सनातन धर्म में वृक्ष सिर्फ लकड़ी नहीं, जीवित देवालय हैं*
*1. भूमिका: वृक्ष – सनातन का पहला मंदिर , मंदिर बनने से पहले, मूर्ति गढ़ने से पहले, ऋषियों ने किसकी पूजा की? वृक्ष की।
*ऋग्वेद*कहता है: वृक्षे वृक्षे वसति देवा: – हर वृक्ष में देवता बसते हैं। पेड़ ऑक्सीजन ही नहीं देते, प्राण देते हैं, ज्ञान देते हैं, मोक्षका रास्ता दिखाते हैं।
बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान मिला, कृष्ण ने कदंब के नीचे रास रचाया, शिव वटवृक्ष के नीचे दक्षिणामूर्ति बनकर बैठे। ये संयोग नहीं, विज्ञान है। पेड़ और मनुष्य का रिश्ता जड़ से जुड़ा है – हम दोनों ही पृथ्वी से जन्मे, आकाश की ओर बढ़ते हैं।
अधिक मास (17 मई से 15 जून) में जलते हुए दीपक का करेंगे अचूक उपाय एक बार जरूर हमें सम्पर्क करें
*2. वेदों में 5 दिव्य वृक्ष – पंचवटी का रहस्य….
*अथर्ववेद में 5 वृक्षों को ‘पंच देव वृक्ष’ कहा गया।
वृक्ष देवता,आध्यात्मिक शक्ति, वैज्ञानिक लाभ ….
1. पीपल
विष्णु + ब्रह्मा + शिव | पितृ मोक्ष, कुंडलिनी जागरण | 24 घंटे ऑक्सीजन, दमा-हृदय रोग नाश ।
2. बरगद/वट
शिव + यम अकाल मृत्यु टालना, दीर्घायु, सबसे ज्यादा ऑक्सीजन, मिट्टी बाँधता है ।
3. बेल*
शिव त्रिदोष नाश, शिव कृपा पेट-शुगर रोग नाश, शिवलिंग पर प्रिय
4. आँवला*
लक्ष्मी + कार्तिकेय
धन-स्वास्थ्य, ब्रह्मचर्य रक्षा विटामिन C, कायाकल्प
5. अशोक*
कामदेव + इंद्र | शोक नाश, स्त्री रक्षा, स्त्री रोग, मानसिक तनाव दूर
रामायण में पंचवटी
राम ने पंचवटी में 5 वृक्ष लगाए थे – पीपल, बरगद, बेल, आँवला, अश्वत्थ। कहते हैं जहाँ पंचवटी हो, वहाँ ऋण, रोग, शोक नहीं आते।
3. वृक्षों के भीतर का देव लोक – क्या होता है छाल के नीचे?
पद्म पुराण की कथा
एक बार नारद जी ने देखा कि वृक्ष काटने पर खून निकलता है। पूछा “नारायण, वृक्ष में जीव कैसे?”
विष्णु बोले, “नारद, हर वृक्ष एक ऋषि का शरीर है। सतयुग में जो ऋषि तप में लीन हो गए, कलियुग में जीवों की सेवा के लिए वृक्ष बन गए।”
वृक्ष के 3 सूक्ष्म लोक…..
