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पापी से “कल्लू दास” तक – एक हनुमान चालीसा ने बदल दी जिंदगी

यह कहानी किसी संत की नहीं है। यह आत्मकथा है। एक पापी आदमी की, जिसका जीवन भक्ति ने नहीं, भक्ति की एक छोटी सी चिंगारी ने पलट दिया।

पहला जीवन – गोरखपुर का कल्लू

मैं 1982 में गोरखपुर के तुर्कमानपुर में पैदा हुआ। बाप रिक्शा चलाता था, माँ बर्तन मांजती थी। दस साल की उम्र में स्कूल छूटा, बारह में बीड़ी, पंद्रह में दारू, सत्रह में पहली बार जेल।

काम क्या था – स्टेशन पर यात्रियों का सामान उठाना, फिर वही सामान गायब करना। फिर धीरे-धीरे हफ्ता वसूली, सट्टा, जमीन के फर्जी कागज। 2008 तक मेरे नाम पर चार मुकदमे – मारपीट, लूट, आर्म्स एक्ट।

लोग डरते थे। माँ मंदिर जाती, मैं हँसता। कहता, “तुम्हारा भगवान अगर है तो मेरे जैसे को उठा ले।” माँ रोती, मैं और पीता।

2014 में मेरी शादी हुई राधा से। वह बहुत सीधी थी। सोचा, शायद सुधर जाऊँ। नहीं सुधरा। शादी के छह महीने बाद मैंने उसके गहने बेचकर दारू पी। उसने कुछ नहीं कहा, बस रात भर रोई।

सबसे बड़ा पाप मैंने 2019 में किया। मेरे ही मोहल्ले के मास्टर जी, रामनरेश त्रिपाठी, रिटायर टीचर। उनकी पेंशन आती थी। मैंने दोस्तों के साथ मिलकर उनका एटीएम कार्ड बदल दिया। 1 लाख 80 हजार निकाले। दो दिन बाद उन्हें हार्ट अटैक आया। अस्पताल में मर गए। पुलिस ने मुझे नहीं पकड़ा, सबूत नहीं था। पर उनकी बेटी की आँखें आज भी मुझे दिखती हैं – जब अर्थी उठ रही थी, वह मुझे देख रही थी। जानती थी, बोल नहीं पाई।

उस रात मैं पहली बार डरा। दारू पी, पर नींद नहीं आई। लगा, कोई मेरे सीने पर बैठा है।

टूटने की शुरुआत

2021 में कोरोना आया। मेरा धंधा बंद। दोस्त भाग गए। घर में राशन नहीं। राधा ने अपने मायके से पैसे मंगवाकर घर चलाया। मैं दिन भर खाट पर पड़ा रहता।

एक दिन माँ बोली, “कल्लू, चल मेरे साथ। बनखंडी बाबा के मंदिर में भंडारा है।” मैंने गाली दी। वह अकेली चली गई।

शाम को लौटी, हाथ में एक छोटा सा पन्ना लाई। उस पर हनुमान चालीसा छपी थी, फटी हुई। बोली, “पुजारी ने दिया है, कह रहे थे किसी पापी के काम आएगा।”

मैंने फाड़ कर फेंक दिया। रात को नींद नहीं आई। उठा, तो वही पन्ना चारपाई के नीचे पड़ा था। हवा से उड़कर आया था शायद। मैंने उठाकर जेब में रख लिया। क्यों, पता नहीं।

अगले दिन मैं दारू लेने निकला। ठेके के पास एक बूढ़ा भिखारी बैठा था, काँप रहा था। मैंने जेब टटोली, पैसे नहीं थे। हाथ में वही पन्ना आया। मैंने हँसी में उसे दे दिया। बोला, “ले, इससे पेट भर ले।”

बूढ़े ने पन्ना खोला, पढ़ा नहीं, माथे से लगाया। बोला, “बेटा, तूने आज मुझे भगवान दे दिया।”

