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जिसे मौत भी हरा न सकी: एलिज़ाबेथ रॉबिन्सन की अमर दौड़

पंद्रह साल की एलिज़ाबेथ को हर रोज़ स्कूल से घर जाने वाली ट्रेन पकड़नी होती थी. सहेलियों के साथ की वजह से अक्सर देर हो जाया करती. ट्रेन बहुत कम समय के लिए स्टेशन पर थमती थी. उसे पकड़ने के लिए बिजली की गति से भागती आती एलिजाबेथ को देखना उसके बायोलॉजी अध्यापक चार्ल्स प्राइस को आकर्षित करता था, जो खुद भी हर रोज़ उसी ट्रेन से चलता था. प्राइस एक ज़माने में एथलीट रह चुका था. एक दिन उसने अपनी स्टॉपवॉच पर एलिजाबेथ के भागने की रफ़्तार नापी तो वह दंग रह गया.

उसके कहने पर एलिजाबेथ ने बाकायदा दौड़ना शुरू किया और उसकी प्रतिभा का ऐसा डंका बजना शुरू हुआ कि कुछ ही माह बाद वह एक इनडोर प्रतियोगिता में 100 मीटर रेस की अमेरिकी चैम्पियन हेलेन फिल्की के साथ दौड़ रही थी. इस बार वह दूसरे नंबर पर रही लेकिन तीन महीने बाद उसके न सिर्फ फिल्की को परास्त किया, नया वर्ल्ड रेकॉर्ड भी बना डाला.

उसका तीसरा बड़ा कम्पीटीशन उसी बरस एम्सटर्डम ओलिम्पिक की सूरत में था जब 100 मीटर की रेस के फाइनल के लिए क्वालीफाई करने वाली वह इकलौती अमेरिकी बनी. उल्लेखनीय है कि उस साल पहली बार महिलाओं को ओलिम्पिक के एथलेटिक्स में भाग लेने की अनुमति मिली थी. एलिजाबेथ ने रेस जीती और कुल सोलह साल की आयु में पहली 100 मीटर ओलिम्पिक चैम्पियन बनी. सबसे कम उम्र में यह कारनामा करने का उसका यह कीर्तिमान आज तक कोई नहीं तोड़ सका है.

अमेरिका वापसी में उसका ऐतिहासिक स्वागत हुआ और सुनहरे बॉबकट बालों वाली दुबली सी एलिजाबेथ रॉबिन्सन अमेरिका की चहेती एथलीट बन गई. यह 1928 का साल था. उसने अगले ओलिम्पिक के लिए तैयारी करना शुरू कर दिया. वह जब भी भागती कोई नया कीर्तिमान रचती.

1931 के जून में वह रिश्ते के अपने एक भाई विल के छोटे प्राइवेट जहाज में उड़ान भर रही थी जब 600 मीटर की ऊंचाई पर जहाज क्रैश हो गया. जहाज़ नाक की सीध में नीचे गिरा और एक दलदल में धंस गया. बचाव करने वालों ने दोनों को अचेत पाया. जिस आदमी ने एलिजाबेथ को उठाया उसे लगा वह मर गई है.

उसने उसे अपनी गाड़ी की डिक्की में डाला और अस्पताल ले लाने के बजाय अंडरटेकर के पास ले गया. मृत देह की अंतिम तैयारी करने वाले को अंडरटेकर कहा जाता है. उसने एलिज़ाबेथ की देह में कुछ हरकत महसूस की और उसे अस्पताल पहुंचाया. उसकी टांग, कूल्हे और बांह की हड्डियों का कचूमर बन गया था लेकिन वह बच गई. विल को भी गंभीर चोटें आई थीं और कुछ समय बाद उसका पैर काटना पड़ा.

अस्पताल से छुट्टी देते हुए एलिजाबेथ को डाक्टरों ने बताया कि वह कुछ समय के बाद ही चल सकेगी. उसकी चाल में एक लचक भी आ जानी थी. डाक्टरों ने यह भी कहा फिर से दौड़ने के लिए उसे नया जन्म लेना होगा. ओलिम्पिक में एक और मैडल जीतने का सपना ध्वस्त हो गया.

धीरे-धीरे एलिजाबेथ ने बैसाखियों के चलना शुरू किया. कुछ माह बाद बैसाखियाँ छोड़ उसने चलना शुरू किया. फिर हल्की रफ़्तार में दौड़ना. चार साल बाद वह बाकायदा दौड़ रही थी. घुटने में आई चोट ने उसे 100 मीटर दौड़ के लिए अयोग्य बना दिया था क्योंकि दौड़ की शुरुआत में जिस तरह धावकों को झुक कर अपनी पोजीशन लेनी होती, वह वैसा नहीं कर पाती थी. अमेरिकी ओलिम्पिक संघ ने उसे 4 गुणा 100 मीटर की रिले रेस के लिए चुन लिया.

बर्लिन में 8 अगस्त 1936 को हुए इस रेस के फाइनल में अमेरिका का मुकाबला मेजबान जर्मनी से था. दूसरे राउंड तक जर्मनी की लड़कियां आगे चल रही थीं. तीसरे राउंड में एलिजाबेथ ने जर्मन प्रतिद्वंद्वी को पीछे छोड़ कर लीड हासिल कर ली और आख़िरी राउंड के लिए हेलेन स्टीफन्स को बेटन थमाया. अमेरिकी टीम ने गोल्ड जीता. एलिजाबेथ उर्फ़ बैटी रॉबिन्सन का यह दूसरा ओलिम्पिक गोल्ड मैडल खेल इतिहास की सबसे बेशकीमती उपलब्धियों में गिना जाता है.

इसके बाद एलिजाबेथ ने ट्रैक से संन्यास ले लिया और धीरे-धीरे लोग उसे भूलने लगे. चालीस साल बाद 1977 में उसे अमेरिकन हॉल ऑफ़ फेम में जगह मिली. हालांकि खुद एलिजाबेथ ने कभी किसी तरह की कोई बात सार्वजनिक रूप से नहीं की लेकिन उसके परिजनों को लगता था कि अमेरिकी सरकार और उसके खेल संगठनों ने एक चैम्पियन को वह इज्ज़त नहीं दी जिसकी वह हक़दार थी.

बहरहाल उन्नीस साल और बीते.

1996 के साल, जब वह डेनवर में रह रही थी, अटलांटा ओलिम्पिक खेलों की मशाल उसके शहर से गुज़री. कृशकाय हो चुकी एलिजाबेथ रॉबिन्सन को कुछ दूर तक उसे लेकर दौड़ने का अनुरोध किया गया.

ओलिम्पिक एसोसियेशन ने उसकी खराब हालत को देखने हुए सहायकों की व्यवस्था कर रखी थी लेकिन उसने किसी भी तरह की मदद लेने से इनकार कर दिया.

डेनवर की सड़कों पर भारी ओलिम्पिक मशाल को हाथों में उठाये 84 बरस की उस अम्मा को जिस-जिस पुराने खेलप्रेमी ने देखा उसे उसके चेहरे पर 1928 में ओलिम्पिक गोल्ड जीतने वाली, कटे बालों वाली उसी विनम्र किशोरी की झलक नज़र आई जिसे मौत भी पराजित नहीं कर सकी थी।

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Author: sssrknews

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