1. जड़ लोक -नागलोक,
जड़ों में नाग देवता रहते हैं। इसलिए पीपल की जड़ में दूध चढ़ाते हैं। बरगद की जड़ में अक्षय वट है – प्रयाग में जहाँ मार्कंडेय ऋषि प्रलय में भी जीवित रहे।
2. तना लोक – यक्ष-गंधर्व लोक तने में *वृक्ष देवता*रहते हैं। स्कंद पुराण कहता है बिना प्रार्थना वृक्ष न काटो। काटने से पहले क्षमा माँगो ‘हे वृक्ष देव, मेरा अपराध क्षमा करो, दूसरे स्थान पर निवास करो।’
3. पत्ता-शाखा लोक – देव लोक पत्तों पर देवता विहार करते हैं। पीपल में ब्रह्मा दिन में,
विष्णु शाम को,
शिव* रात में
इसलिए पीपल को रात में नहीं छूते – शिव समाधि में होते हैं।
4. 7 पवित्र वृक्ष और उनकी गुप्त शक्तियाँ**
*1. पीपल . ‘अश्वत्थ’ यानी कल भी रहेगा।
*गीता 10.26*अश्वत्थःसर्ववृक्षाणां – वृक्षों में मैं पीपल हूँ।
रहस्य पीपल ही एकमात्र वृक्ष जो CO2 दिन-रात खींचकर O2 देता है। शनि, पितृ दोष, कालसर्प दोष की एकमात्र काट। शनिवार सुबह जल चढ़ाने से 100 साल के पाप कटते हैं।
2. वटवृक्ष-अक्षय जीवन काप्रतीक
सावित्री ने सत्यवान को यमराज से वट के नीचे ही वापस लिया। वट सावित्री व्रत में महिलाएँ 108 परिक्रमा करती हैं।
रहस्य …वट की लटकती जड़ें ‘संजीवनी’ हैं। ये पृथ्वी पर सबसे लंबा जीने वाला वृक्ष – 3000 साल तक। प्रयाग का अक्षयवट प्रलय में भी नहीं डूबता।
*3. तुलसी – वृंदा का अवतार
तुलसी पौधा नहीं, वृंदा देवी हैं – विष्णु प्रिया। इनके बिना शालिग्राम भोग स्वीकार नहीं करते।
रहस्य ..तुलसी में पारा होता है – बिजली गिरने से बचाती है। 4 तुलसी पत्र रोज = कैंसर रोधी। तुलसी विवाह = कन्या दान फल।
4. नीम – शीतला माता का रूप
नीम को ‘ग्राम देवता’कहते हैं। चेचक, मलेरिया, वायरस की दुश्मन।
रहस्य* नीम में कड़वाहट* यमराज को दूर रखती है। घर के बाहर नीम = नेगेटिविटी अंदर नहीं आती। नीम की दातून = 70 रोग दूर करता है।
5. कदंब – कृष्ण का प्रेम वृक्ष
वृंदावन में कृष्ण कदंब पर चढ़कर बाँसुरी बजाते। गोपियाँ कहतीं – कदंब फूल की खुशबू में कृष्ण बसते हैं।
*रहस्य .. कदंब का फूल बारिश से पहले खिलता है – मौसम वैज्ञानिक है। प्रेम, आकर्षण बढ़ाता है।
*6. शमी – अग्नि देव का वास
महाभारत में पांडवों ने अस्त्र शमी वृक्ष में छुपाए। दशहरे को शमी पूजा = विजय।
रहस्य शमी में अग्नि तत्व छुपा है। पुराने समय में शमी की लकड़ी रगड़कर आग जलाते। शनि देव शमी के नीचे शांत होते हैं।
*7. केले का पेड़ – बृहस्पति + कदली देवी ।
सत्यनारायण कथा बिना केले के अधूरी। केला बृहस्पति का वृक्ष।
रहस्य* केले में एक ही बार फल – सिखाता है ‘जीवन में मौका एक बार’। गुरुवार को केला पूजने से विवाह, ज्ञान, संतान दोष कटता है।
वृक्ष क्यों पूजें?
4 कारण….
1. प्राण दाता 1 पीपल = 5 AC के बराबर ऑक्सीजन। वृक्ष काटना = अपने फेफड़े काटना।
2. कर्म साक्षी पेड़ बोलते नहीं पर देखते सब हैं। पीपल के नीचे झूठ नहीं बोलते – पितृ सुन लेते हैं।
3. *ऊर्जा ग्रिड*वृक्ष कॉस्मिक एनर्जी के टावर हैं। पीपल 24 घंटे, तुलसी सुबह, बेल शाम को सबसे ज्यादा ऊर्जा देते।
4. पितृ लोक का द्वार*पितृ पेड़ों में विश्राम करते हैं। गया श्राद्ध में पीपल पर पिंडदान = सीधा पितरों तक।
वृक्ष पूजा विधि…
1. सोमवार बेल पर जल + दूध = शिव कृपा, रोग नाश होता है।
2. मंगलवार नीम पर सिंदूर = मंगल दोष, शत्रु नाश
3. बुधवार केले पर चने दाल = बुद्धि, व्यापार
