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गंगास्नान, पुष्य नक्षत्र और धर्मशास्त्र का रहस्य: जानिए सफलता, पुण्य और जीवनशुद्धि का सनातन मार्ग

Daily panchang,गंगास्नान करने पर भी क्यों नहीं मिटते पाप एवं सबसे उत्तम नक्षत्र पुष्य है जो सफलता की गारन्टी है

🌤️ दिनांक – 20 मई 2026
🌤️ दिन – बुधवार
🌤️ विक्रम संवत 2083
🌤️ शक संवत -1948
🌤️ अयन – उत्तरायण
🌤️ ऋतु – ग्रीष्म ॠतु
🌤️ मास – अधिक ज्येष्ठ
🌤️ पक्ष – शुक्ल
🌤️ तिथि – चतुर्थी सुबह 11:06 तक तत्पश्चात पंचमी
🌤️ नक्षत्र – आर्द्रा सुबह 06:11 तक तत्पश्चात पुनर्वसु
🌤️ योग – शूल दोपहर 02:10 तक तत्पश्चात गण्ड
🌤️*राहुकाल – दोपहर 12:35 से दोपहर 02:14 तक*
🌤️ सूर्योदय – 06:00
🌤️ सूर्यास्त – 07:10
दिशाशूल – उत्तर दिशा मे

गंगास्नान करने पर भी क्यों नहीं मिटते पाप एवं सबसे उत्तम नक्षत्र पुष्य है जो सफलता की गारन्टी है आओ जानें

पुराणों में गंगाजी की अपार महिमा बतलायी गयी है । जैसे – गंगा वह है जो सीढ़ी बनकर मनुष्य को स्वर्ग पहुंचा देती है, जो भगवद्-पद को प्राप्त करा देती है, मोक्ष देती है, बड़े-बड़े पाप हर लेती है, और कठिनाइयां दूर कर देती है । मनुष्य के दु:ख सदैव के लिए मिट जाने से उसे परम शान्ति मिल जाती है और वह जीते-जी जीवन्मुक्ति का अनुभव करने लगता है ।

गंग सकल मुद मंगल मूला ।
सब सुख करनि हरनि सब सूला ।। (तुलसीदासजी)

सिर्फ विश्वासहीन गंगास्नान करने पर भी नहीं मिटते पाप

कभी-कभी हमारे मन में यह शंका होती है कि हमने अनेक बार गंगाजी में स्नान कर लिया और वर्षों से गंगाजल का सेवन भी कर रहे हैं फिर भी हमारे दु:ख, चिन्ता, तनाव, भय, क्लेश और मन के संताप क्यों नहीं मिटे ? हमारे जीवन में शान्ति क्यों नहीं है ?

इसका बहुत सीधा सा उत्तर है – मनुष्य का भगवान और उनके वचनों पर विश्वास न करना । शास्त्रों और पुराणों में जो कुछ लिखा है वह भगवान के ही वचन हैं । यदि हम तर्क न करके पुराणों की वाणी पर अक्षरश: विश्वास करेगें तो उसका फल भी हमें अवश्य मिलेगा ।

ध्यान रहे—‘देवता, वेद, गुरु, मन्त्र, तीर्थ, औषधि और संत, ये सब श्रद्धा-विश्वास से ही फल देते हैं, तर्क से नहीं ।’