मैं झल्ला कर चला गया। पर उसके शब्द अटक गए।

पहला भजन

उसी रात मुझे सपना आया। मास्टर जी खड़े हैं, सफेद कुर्ते में। कुछ बोल नहीं रहे, बस देख रहे हैं। उनके पीछे वही बूढ़ा भिखारी खड़ा है, हाथ में वही पन्ना।

मैं हड़बड़ा कर उठा। सुबह चार बजे थे। पहली बार बिना दारू के नींद टूटी थी।

मैं छत पर गया। दूर से किसी मंदिर से आवाज आ रही थी – “श्री गुरु चरण सरोज रज…” हनुमान चालीसा।

मुझे याद आया, पन्ना। मैंने जेब देखी, खाली। लगा, वापस लाऊँ। भिखारी वहीं मिलेगा।

मैं ठेके के पास गया। वह नहीं था। दुकान वाले ने कहा, रात में ही मर गया। ठंड से।

मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने पहली बार रोया। सड़क पर, सबके सामने।

मैं घर आया, माँ के मंदिर वाले कोने में गया। वहाँ धूल जमी थी। मैंने पहली बार अगरबत्ती जलाई। धूप नहीं आती थी मुझे, पर जलाई। माँ देखकर रो पड़ी।

बदलाव धीरे आता है

भक्ति कोई बिजली नहीं कि बटन दबाया और उजाला। वह दीया है, जो पहले धुआँ देता है।

मैंने रोज सुबह हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू किया। पहले तोतले की तरह, फिर रट कर। अर्थ नहीं पता था, पर लय में सुकून था।

दारू छूटनी शुरू हुई। पहले रोज की जगह दो दिन में, फिर हफ्ते में। जब तलब लगती, मैं मंदिर चला जाता। गोरखनाथ मंदिर नहीं, छोटा सा संकट मोचन मंदिर, नहर के पास। वहाँ भीड़ नहीं होती।

एक दिन पुजारी ने पूछा, “क्या चाहिए?” मैंने कहा, “माफ़ी।” उसने हँसकर कहा, “माफ़ी माँगने से नहीं, लौटाने से मिलती है।”

मुझे मास्टर जी याद आए।

मैं उनकी बेटी के घर गया। दरवाजा खटखटाया। वह डर गई। मैंने हाथ जोड़कर कहा, “दीदी, मैंने आपके पिताजी के पैसे चुराए थे। मैं लौटा नहीं सकता, पर मैं आपकी सेवा कर सकता हूँ।”

उसने दरवाजा बंद कर दिया। मैं रोज जाता। एक हफ्ते बाद उसने दरवाजा खोला, बोली, “मेरे बेटे को ट्यूशन पढ़ा दो, फीस नहीं दे पाऊँगी।”

मैं पाँचवीं पास था। पर मैंने हाँ कहा। रोज शाम दो घंटे उसे हिंदी पढ़ाता। धीरे-धीरे वह बच्चा मुझे ‘कल्लू चाचा’ कहने लगा।

वही मेरा पहला प्रायश्चित था।

भक्ति ने काम दिया

2022 में मैंने सट्टा पूरी तरह छोड़ दिया। दोस्तों ने धमकाया। मैंने कहा, “मारना है तो मार दो।” वे चले गए।

मैंने एक ई-रिक्शा किराए पर लिया। सुबह 5 बजे निकलता, रात 9 बजे लौटता। पहली कमाई से मैंने राधा के लिए नई साड़ी खरीदी। उसने पहनी, फिर उतार कर रख दी। बोली, “जब तक तुम रोज मंदिर जाओगे, तब तक पहनूँगी।”

मैं हँसा। अब मंदिर जाना आदत बन गया था। वहाँ मैं झाड़ू लगाता, पानी भरता। कोई कहता नहीं था, मैं खुद करता।