4. गुरुवार पीपल पर हल्दी जल = गुरु बल, विवाह
5. शुक्रवार तुलसी पर घी दीपक = लक्ष्मी, सुहाग
6. शनिवार शमी + पीपल पर तेल दीपक = शनि शांत, साढ़ेसाती कम
7. रविवार आँकड़े/अर्क पर जल = सूर्य दोष, सरकारी काम
मंत्र…..मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे। अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः॥
“जड़ में ब्रह्मा, बीच में विष्णु, ऊपर शिव – हे वृक्षराज, प्रणाम।”
6. कलियुग में वृक्ष काटने का श्राप
भविष्य पुराण की चेतावनी:
एक वृक्ष समारोप्य दशकूप समा धरा।*
1 पेड़ लगाना = 10 कुएँ बनवाने के बराबर।
एक वृक्षं तु यो हन्ति ब्रह्महत्या समं लभेत्।
1 हरा पेड़ काटना = ब्रह्म हत्या का पाप।
आज AC,प्यूरीफायर लगाते हैं, पर पेड़ काट देते हैं। फिर पूछते हैं – बीमारी, डिप्रेशन, गर्मी क्यों? क्योंकि प्रकृति का वेंटिलेटर बंद कर दिया।
7. निष्कर्ष: पेड़ लगाओ, पुण्य कमाओ*
स्कंद पुराण कहता है:
अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश चिञ्चिणीकम्।
कपित्थ बिल्वामलकत्रयं च पञ्चाम्रवापी नरकं न पश्येत्॥
1 पीपल, 1 नीम, 1 बरगद, 10 इमली, 3 कैथ, 3 बेल, 3 आँवला, 5 आम लगाने वाला नरक नहीं देखता।
कलियुग का सबसे बड़ा दान वृक्षारोपण। पैसा नहीं है तो भी चलेगा। पीपल का बीज कहीं गमले में डाल दो, तुलसी बाँट दो।
जब अंतिम समय आएगा, यमराज लेखा पूछेंगे – “धन कितना कमाया?” नहीं पूछेंगे। पूछेंगे – “पेड़ कितने लगाए? कितने जीवों को छाया दी?”
क्योंकि वृक्ष ही सच्चे संत हैं – बिना बोले देते हैं, काटने पर भी छाया देते हैं, मरकर भी लकड़ी बनकर जलाते हैं।
वृक्ष देवो भव। वृक्ष ही गुरु है।
अश्वत्थ हर, वट हर, तुलसी हर, नीम हर।
अगली बार पीपल के पास से गुजरें तो रुककर कान लगाना। हो सकता है जड़ों में ऋषि मंत्र जप रहे हों, पत्तों में वेद गूँज रहे हों।
सूर्य देव को अर्घ्य देने के वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय लाभ
सूर्य को जल देना पुरानी परम्परा है, परन्तु किसी ने यह जानने का प्रयास किया की क्यूँ दिया जाता है सूर्य को जल? और क्या प्रभाव होता है इससे मानव शरीर पर?
पूरी जानकारी के लिए कृपया अंत तक पढ़े, थोडा समय लग सकता है, परन्तु जानकारी महत्वपूर्ण है।
सूर्य देव अलग अलग रंग अलग अलग आवर्तियाँ उत्पन्न करते हैं, अंत में इसका उल्लेख करूँगा, मानव शरीर रासायनिक तत्वों का बना है, रंग एक रासायनिक मिश्रण है।
जिस अंग में जिस प्रकार के रंग की अधिकता होती है शरीर का रंग उसी तरह का होता है, जैसे त्वचा का रंग गेहुंआ, केश का रंग काला और नेत्रों के गोलक का रंग सफेद होता है।
शरीर में रंग विशेष के घटने-बढने से रोग के लक्षण प्रकट होते हैं, जैसे खून की कमी होना शरीर में लाल रंग की कमी का लक्षण है।
सूर्य स्वास्थ्य और जीवन शक्ति का भण्डार है| मनुष्य सूर्य के जितने अधिक सम्पर्क में रहेगा उतना ही अधिक स्वस्थ रहेगा।
जो लोग अपने घर को चारों तरफ से खिडकियों से बन्द करके रखते हैं और सूर्य के प्रकाश को घर में घुसने नहीं देते वे लोग सदा रोगी बने रहते हैं।
जहां सूर्य की किरणें पहुंचती हैं, वहां रोग के कीटाणु स्वत: मर जाते हैं और रोगों का जन्म ही नहीं हो पाता। सूर्य अपनी किरणों द्वारा अनेक प्रकार के आवश्यक तत्वों की वर्षा करता है और उन तत्वों को शरीर में ग्रहण करने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।
