीमा थी सिर्फ 90।

रूटीन।
तीन साल की नौकरी में वह यह सैकड़ों बार कर चुकी थी।

उसने नीली बत्ती जलाई, सायरन की छोटी लेकिन सख़्त आवाज़ गूंजी, और वह बाइक से उसके पीछे निकल पड़ी। कार भागी नहीं। कुछ ही दूर जाकर शालीनता से किनारे रुक गई—उसकी रफ्तार के बिल्कुल उलट।

कविता ने पीछे बाइक रोकी, अपनी वर्दी पर एक नज़र डाली—एक ऐसा कवच जो बहुत कुछ छुपा लेता है—और चालान बुक हाथ में लेकर ड्राइवर की खिड़की तक पहुँची। मन में वही घिसे-पिटे बहाने गूंज रहे थे:
“ध्यान नहीं रहा”, “ज़रूरी काम था”, “मीटर खराब है”।

ड्राइवर ने शीशा नीचे किया।

कार के अंदर की ठंडी हवा कविता के चेहरे से टकराई, लेकिन जो उसने देखा—वह कहीं ज़्यादा सर्द था।

ड्राइवर करीब पैंतीस साल का रहा होगा। सफ़ेद शर्ट पसीने से चिपकी हुई, टाई ढीली—जैसे गला घोंट रही हो। उसके हाथ स्टेयरिंग पर इतनी ज़ोर से जकड़े थे कि उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं।
लेकिन कविता की नज़र वहीं नहीं रुकी।

उसकी आँखें।
लाल, थकी हुई, और किसी अनकहे डर से भरी हुई।

और फिर उसने देखा—
बाईं कनपटी पर एक पतली-सी सफ़ेद काट की पुरानी निशानी।

वक़्त थम गया।

हाईवे का शोर गायब हो गया।
और कविता बारह साल पीछे चली गई—नवंबर की एक रात, काले धुएँ और आग की लपटों से भरी हुई।

—“काग़ज़ दिखाइए,” —कविता ने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ उसे खुद अजनबी लगी।

आदमी ने उसकी ओर देखा… लेकिन जैसे देखा ही नहीं। उसकी नज़र किसी और ही डर में उलझी थी। काँपते हाथों से उसने लाइसेंस बढ़ाया।

अर्जुन मेहता।

वही नाम, जिसे कविता ने बरसों तक ढूँढा था।
वही आदमी, जिसने दिल्ली के एक जले हुए अपार्टमेंट में घुसकर, चौदह साल की घबराई हुई कविता को—दम घुटती हालत में—गोद में उठाकर बाहर निकाला था।
और फिर बिना नाम, बिना धन्यवाद लिए, भीड़ में खो गया था।

कविता ने खुद को संभाला। वह कुछ कहना चाहती थी—पूछना चाहती थी कि क्या उसे वह आग याद है—लेकिन तभी उसकी नज़र आगे वाली सीट पर पड़ी।

एक मुड़ा-तुड़ा काग़ज़।
ऊपर लिखा था:
“AIIMS, नई दिल्ली — बाल ऑन्कोलॉजी — आपात अपॉइंटमेंट — 3:00 PM”

पीछे की सीट पर एक छोटी-सी गुलाबी बैग थी, जिस पर कार्टून हाथियों और सितारों की स्टिकर लगी थीं।

घड़ी पर नज़र गई: 2:35 PM
AIIMS शहर के दूसरे छोर पर था। इस वक़्त के ट्रैफिक में—नामुमकिन।

—“मुझे पता है,” —अर्जुन ने टूटी हुई आवाज़ में कहा—“मैं तेज़ चला रहा था। चालान काट दीजिए… चाहें तो पकड़ लीजिए। लेकिन प्लीज़… मुझे पहुँचना ज़रूरी है।”

एक आँसू उसकी गाल से फिसल गया। उसने झुंझलाकर पोंछ लिया।
वह लापरवाही से नहीं भाग रहा था।
वह मौत से रेस लगा रहा था।

कविता ने अधूरा चालान देखा।
उसकी नज़र फिर उस निशान पर गई—वही निशान जो उस दिन बना था, जब उसने कविता की जान बचाई थी।

किस्मत ने अजीब खेल खेला था।
आज रोल बदल चुके थे।

कविता ने पेन जेब में रखा। चश्मा उतारा और पहली बार उसे एक इंसान की तरह देखा—पुलिस और नागरिक के बीच की दीवार गिराते हुए।

