इतिहास गवाह है: 1191 में पृथ्वीराज चौहान से हारने से पहले, मुहम्मद गौरी 1178 ई. में गुजरात की सोलंकी रानी ‘नायकी देवी’ से बुरी तरह हारा था। माउंट आबू की तलहटी में एक विधवा रानी ने अपनी गोद में बच्चे को बैठाकर सेना का नेतृत्व किया और दुश्मन को खदेड़ दिया। यह है राजपूतानी शौर्य।”
महारानी नायकी देवी और कयादरा के युद्ध (1178 ई.) का इतिहास अक्सर स्कूली किताबों में वह स्थान नहीं पाता, जिसका वह हकदार है।
मुहम्मद गौरी जब भारत पर आक्रमण करने की योजना बना रहा था, तो उसे लगा था कि एक विधवा रानी और एक छोटे बालक (मूलराज द्वितीय) के शासन वाला गुजरात एक आसान लक्ष्य होगा। लेकिन उसे नहीं पता था कि उसका सामना अदम्य साहस से होने वाला है।
1178 ई. का ऐतिहासिक कयादरा युद्ध
रणनीतिक सूझबूझ: रानी नायकी देवी जानती थीं कि मैदानी इलाके में गौरी की घुड़सवार सेना भारी पड़ सकती है। इसलिए उन्होंने उसे माउंट आबू की तलहटी में स्थित गदरारघट्टा (कयादरा) के पहाड़ी इलाके में खींचा, जहाँ गौरी की सेना की ताकत कमजोर पड़ गई।
युद्ध का नेतृत्व: जैसा कि आपने उल्लेख किया, रानी ने अपने नन्हे पुत्र को पीठ पर बाँधकर युद्ध के मैदान में तलवार उठाई। उन्होंने न केवल युद्ध का नेतृत्व किया, बल्कि तुर्की सेना को बुरी तरह खदेड़ दिया।
गौरी की शर्मनाक हार: यह हार गौरी के लिए इतनी भयानक थी कि वह युद्ध के मैदान से अपनी जान बचाकर भागा और अगले 13 वर्षों तक उसने फिर कभी गुजरात की तरफ आँख उठाकर नहीं देखा