सूर्य पृथ्वी पर स्थित रोगाणुओं ‘कृमियों’ को नष्ट करके प्रतिदिन रश्मियों का सेवन करने वाले व्यक्ति को दीर्घायु भी प्रदान करता है।
सूर्य की रोग नाशक शक्ति के बारे में अथर्ववेद के एक मंत्र में स्पष्ट कहा गया है कि सूर्य औषधि बनाता है, विश्व में प्राण रूप है तथा अपनी रश्मियों द्वारा जीवों का स्वास्थ्य ठीक रखता है।
अथर्ववेद में कहा गया है कि सूर्योदय के समय सूर्य की लाल किरणों के प्रकाश में खुले शरीर बैठने से हृदय रोगों तथा पीलिया के रोग में लाभ होता है।प्राकृतिक चिकित्सा में आन्तरिक रोगों को ठीक करने के लिए भी नंगे बदन सूर्य स्नान कराया जाता है।
आजकल जो बच्चे पैदा होते ही पीलिया रोग के शिकार हो जाते हैं उन्हें सूर्योदय के समय सूर्य किरणों में लिटाया जाता है जिससे अल्ट्रा वायलेट किरणों के सम्पर्क में आने से उनके शरीर के पिगमेन्ट सेल्स पर रासायनिक प्रतिक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।
और बीमारी में लाभ होता है, डाक्टर भी नर्सरी में कृत्रिम अल्ट्रावायलेट किरणों की व्यवस्था लैम्प आदि जला कर भी करते हैं।
सूर्य को कभी हल्दी या अन्य रंग डाल कर जल दिया जाता है, जल को हमेशा अपने सर के ऊपर से सूर्य और अपने हिर्दय के बीच से छोड़ना चाहिए।
ध्यान रहे की सुर्य चिकित्सा दिखता तो आसान है पर विशेषज्ञ से सलाह लिये बिना ना ही शुरू करें।
जैसा की हम जानते हैं कि सूर्य की रोशनी में सात रंग शामिल हैं .. और इन सब रंगो के अपने अपने गुण और लाभ है …
1. लाल रंग👉 यह ज्वार, दमा, खाँसी, मलेरिया, सर्दी, ज़ुकाम, सिर दर्द और पेट के विकार आदि में लाभ कारक है।
2. हरा रंग👉 यह स्नायुरोग, नाडी संस्थान के रोग, लिवर के रोग, श्वास रोग आदि को दूर करने में सहायक है।
3. पीला रंग👉 चोट ,घाव रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, दिल के रोग, अतिसार आदि में फ़ायदा करता है
4. नील रंग👉 दाह, अपच, मधुमेह आदि में लाभकारी है।
5. बैंगनी रंग👉 श्वास रोग, सर्दी, खाँसी, मिर् गी ..दाँतो के रोग में सहायक है।
6. नारंगी रंग👉 वात रोग . अम्लपित्त, अनिद्रा, कान के रोग दूर करता है।
7. आसमानी रंग👉 स्नायु रोग, यौनरोग, सरदर्द, सर्दी- जुकाम आदि में सहायक है।
सुरज का प्रकाश रोगी के कपड़ो और कमरे के रंग के साथ मिलकर रोगी को प्रभावित करता है।अतः दैनिक जीवन मे हम अपने जरूरत के अनुसार अपने परिवेश एवम् कपड़ो के रंग इत्यादि मे फेरबदल करके बहुत सारे फायदे उठा सकते हैं।
सूर्य देव को अर्घ्य ज्योतिषीय दृष्टिकोण
इस संसार में भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देव कहा जाता है क्योंकि हर व्यक्ति इनके साक्षात दर्शन कर सकता है। रविवार भगवान सूर्य का दिन माना जाता है और सप्तमी तिथि के देवता भी भगवान सूर्य है। अगर सप्तमी तिथि रविवार के दिन पड़े तो उसका अति विशेष महत्व होता है इस दिन सूर्य देव की उपासना का विशेष महत्व है। रविवारीय सप्तमी भानु सप्तमी या सूर्य सप्तमी कहलाती है।
रविवार तथा सप्तमी तिथि को भगवान सूर्य को अर्घ्य देने का भी विशेष महत्व है। भगवान सूर्य कि कृपा पाने के लिए तांबे के पात्र में लाल चन्दन,लाल पुष्प, अक्षत डालकर प्रसन्न मन से सूर्य मंत्र का जाप करते हुए उन्हें जल अर्पण करना चाहिए।
