‼️भाजपा मे कांग्रेसी डी एन ए वाले नेता ही संभाल रहे हैं पार्टी‼️😇
जो कल कांग्रेस से पैदा हुए आज बन रहे हैं मुख्यमंत्री! हेमंत विस्वा और सुवेंदु !दोनों मुख्यमंत्री कांग्रेस की पैदाइश!🙋♂️
✍️सुरेन्द्र चतुर्वेदी
ब्यावर के वरिष्ठ पत्रकार विजेंदर प्रजापति जॉली से बात हुई।उन्होंने जो कहा उसी पर टिका है मेरा आज का ब्लॉग।👇
क्या भाजपा में कांग्रेस डी एन ए ही हो रहा है क़ामयाब❓सुवेंदु या हेमन्त बिस्वा जो मुख्यमंत्री बन रहे हैं सभी कांग्रेस से आए हैं। यही कहना है जॉली साहब का।🤷♂️
भारतीय जनता पार्टी कभी कांग्रेस की “वंशवादी राजनीति” और “सत्ता आधारित संस्कृति” पर सबसे तीखे हमले करती थी। लेकिन राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि चुनाव जीतने की भूख़ अक्सर विचारधारा से भी बड़ी हो जाती है। आज भाजपा में वही नेता सबसे अधिक सफल दिखाई दे रहे हैं जो कभी कांग्रेस की प्रयोगशाला में तैयार हुए थे।🙄
पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी हों, असम में हेमन्त विस्वा हों, या दूसरे राज्यों में कांग्रेस पृष्ठभूमि से आये कई चेहरे! भाजपा उन्हें केवल स्वीकार ही नहीं कर रही बल्कि सत्ता के शीर्ष तक पहुँचा रही है।😍
सवाल यही है कि क्या भाजपा में अब “कांग्रेस डीएनए” ही सबसे अधिक उपयोगी साबित हो रहा है❓🥺
असल में यह केवल व्यक्तियों का मामला नहीं है, यह राजनीतिक कार्यशैली का मामला है। कांग्रेस के पुराने नेताओं में सत्ता संचालन, जातीय-सामाजिक समीकरण साधने, प्रशासनिक नेटवर्क खड़ा करने और चुनावी प्रबंधन का लंबा अनुभव होता है।💯
भाजपा का पारंपरिक कैडर वैचारिक रूप से मजबूत हो सकता है, लेकिन हर बार सत्ता जिताने वाली चुनावी मशीनरी वैचारिक कार्यकर्ताओं से नहीं चलती। वहाँ ज़मीन पर “मैनेजमेंट”, “नेटवर्क” और “स्थानीय प्रभाव” काम आता है।🙋♂️
यही कारण है कि भाजपा अब उन नेताओं को प्राथमिकता देती दिखती है जो जीत की गारंटी बन सकें, भले वे कल तक कांग्रेस में रहे हों।🤷♂️
*विडम्बना देखिए। भाजपा के पुराने समर्पित कार्यकर्ता वर्षों तक झंडा उठाते रहते हैं, संगठन के लिए संघर्ष करते रहते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी अक्सर उस व्यक्ति को मिलती है जो कुछ वर्ष पहले तक कांग्रेस में भाजपा को कोस रहा था।*🫢
इससे भीतर ही भीतर एक संदेश जाता है — विचारधारा से अधिक मूल्यवान “विजेता मानसिकता” है। हेमंत बिस्वा सरमा इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। कांग्रेस में रहते हुए वे संगठन और सत्ता संचालन के माहिर माने जाते थे। भाजपा में आये और थोड़े समय में पूर्वोत्तर की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन गये।👍
इसी तरह बंगाल राजनीती के पुरोधा सुवेंदु अधिकारी ने बंगाल में भाजपा को वह आक्रामक राजनीतिक शैली दी जिसकी उसे वर्षों से तलाश थी। भाजपा ने उन्हें केवल शामिल नहीं किया, बल्कि सत्ता के संभावित चेहरे के रूप में स्थापित किया।💁♂️
यहाँ सबसे बड़ा सवाल भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं के मन में है। क्या अब पार्टी में वैचारिक तपस्या की जगह राजनीतिक उपयोगिता ने ले ली है❓🤨
क्या संघ पृष्ठभूमि से निकले नेताओं की तुलना में “दलबदल कर आये प्रभावशाली चेहरे” अधिक भरोसेमंद माने जा रहे हैं❓😳
और सबसे अहम ये कि यदि कांग्रेस संस्कृति ही सत्ता दिला रही है तो फिर भाजपा और कांग्रेस की कार्यशैली में अंतर कितना बचा❓🤨
राजनीति में सफलता का अपना व्यावहारिक गणित होता है। भाजपा आज देश की सबसे बड़ी चुनावी मशीन बन चुकी है। उसे हर राज्य में जीत चाहिए। जहाँ संगठन कमजोर है वहाँ वह कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों से आये अनुभवी नेताओं का सहारा लेती है। इससे पार्टी का विस्तार तो हुआ, लेकिन उसके मूल कैडर में वैचारिक असहजता भी बढ़ी है।😳
यही कारण है कि आज भाजपा के भीतर दो धाराएँ दिखाई देती हैं —एक वह जो विचारधारा से बनी है, और दूसरी वह जो चुनाव जिताने की क्षमता से बनी है।💁♂️
फ़िलहाल सत्ता दूसरी धारा के साथ अधिक सहज दिखाई देती है।🙋♂️






