Daily panchang
⛅दिनांक – 26 अप्रैल 2026
⛅दिन – रविवार
⛅विक्रम संवत् – 2083
⛅अयन – उत्तरायण
⛅ऋतु – ग्रीष्म
⛅मास – वैशाख
⛅पक्ष – शुक्ल
⛅तिथि – दशमी शाम 06:06 तक तत्पश्चात् एकादशी
⛅नक्षत्र – मघा रात्रि 08:27 तक तत्पश्चात् पूर्वाफाल्गुनी
⛅योग – वृद्धि रात्रि 10:28 तक तत्पश्चात् ध्रुव
⛅राहुकाल – शाम 05:15 से शाम 06:52 तक
⛅सूर्योदय – 05:57
⛅सूर्यास्त – 06:52
⛅दिशा शूल – पश्चिम दिशा में
घर में किन प्राणियों की धातु प्रतिमा रखी जाती है एवं पौराणिक ग्रंथों और आध्यात्मिक मान्यताऐ आओ जानें
घर में कई तरह की प्रतिमाएं होती हैं जिसमें से कुछ वास्तु अनुसार होती है और कुछ नहीं। जो नहीं होती है उसके नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं।
1. हाथी की मूर्ति :👉 घर में आप हाथी की मूर्ति रख सकते हैं। यह मूर्ति ठोस चांदी की या पीतल की होना चाहिए। हाथी ऐश्वर्य का प्रतीक है। शयनकक्ष में पीतल की प्रतिमा रखने से पति पत्नी के बीच मतभेद खत्म होते हैं और चांदी का हाथी रखने से राहु संबंधी सभी दोष दूर रहो जाते हैं। यह पंचम और द्वादश में बैठे राहु का उपाय है। हाथी की तस्वीर या मूर्ति घर में रखने से सकारात्मक उर्जा के साथ-साथ धन प्राप्ति के स्रोत बनते हैं।
2. हंस की मूर्ति :👉 घर में अतिथि कक्ष में हंस के जोड़ों की मूर्ति स्थापित करें जिससे अपार धन समृद्धि की संभावनाएं बढ़ जाएगी और घर में हमेशा शांति बनी रहेगी। दो हंसों के जगह आप दो बत्तख या दो सारस के जोड़े की मूर्ति भी लगा सकते हैं। इससे दांपत्य जीवन में भी सामंजस्य बना रहता है।
3. कछुआ :👉 घर में कछुआ रखने से उन्नति के साथ ही धन-समृद्धि का योग बनता है। इसे रखने से आयु भी लंबी होने की मान्यता है। पूर्व और उत्तर दिशा कछुए की स्थापना हेतु सर्वोत्तम मानी गई है। ड्राइंग रूम में कछुआ रख सकते हैं किसी पात्र में जल भर कर । कछुआ धातु का होना चाहिए लकड़ी का नहीं।
4. तोते की मूर्ति :👉 वास्तु के अनुसार तोते की मूर्ति या तस्वीर को अध्ययन कक्ष में रखना चाहिए या जहां बच्चे पढ़ाई करते हैं वहां रखना या लगाना चाहिए। तोता पालना नहीं चाहिए बल्की उसी तस्वीर या प्रतिमा घर में रखने से लाभ होता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तर दिशा में तोते की तस्वीर को लगाने से पढ़ाई में बच्चों की रुचि बढ़ती है, साथ ही उनकी स्मरण क्षमता में भी वृद्धि होती है। तोता प्रेम, वफादारी, लंबी आयु और सौभाग्य का प्रतीक होता है। अगर आप घर में बीमारी, निराशा, दरिद्रता और सुखों का अभाव महसूस कर रहे हैं तो तोते का चित्र या मूर्ति घर में स्थापित करें। पति और पत्नी में प्रेम संबंध स्थापित करने के लिए भी फेंगशुई के अनुसार तोते के जोड़े को स्थापित किया जाता है। तोता 5 तत्वों का संतुलन स्थापित करने में सहायक होता है। तोते के रंग-बिरंगे पंख वास्तव में पृथ्वी, अग्नि, जल, लकड़ी और धातु के प्रतीक हैं। तोता सौभाग्य की वृद्धि करता है।
5. मछली की मूर्ति :👉 कई लोग घर में एक्वेरियम में मछली पालते हैं परंतु उससे ज्यादा उचित होता है मछली की पीतल या चांदी की मूर्ति बनवाकर घर में रखना। वास्तु अनुसार यह मूर्ति घर में खुशहाली और शांति को दृढ करके उन्नति के मार्ग खोलती है। मछली अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, धन और शक्ति का प्रतीक है। इस मूर्ति को आप अपने घर की उत्तर-पूर्व या पूर्व दिशा में ही रख सकते हैं।
6. गाय बछड़े की मूर्ति :👉 बहुत से घरों में बछड़े को दूध पिला रही कामधेनु गाय की पीतल की मूर्ति होती है। गाय की मूर्ति रखने से संतान प्राप्ति के साथ ही मानसिक शांति मिलती है। फेंगशुई में भी इसका महत्व बताया गया है। पढ़ाई में एकाग्रता के लिए भी इस मूर्ति को घर में स्थापित करते हैं।