एक दिन संकट मोचन मंदिर में भंडारा था। पुजारी बीमार था। मैंने कहा, “मैं सब्जी काट देता हूँ।” मैंने पूरी दोपहर प्याज काटे, आँखों से पानी बहा। वही पानी शायद मेरे पाप धो रहा था।

भंडारे में एक साधु आए। उन्होंने मुझे देखा, बोले, “तेरे माथे पर कालिख थी, अब राख है। राख से ही शिव बनता है।”

उन्होंने मुझे एक छोटा सा हनुमान लॉकेट दिया। मैं आज भी पहनता हूँ।

असली परीक्षा

2023 में माँ को लकवा मार गया। दवा के पैसे नहीं थे। पुराना मन बोला, “एक हाथ मार दे, रातों रात पैसा।” नया मन बोला, “रिक्शा बेच दे।”

मैंने रिक्शा बेच दिया। माँ का इलाज हुआ। वह बची नहीं, तीन महीने बाद चल बसी। मरते समय उसने मेरा हाथ पकड़ा, बोली, “कल्लू, तू बदल गया। अब मरूँ तो शांति से मरूँगी।”

उस दिन मैं श्मशान में चिता के पास बैठा, हनुमान चालीसा पढ़ रहा था। लोग देख रहे थे – वही कल्लू कसाई, जो कभी श्मशान में दारू पीता था, आज आँसुओं से मंत्र पढ़ रहा है।

आज का कल्लू

अब 2026 है। मैं 44 साल का हूँ। मेरे ऊपर कोई केस नहीं। ई-रिक्शा फिर से ले लिया है, किस्त पर। रोज सुबह 4 बजे उठता हूँ, नहाकर हनुमान चालीसा, फिर एक माला “राम” नाम की।

मैं अब भी पापी हूँ? हाँ, यादें हैं। मास्टर जी की बेटी अब मुझे राखी बाँधती है। उसके बेटे ने दसवीं पास कर ली। राधा अब मंदिर में भजन गाती है। मैं ढोलक बजाता हूँ। लोग हँसते थे, अब साथ बैठते हैं।

पिछले महीने गोरखनाथ मंदिर में सफाई अभियान था। मैंने सबसे ज्यादा कचरा उठाया। एक पुलिस वाले ने पहचान लिया, बोला, “अरे कल्लू, तू?” मैंने कहा, “साहब, वो कल्लू मर गया। मैं कल्लू दास हूँ।”

भक्ति ने मुझे अमीर नहीं बनाया। मेरे पास अब भी किराए का घर है। पर भक्ति ने मुझे हल्का कर दिया। पहले सीने पर पत्थर था, अब धड़कन है।

मैं रोज रात को सोने से पहले वही फटा पन्ना देखता हूँ, जो मैंने उस भिखारी को दिया था। वह मेरे पास नहीं है, पर उसकी याद है। उसने कहा था, “तूने आज मुझे भगवान दे दिया।” सच में, उसने मुझे भगवान लौटा दिया।

अगर आप पूछें, पापी कैसे बदला? कोई चमत्कार नहीं हुआ। कोई आकाशवाणी नहीं। बस एक थका हुआ आदमी, एक फटे पन्ने, एक मरे हुए भिखारी की आँखें, और एक चालीसा की लय।

भक्ति डंडा नहीं मारती, वह हाथ पकड़ती है। और जब पापी हाथ पकड़ ले, तो वह भी चल पड़ता है। धीरे-धीरे, लड़खड़ाते हुए, पर चल पड़ता है।

मैं आज भी जब “जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई” पढ़ता हूँ, तो मास्टर जी का चेहरा दिखता है। मैं आँख बंद करता हूँ, कहता हूँ, “माफ कर दो।” जवाब नहीं आता, पर मन हल्का हो जाता है।

यही मेरा नया जीवन है। पाप से पुण्य तक का रास्ता लंबा नहीं, सिर्फ एक सच्चे “राम” जितना है।

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Author: sssrknews

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