—“AIIMS जा रहे हैं?” —उसने शांत लेकिन सख़्त आवाज़ में पूछा।

अर्जुन ने हैरानी से सिर हिलाया।

—“हाँ… मेरी बेटी… तीन बजे से पहले पहुँचना बहुत ज़रूरी है।”

कविता ने बस एक बार सिर हिलाया।

—“मेरे पीछे आइए।”

—“क्या?” —अर्जुन की आँखें फैल गईं।

—“मैंने कहा, मेरे पीछे। मेरी बाइक से सटकर चलिए। और चाहे जो हो, रुकिए मत।”

कविता मुड़ी और अपनी बाइक की ओर दौड़ी।
आज वह चालान नहीं काटने वाली थी।
आज वह कर्ज़ चुकाने जा रही थी।

उसने सायरन चालू किया—रुकने वाला नहीं, बल्कि आपातकाल का तेज़ चीखता हुआ सायरन—और ट्रैफिक में घुस गई, रास्ता चीरती हुई, जैसे जमी हुई नदी में आइसब्रेकर।
​कविता की बाइक का सायरन दिल्ली के भारी ट्रैफिक में एक चीख की तरह गूँज उठा। दोपहर की तपती धूप में सड़कों पर गाड़ियों का हुजूम था, लेकिन कविता एक जुनून के साथ रास्ता बना रही थी। उसने अपनी बाइक को ज़िग-ज़ैग करते हुए बस, ऑटो और कारों के बीच से अर्जुन की बीएमडब्ल्यू के लिए रास्ता साफ़ किया।
​अर्जुन के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। वह आदमी, जो कुछ मिनट पहले कानून के शिकंजे में था, अब उसी कानून की छत्रछाया में अपनी बेटी की ज़िंदगी बचाने के लिए उड़ रहा था।
​रास्ते में कई लाल बत्तियाँ आईं, लेकिन कविता ने हाथ के इशारे और सायरन के दबदबे से हर चौराहे को पार कराया। धूल और धुएँ के बीच कविता का चेहरा पसीने से तर-बतर था, पर उसकी नज़रें सिर्फ सामने वाले लक्ष्य पर थीं।
​दोपहर के 2:56 बजे।
​एम्स (AIIMS) का गेट सामने था। कविता ने अपनी बाइक सीधे इमरजेंसी के करीब ले जाकर रोकी। अर्जुन ने अपनी गाड़ी ठीक उसके पीछे खड़ी की और बदहवास होकर बाहर निकला। उसने गाड़ी के पीछे वाले दरवाज़े से अपनी छोटी बेटी को गोद में उठाया, जो बीमारी की वजह से पीली पड़ चुकी थी।
​अर्जुन अंदर भागने ही वाला था कि वह रुका। उसने पीछे मुड़कर कविता को देखा। उसकी आँखों में कृतज्ञता का ऐसा समंदर था जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता था।
​”शुक्रिया…” अर्जुन का गला रुंध गया, “पता नहीं आप कौन हैं, लेकिन आपने आज मेरी दुनिया बचा ली।”
​कविता ने धीरे से मुस्कुराकर अपनी वर्दी पर लगे पुलिस के लोगो को छुआ और फिर अपनी कनपटी की ओर इशारा किया, जहाँ धुंधला-सा एक पुराना जलने का निशान अब भी था—शायद वह अर्जुन के निशान का ही जुड़वा था।
​”बारह साल पहले एक अनजान आदमी ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे आग से निकाला था,” कविता ने धीमी आवाज़ में कहा, “आज मैंने सिर्फ उस हाथ का बोझ हल्का किया है, अर्जुन जी। अब जाइए, गुड़िया को देर हो रही है।”
​अर्जुन की आँखें फटी की फटी रह गईं। यादों की एक धुंधली परत उसके दिमाग में कौंधी। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन कविता ने सख़्त लहजे में कहा, “ड्यूटी पहले, अर्जुन! अंदर जाइए!”
​अर्जुन सिर हिलाकर अंदर भागा। कविता वहीं खड़ी उसे देखती रही जब तक वह गलियारे में ओझल नहीं हो गया।
​उसने अपनी चालान बुक निकाली। वह पन्ना फाड़ा जिस पर उसने अर्जुन का नाम लिखा था और उसे मोड़कर अपनी जेब में रख लिया। उसने आज एक नियम तोड़ा था, लेकिन एक इंसान को टूटने से बचा लिया था।
​कविता ने अपना काला चश्मा वापस पहना, बाइक स्टार्ट की और वापस हाईवे की ओर मुड़ गई। सूरज अब भी तप रहा था, लेकिन उसकी रगों में जमा हुआ खून अब सुकून की गर्मी से पिघल चुका था।

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Author: sssrknews

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