इस बात को एक सुन्दर कथा के द्वारा अच्छे से समझा जा सकता है ।

कथा
~~~
एक बार भगवान शंकर व पार्वतीजी घूमते हुए हरिद्वार पहुंचे ।

पार्वतीजी ने शंकरजी से पूछा—‘हजारों लोग गंगा में स्नान कर रहे हैं फिर भी इनके पापों का नाश क्यों नहीं हो रहा है ?’

शंकरजी ने उत्तर दिया—‘इन लोगों ने गंगास्नान किया ही नहीं है । ये तो केवल जल में स्नान कर रहे हैं । अब मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि वास्तव में गंगा में स्नान किसने किया ।’

भगवान शंकर ने गंगाजी के रास्ते में एक गड्ढा बनाकर उसे जल से भर दिया और साधारण मानव के वेष में उस गड्ढे में खड़े हो गए । शंकरजी कंधों तक जल में डूबे हुए थे । उन्होंने पार्वतीजी से कहा कि तुम गंगास्नान करके आने वालों से निवेदन करना कि—‘मेरे पति को इस गड्ढे से बाहर निकाल दो लेकिन शर्त यह है कि यदि तुमने अपने जीवन में कोई पाप नहीं किया हो तभी इन्हें बाहर निकालने की कोशिश करना अन्यथा इन्हें छूते ही तुम भस्म हो जाओगे ।’

कई दिन बीत गये । हजारों लोग गंगास्नान कर उस रास्ते से निकले लेकिन शर्त सुनते ही शंकरजी को छूने की हिम्मत नहीं करते और यह कहते हुए चले जाते कि हमने इस जन्म में तो कोई पाप नहीं किया है पर पूर्वजन्मों का क्या पता, पता नहीं हमसे कोई पाप हो गया हो ?

एक दिन एक व्यक्ति ने आकर पार्वतीजी से कहा—‘मैं आपके पति को इस गड्ढे से बाहर निकालूंगा ।’

पार्वतीजी ने पूछा—‘क्या आपने कभी कोई पाप नहीं किया है ?’

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया—‘मैंने बहुत पाप किये हैं किन्तु अभी-अभी मैंने गंगाजी में स्नान किया है इसलिए मेरे सारे पाप नष्ट हो गए और मैं निष्पाप हो गया हूँ ।’

उस व्यक्ति ने जैसे ही भगवान शंकर को गड्ढे से बाहर निकालने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, शंकरजी स्वत: ही गड्ढे से बाहर आ गये ।

भगवान शंकर ने पार्वतीजी से कहा—‘इसने वास्तव में गंगास्नान किया है क्योंकि इसको विश्वास है कि गंगाजी में स्नान करने से सारे पापों का नाश हो जाता है ।’

ऐसे प्राप्त करें गंगास्नान का पूरा पुण्यफल
गंगाजी की कृपा प्राप्ति के लिए उनमें अखण्ड विश्वास होना चाहिए इसलिए उनसे सांसारिक वस्तुएं न मांगकर सदैव यही मांगना चाहिए कि ‘आप अपनी कृपा से मुझे अपना अखण्ड विश्वास दीजिये ।’

गंगा में डुबकी लगाते समय यही भावना रखनी चाहिए कि ‘हम साक्षात् नारायण के चरण-कमलों से निकले अमृतरूप ब्रह्मद्रव में डुबकी लगा रहे हैं । मैंने जन्म-जन्मान्तर में जो थोड़े या बहुत पाप किये हैं, वे गंगाजी के स्नान से निश्चित रूप से नष्ट हो जायेंगे । त्रिपथगामनी गंगा मेरे पापों का हरण करने की कृपा करें ।’

शास्त्रों में कहा गया है कि ‘देवता बनकर ही देवता की पूजा करनी चाहिए ।’ शास्त्रों में तो यहां तक लिखा है कि गंगास्नान के लिए जाते समय झूठ बोलना, लड़ाई-झगड़ा, निन्दा-चुगली, क्रोध, लोभ, लालच आदि आसुरी वृत्तियों का त्याग कर देना चाहिए और दान, दया, करुणा, सत्य, परोपकार आदि दैवीय गुणों का जीवन में पालन करना चाहिए, तभी गंगास्नान सफल होता है ।