7. ऊंट की मूर्ति :👉 ऊंट की मूर्ति भी घर में रखने का प्रचलन है। ऊंटों के जोड़े की मूर्ति को ड्राइंगरूम या लिविंग रूम में उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर रखा जाता है। ऊंट कठिन परिश्रम का प्रतीक है। करियर में उन्नति हेतु या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में ऊंटों की मूर्ति या तस्वीर रखी जाती है। यह मन को स्थिर रखकर सफलता प्रदान करता है। परिवार के लोग मानसिक रूप से सुदृड़ और शान्ति से रहते हैं।
नोट 👉 बहुत से लोगों के घरों में वस्तु के रूप में बैल, भैसा, शेर, चुहे, घोड़े, नर्मदा शिवलिंग, श्वेतार्क गणपति, सिंघम लक्ष्मी शंख, नजर बट्टू, द्वारिका शिला, नागमणि, पारद शिवलिंग, हीरा शंख, गोमती चक्र, श्रीयंत्र, गौरोचन, मछलीघर, शिवलिंग, शालिग्राम, दक्षिणावर्ती शंख, मणि, नग, कौड़ी, समुद्री नमक, हल्दी की गांठ, रुद्राक्ष, हाथाजोड़ी, पारद शिवलिंग आदि सैकड़ों वस्तुएं हो सकती हैं, लेकिन घर में क्या और कहां कौन-सी वस्तु रखें इसके लिए वास्तु के जानकार से सलाह लें।
ज्योतिष में दशाओं का महत्व
ज्योतिष में दशाओं का महत्वपूर्ण स्थान है और व्यक्ति के जीवन के संपूर्ण घटनाक्रम में यह अपना विशेष प्रभाव डालती हैं। यह दशाएं ग्रहों द्वारा गत जन्म के कर्मफलों को इस जन्म में दर्शाने का माध्यम है। महादशाओं के गणना की पद्धति में नक्षत्रों पर आधारित दशा पद्धतियाँ अधिक लोकप्रिय हैं। वेदांग ज्योतिष में चंद्रमा जिस नक्षत्र में उस दिन होते हैं वह उस दिन का नक्षत्र कहलाता है व उस नक्षत्र का जो स्वामी ग्रह कहा गया है, उसकी महादशा जन्म के समय मानी जाती है। तदोपरांत क्रम अनुसार प्रत्येक नक्षत्र या ग्रह की महादशा जीवन में आती रहती है।
दशा क्रम में सबसे पहले विंशोत्तरी दशा का आगमन होता है और इसी के भितर अन्तर दशा, प्रत्यन्तर दशा, सूक्ष्म दशा, प्राण दशाएं आती हैं। प्रत्येक ग्रह महादशा के काल में सभी ग्रह अपनी-अपनी अंतर्दशा लेकर आते हैं। इसमें प्राण दशा सबसे कम अवधि की होती है और महादशा सबसे अधिक अवधि की मानी जाती है। महादशाओं का चक्र 120 वर्ष में पूरा होता है। इन दशाओं में पहली दशा तो जन्म नक्षत्र पर आधारित है।
कौन सी महादशा पहले मिलेगी यह जन्म समय चंद्रमा जिस नक्षर में होता है उस नक्षत्र के स्वामी ग्रह से जतक की महादशा आरंभ होती है। दशाओं के सभी काल क्रम में आपको सभी कुछ मिलता है। जन्म में अगर कोई दशा चल रही है तो यह कतई नहीं माना जाना चाहिए कि उस ग्रह से संबंधित समस्त कर्मो का फल मिल चुका है बल्कि यह संभव है कि संपूर्ण कर्मो का केवल कुछ प्रतिशत ही उस दशा में मिला होगा।
दशाओं का प्रभाव
ज्योतिषी के अनुसार सभी ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में सभी प्रकार का फल प्रदान करते हैं। ग्रह सर्वशक्ति संपन्न हैं और अच्छा-बुरा कोई भी फल दे सकते हैं। यह सत्य है कि वे अपनी दशा में आकर ही अपने संपूर्ण अच्छे-बुरे फलों का दर्शन कराती हैं। महादशा शब्द का अर्थ है वह विशेष समय जिसमें कोई ग्रह अपनी प्रबलतम अवस्था में होता है और कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभ-अशुभ फल देता है। ग्रहों की महादशा का समय निम्नानुसार है। सूर्य- 6 वर्ष, चन्द्र-10 वर्ष, मंगल- 7 वर्ष, राहु- 18 वर्ष, गुरु- 16 वर्ष, शनि- 19 वर्ष, बुध- 17वर्ष, केतु- 7 वर्ष और शुक्र- 20 वर्ष की होती है।