श्री सूर्यनारायण को तीन बार अर्घ्य देकर प्रणाम करना चाहिए। इस अर्घ्य से भगवान सूर्य प्रसन्न होकर अपने भक्तों की हर संकटो से रक्षा करते हुए उन्हें आरोग्य, आयु, धन, धान्य, पुत्र, मित्र, तेज, यश, कान्ति, विद्या, वैभव और सौभाग्य को प्रदान करते हैं । भगवान सूर्य देव कि कृपा प्राप्त करने के लिए जातक को प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व ही शैया त्याग कर शुद्ध, पवित्र जल से स्नान के पश्चात उगते हुए सूर्य को अर्ध्य देना चाहिए।
भगवान सूर्य सबसे तेजस्वी और कांतिमय माने गए हैं। अतएवं सूर्य आराधना से ही व्यक्ति को सुंदरता और तेज कि प्राप्ति भी होती है । ह्रदय रोगियों को भगवान सूर्य की उपासना करने से विशेष लाभ होता है। उन्हें आदित्य ह्रदय स्तोत्र का नित्य पाठ करना चाहिए। इससे सूर्य भगवान प्रसन्न होकर अपने भक्तों को निरोगी और दीर्घ आयु का वरदान देते है।
सूर्य भगवान की कृपा पाने के लिए जातक को प्रत्येक रविवार अथवा माह के किसी भी शुक्ल पक्ष के रविवार को गुड़ और चावल को नदी अथवा बहते पानी में प्रवाहित करना चाहिए । तांबे के सिक्के को भी नदी में प्रवाहित करने से भी सूर्य भगवान की कृपा बनी रहती है। रविवार के दिन स्वयं भी मीठा भोजन करें एवं घर के अन्य सदस्यों को भी इसके लिए प्रेरित करें। हाँ भगवान सूर्यदेव को उस दिन गुड़ का भोग लगाना कतई न भूलें ।
ज्योतिषशास्त्र में सूर्य को राजपक्ष अर्थात सरकारी क्षेत्र एवं अधिकारियों का कारक ग्रह बताया गया है। व्यक्ति कि कुंडली में सूर्य बलवान होने से उसे सरकारी क्षेत्र में सफलता एवं अधिकारियों से सहयोग मिलता है। कैरियर एवं सामाजिक प्रतिष्ठा में उन्नति के लिए भी सूर्य की अनुकूलता अनिवार्य मानी गयी है।
यह ध्यान रहे कि सूर्य भगवान की आराधना का सर्वोत्तम समय सुबह सूर्योदय का ही होता है। आदित्य हृदय का नियमित पाठ करने एवं रविवार को तेल, नमक नहीं खाने तथा एक समय ही भोजन करने से भी सूर्य भगवान कि हमेशा कृपा बनी रहती है।
यदि किसी व्यक्ति के पास आपका पैसा फँसा हो तो आप नित्य उगते हुए सूर्य को ताम्बे के पात्र में गुड, अक्षत, लाल चन्दन लाल फूल और लाल मिर्च के 11 दाने डालकर अर्ध्य दें और सूर्यदेव से मन ही मन अपने फंसे हुए धन को प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करें, इस उपाय से तेज और यश की प्राप्ति होती है, आत्मविश्वास बढ़ता है और फँसा हुआ धन में अड़चने समाप्त होने लगती है।
मनोवांछित फल पाने के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।
भगवान सूर्य के किसी भी आसान और सिद्ध मंत्र का जाप श्रद्धापूर्वक अवश्य ही करें।
ॐ घृणि सूर्याय नम:।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:।।
ॐ ह्रीं घृणि सूर्य आदित्य श्रीं ओम्।
ॐ आदित्याय विद्महे मार्तण्डाय धीमहि तन्न सूर्य: प्रचोदयात्।
ऊं घृणिं सूर्य्य: आदित्य:
ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।
ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:।
ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ।
ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः।
निम्न मंत्रो का किसी भी कृष्ण पक्ष के प्रथम रविवार से आरम्भ करे सूर्योदय काल इसके लिये सर्वोत्तम है लाल ऊनि आसान पर सूर्याभिमुख बैठ कर मानसिक जप करना सर्वोत्तम है इसके प्रभाव से व्यक्ति में सूर्य जैसे गुण आते है, चेहरे पर कांति आती है।आकर्षण बढ़ता है नेत्र रोगों में में लाभकारी है तथा कुंडली मे सूर्य के अशुभ फलों में कमी आती है..!!
🙏🏾🙏🏻ॐ सूर्याय नमः🙏🏿🙏