बहुत से लोग गंगास्नान करने तो जाते हैं किन्तु शास्त्रों में बतायी गयी विधि के अनुसार गंगास्नान नहीं करते हैं । तीर्थस्थान में ताश खेलना, सिगरेट पीना आदि कार्य करते हैं, इससे भी उन्हें गंगास्नान का पुण्यफल नहीं मिलता है ।
लोगों के पापों को धोती रहने वाली गंगाजी को अब ऐसी पुण्यात्माओं की प्रतीक्षा है जो गंगा में अपने पाप धोने नहीं वरन् पुण्य समर्पित करने आएं।

सबसे उत्तम नक्षत्र पुष्य है जो सफलता की गारन्टी है

सत्ताइस नक्षत्रों में आठवां नक्षत्र पुष्य को माना जाता है. सभी नक्षत्रों में सबसे उत्तम और अतिशुभ नक्षत्र. पुष्य का अर्थ है पोषण करने वाला, ऊर्जा और शक्ति प्रदान करने वाला. मान्यता है कि पुष्य, पुष्प से ही बना है जिसका अर्थ होता है शुभ, सुंदर और सुख संपदा देने वाला।
पुष्य को फूल की तरह खिलने वाला नक्षत्र माना गया है. और एक ताजे खिले हुए पुष्प की ही भांति पुष्य नक्षत्र के दौरान जो तरंगे निकलती है वो मनुष्य के अंदर और उसे आस-पास के वातावरण में बेहद मजबूत सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करती हैं. जिसके कारण जातक का हर काम सफलता के साथ पूर्ण होता है और इसलिए पुष्य नक्षत्र को नक्षत्रों का राजा कहा गया है।
पुष्य नक्षत्र का स्वामी शनि ग्रह होता है। ज्योतिषशास्त्र में भी पुष्य नक्षत्र को बेहद शुभ माना गया है. वार और पुष्य नक्षत्र के संयोग से रवि-पुष्य जैसे शुभ योग का निर्माण होता है. इस नक्षत्र में जिसका जन्म होता है वे दूसरों की भलाई के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, इन्हें दूसरों की सेवा और मदद करना अच्छा लगता है और ऐसे व्यक्ति अपनी मेहनत और लगन से जीवन में आगे बढ़ते हैं।

इसके अलावा किसी भी नए सामान की खरीदारी, सोना, चांदी की खरीदारी के लिए पुष्य नक्षत्र को सबसे पवित्र माना जाता है. पुष्य नक्षत्र में की गई खरीदारी और शुरू किए गए व्यापार में सदैव बरकत होती है, अपार धन की प्राप्ति होती है. क्योंकि पुष्य नक्षत्र के दौरान धन के देवता चंद्रमा हमेशा अपनी राशि कर्क में रहते हैं और धन का प्रबल योग बनाते हैं।

शास्त्रों में पुष्य नक्षत्र में पूजा कर पुण्य कमाने के तीन प्रावाधान बताएं गएं हैं. इसमें सबसे पहली विधि फूलों के द्वारा संपन्न होती है. जिसमें कुछ खास फूलों की मदद से जातक पुष्य नक्षत्र के शुभ फल का लाभ उठा सकते हैं. ठीक उसी तरह पुष्य नक्षत्र में शिव-पार्वती, इंद्र और बाबा भैरव की पूजा से धन-संपत्ति, वैभव और सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है. इतना ही नहीं पुष्य नक्षत्र के दौरान ग्रहों, से जुड़े कुछ खास विधि-विधान को करके आप अपने जीवन को सदा के लिए भय मुक्त बना सकते हैं।

भोजन करने का शास्त्रिय विधान व
स्त्री के साथ भोजन करने का कोई प्रायश्चित नहीं ।
● द्विज पैर धोकर — पूर्वाभिमुख होकर — दोनों पैर या एक पैर पृथ्वी पर रखते हुए भोजन के लिए आसन पर बैठे ।
= आर्द्रपादस्तु भुञ्जीयात् प्राङ्मुखश्चासने शुचौ ।
पादाभ्याम् धरणीं स्पृष्टवा पादेनैकेन वा पुनः ।।

● एक वस्त्र पहनकर तथा सारे शरीर को कपडे से ढककर भी भोजन न करें — उल्टी पत्तल पर भी भोजन करने का निषेध है ।