इन वर्षों में मुख्य ग्रहों की महादशा में अन्य ग्रहों की दशाएं आती हैं, जिसे अन्तर्दशा कहा जाता है। मुख्य ग्रह के साथ अन्तर्दशा के स्वामी ग्रह का भी प्रभाव फल का अनुभव होता है। जिस ग्रह की महादशा होगी, उसमे उसी ग्रह की अन्तर्दशा पहले आएगी अधिक सूक्ष्म गणना के लिए अन्तर्दशा में उन्ही ग्रहों की प्रत्यंतर दशा भी निकली जाती है, जो इसी क्रम से चलती है। इससे अच्छी-बुरी घटनाओं का पता लगाया जा सकता है। किसी ग्रह की महादशा में उसके शत्रु ग्रह की, पाप ग्रह की और नीचस्थ ग्रह की अन्तर्दशा अशुभ होती है। शुभ ग्रह में शुभ ग्रह की अन्तर्दशा अच्छा फल देती है।
स्वग्रही, मूल त्रिकोण या उच्च के ग्रह की दशा शुभ मानी जाती होती है। वैदिक ज्योतिष में अनेक दशाओं का वर्णन किया गया हैं परन्तु सरल, लोकप्रिय, सटीक एवं सर्वग्राह्य विंशोत्तरी दशा ही है। सूर्य आत्मा का, चन्द्रमा मन का, मंगल बल का, बुध बुद्धि का, गुरु जीव का, शुक्र स्त्री का और शनि आयु का कारक है। अत: इनकी महादशाओं का फलादेश देश, काल और परिस्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए फलादेश में परिस्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है।
जन्म से मृत्यु तक ग्रहों के प्रभाव से विभिन्न प्रकार की सुखद एवं दु:खद घटनाओं से प्रभावित होते है। ग्रह उच्च राशि में हो तो नाम, यश प्राप्त होता है तथा ग्रहों के अशुभ होने पर कष्ट प्राप्त होता है। जन्म नक्षत्र से दशा स्वामी किस नक्षत्र में है ये देखना चाहिए।
पौराणिक ग्रंथों और आध्यात्मिक मान्यताऐ
माता दुर्गा शक्ति का साक्षात स्वरूप हैं। वे अपने भक्तों की रक्षा विभिन्न रूपों और माध्यमों से करती हैं, जिनका विवरण नीचे दिया गया है:
* *भय का नाश:* देवी दुर्गा का ‘अभय मुद्रा’ वाला स्वरूप भक्तों को निर्भयता प्रदान करता है। जब भक्त सच्चे मन से माँ का स्मरण करते हैं, तो उनके भीतर का आत्मबल जागृत होता है, जिससे वे मानसिक चिंताओं और अज्ञात भय से मुक्त हो जाते हैं।
* *नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा:* माता दुर्गा को आदिशक्ति माना जाता है। उनके मंत्रों (जैसे दुर्गा सप्तशती के मंत्र) का जाप करने से घर और मन के आसपास एक सुरक्षा कवच निर्मित होता है, जो बुरी शक्तियों और नकारात्मक विचारों को दूर रखता है।
* *संकटों का निवारण:* ‘दुर्गा’ नाम का अर्थ ही है “जो दुर्ग (किले) के समान रक्षा करे” या “जो दुखों को दूर करे”। वे अपने भक्तों के मार्ग में आने वाली बाधाओं को अपनी शक्ति से नष्ट कर देती हैं। मार्कंडेय पुराण के अनुसार, वे महामारी, शत्रु बाधा और प्राकृतिक आपदाओं से अपने शरणागत की रक्षा करती हैं।
* *बुद्धि और विवेक का दान:* माँ केवल बाहरी शत्रुओं से ही नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह) से भी रक्षा करती हैं। वे भक्त को सही और गलत के बीच भेद करने का विवेक प्रदान करती हैं, जिससे भक्त गलत मार्ग पर जाने से बच जाता है।
* *शरण देने वाली (शरणागत वत्सला):* शास्त्रों में कहा गया है कि जो भी व्यक्ति पूर्ण समर्पण के साथ माँ की शरण में जाता है, माँ उसे अपनी गोद में स्थान देती हैं। “देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद” मंत्र के अनुसार, वे शरणागत की पीड़ा हरने वाली हैं।
* *शत्रु विजय:* जिस प्रकार माँ दुर्गा ने महिषासुर और शुंभ-निशुंभ जैसे असुरों का संहार किया, उसी प्रकार वे भक्तों के जीवन के संघर्षों में जीत हासिल करने के लिए उन्हें अजेय शक्ति प्रदान करती हैं।
माता दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल माध्यम *श्रद्धा और विश्वास* है। माँ के चरणों में किया गया अटूट विश्वास ही भक्त के लिए सबसे बड़ी ढाल बन जाता है।
एकादशी व्रत आज 27 अप्रैल क़ो व्रत किया जाएगा, व्रत कथा महत्व पूजा विधि उद्यापन कराने के लिए आप हमें सम्पर्क कर सकते हैं





