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“20 घरों के आदिवासी गाँव से अमेरिका की यूनिवर्सिटी तक”

महाराष्ट्र के जलगांव ज़िले का एक छोटा सा आदिवासी गाँव, जहाँ सिर्फ़ 20–25 घर हैं और पढ़ाई ज़्यादातर बच्चों के लिए सपना ही रह जाती है।

उसी गाँव से निकलकर शंकर भिल आज अमेरिका की University of California, San Diego में Ethnic Studies में PhD के लिए चुने गए हैं। यह सिर्फ़ उनकी नहीं, पूरे आदिवासी समाज की जीत है।

शंकर का बचपन संघर्षों से भरा रहा। घर की आर्थिक हालत कमज़ोर थी, शंकर 11वीं में थे जब मजदूर पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनकी माँ, सिंधुबाई भिल ने रोज़ 25 रुपये की मज़दूरी कर पाँच बच्चों को पाला, लेकिन शंकर की पढ़ाई कभी नहीं रुकने दी।

ऐसे गाँव में जहाँ मुश्किल से बच्चे 12वीं तक पहुँच पाते हैं, शंकर अकेले ऐसे युवा बने जिन्होंने आगे पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने 12वीं तक पढ़ाई आदिवासी आश्रमशाला से की, फिर पुणे से ग्रेजुएशन और बेंगलुरु की अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी से पोस्ट-ग्रेजुएशन पूरा किया।

आज अमेरिका में उनका शोध आदिवासियों की छीनी गई ज़मीनों और उनके संघर्षों पर केंद्रित है। इसके लिए उन्हें शुरुआती 9 महीनों के लिए 71,000 डॉलर की फेलोशिप भी मिली है।

शंकर कहते हैं, “शिक्षा ही हमारे समाज को आगे ले जाने का रास्ता है।”
आज वह सिर्फ़ एक PhD छात्र नहीं, बल्कि अपने समाज की आवाज़ हैं।

एक छोटे से आदिवासी गाँव से दुनिया के बड़े विश्वविद्यालय तक पहुँची उनकी कहानी बताती है कि अगर अपनों का साथ, सच्ची मेहनत और खुद पर भरोसा हो, तो हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, सपने ज़रूर पूरे होते हैं।

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Author: sssrknews

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