● भोजन करते समय दृष्टि इधर-उधर न डालें – दृष्टि भोजन पर रहे — और अन्न को नमस्कार करें — परोसे हुए अन्न की निन्दा न करें — क्योंकि जिस अन्न की निन्दा की जाती है उस अन्न को राक्षस खाते हैं।

” जुगुप्सितं च यच्चान्नं राक्षसा एव भुञ्जते। ”

● हाथ में जल लेकर उससे अन्न की प्रदक्षिणा कर आचमन करें — फिर ‘ प्राणाय स्वाहा ‘ आदि मंत्रों से पाँच प्राणों को आहुति दें — ( कारण कि भूख प्राणों को ही लगती है – प्राण वायुरूप हैं – जिससे उन प्राणों और उदरस्थ जठराग्नि में ही यहाँ अन्न का होम किया जाता है — इससे अन्न के संग्रह – व पकाने आदि के पाप से निवृत्ति हो जाती है ) । और वायु और अग्नि का यजन हो जाता है।

‘ पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात् समन्त्रं तु पृथक् पृथक् ।

● इसके विपरित भोजन करने वाला मूर्ख ब्राह्मण अन्न के द्वारा असुर – प्रेत और राक्षसों को ही तृप्त करता है ।
= अतोऽन्यथा तु भुञ्जानो ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
तेनान्नेनासुरान् प्रेतान् राक्षसांस्तर्पयिष्यति ।।

● जो ग्रास मुँह में जाने की अपेक्षा बडा होने कारण एक बार में ना खाया जा सके – उसमें से बचा हुआ ग्रास अपना उच्छिष्ट कहा गया है ।

● ग्रास के बचे हुए तथा मुँह से निकले हुए अन्न को अखाद्य समझें और उसे खा लेने पर चान्द्रायण – व्रत का आचरण करें ।
= पिण्डावशिष्टमन्यच्च वक्त्रान्निस्सृतमेव च।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्।।

● जो अपना झूठा खाता है तथा एक बार खाकर छोडे हुए भोजन को फिर ग्रहण करता है उसको चान्द्रायण — कृच्छ्र — अथवा प्राजापत्य – व्रत का आचरण करना चाहिए ।

■ जो पापी स्त्री के भोजन किये हुए पात्र में भोजन करता है — स्त्री का झूठा खाता है तथा स्त्री के साथ एक पात्र में भोजन करता है वह मानो मदिरा पान करता है — तत्वदर्शी मुनियों ने उस पाप से छूटने का कोई प्रायश्चित ही नहीं देखा है ।
= स्त्रीपात्रभुङ्नरः पापः स्त्रीणामुच्छिष्टभुक्तथा ।
तया सह च यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते मद्यमेव हि ।।
न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।।

● यदि पानी पीते – पीते उसकी बूँद मुँह से निकल कर भोजन पर गिर पडे तो वह खाने योग्य नहीं रह जाता — जो उसे खा लेता है — उस पुरुष को चान्द्रायण व्रत का आचरण करना चाहिए ।

● जिस भोजन में बाल या कोई कीडा पडा हो — जिसे मुँह से फूँककर ठंडा किया गया हो — उसको अखाद्य समझना चाहिए — ऐसे अन्न को भोजन कर लेने पर चान्द्रायण व्रत का आचरण करना चाहिए ।

● भोजन करने के स्थान से उठ जाने के बाद जिसे छू दिया गया हो — जो पैर से छू गया हो या लाँघ दिया गया हो — वह राक्षस का खाने योग्य अन्न है — ऐसा समझकर उसका त्याग कर देना चाहिए ।

● यदि आचमन किये बिना ही भोजन करने वाला द्विज भोजन के आसन से उठ जाये तो उसे तुरंत स्नान करना चाहिए — अन्यथा वह अपवित्र हो जाता है ।

महाभारत आश्वमेधिकपर्व के वैष्णवधर्मपर्व से साभार

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Author: sssrknews

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