जन्मकुंडली में ग्रहों से जुड़े मनुष्य के सफलता के योग एवं गुरु पुष्य नक्षत्र के शुभ काम करने के लिए योग क्या है आओ जानें
ज्योतिष शास्त्र में ग्रह केवल स्वास्थ्य और मनोवृत्ति ही नहीं बल्कि सफलता, करियर, और जीवन की उपलब्धियों पर भी प्रभाव डालते हैं ग्रहों की स्थिति, बल और दशा जीवन में अवसर और चुनौतियाँ तय करती है।
सूर्य ग्रह
अधिकार, नेतृत्व और मान-सम्मान
मजबूत सूर्य: पदोन्नति, समाज में सम्मान, नेतृत्व क्षमता
कमजोर सूर्य: सफलता में बाधा, आत्मविश्वास की कमी।
चंद्रमा
भावनात्मक संतुलन और लोकप्रियता
मजबूत चंद्रमा: समाज में प्रिय होना, सहयोग प्राप्त करना
कमजोर चंद्रमा: मानसिक अस्थिरता, अवसरों का लाभ न लेना।
बुध ग्रह
बुद्धि और संचार का ग्रह मजबूत बुध: व्यवसाय, शिक्षण, लेखन और संवाद में सफलता
कमजोर बुध: निर्णय में भ्रम, गलत विचार और निर्णय।
मंगल ग्रह
ऊर्जा, साहस और संघर्ष मजबूत मंगल: व्यापार, सेना या नौकरी में साहस और सफलता।
कमजोर मंगल: संघर्ष में विफलता, क्रोध से बाधाए।
गुरु ग्रह
ज्ञान, शिक्षा और भाग्य मजबूत गुरु: उच्च शिक्षा, करियर में उन्नति, भाग्य के दरवाजे खुलना
कमजोर गुरु: शिक्षा में बाधा, भाग्य कम होना।
शुक्र ग्रह
संपत्ति, कला और वैवाहिक सफलता
मजबूत शुक्र: धन, प्रेम संबंधों में सफलता, कला और रचनात्मक क्षेत्र में उन्नति
कमजोर शुक्र: धन हानि, संबंधों में समस्या।
शनि ग्रह
कठिन परिश्रम और स्थायित्व
मजबूत शनि: स्थिर करियर, परिश्रम का फल, लंबी अवधि में सफलता
कमजोर शनि: मेहनत का फल देर से मिलना, बाधाएँ।
राहु ग्रह
अनोखी उपलब्धियाँ और रिस्क
मजबूत राहु: उन्नत तकनीक, विदेश यात्रा, अप्रत्याशित लाभ
कमजोर राहु: भ्रम, जोखिम में नुकसान।
केतु ग्रह
आध्यात्मिक सफलता और रहस्यमय क्षेत्र
मजबूत केतु: ध्यान, अध्यात्म और वैकल्पिक करियर में सफलता
कमजोर केतु: भ्रम और असमंजस।
सफलता के उपाय:
सूर्य: रविवार को सूर्य नमस्कार और दान
गुरु: गुरुवार को दान और ज्ञानार्जन
शुक्र: शुक्रवार को शुक्ल वस्त्र दान और पूजा
शनि: शनिवार को तेल, उड़द दाल दान और मंत्र जाप ग्रहों से जुड़ी जीवन में रुकावटें
ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की अशुभ स्थिति या दोष जीवन में रुकावटें, देरी, संघर्ष और समस्याएँ लाती हैं। ये रुकावटें करियर, शिक्षा, विवाह, धन या स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो सकती हैं।
सूर्य-मान-सम्मान और नेतृत्व में रुकावट
कमजोर सूर्य या दोषग्रस्त: पदोन्नति में देरी, समाज में सम्मान की कमी, निर्णय लेने में कठिनाई
चंद्रमा-भावनाओं और मानसिक स्थिति में बाधा
अशुभ चंद्रमा: तनाव, अस्थिर मन, भावनाओं में उलझन, नींद न आना।
बुध-बुद्धि और संवाद में रुकावट
दोषपूर्ण बुध: व्यापार, शिक्षा या संचार में गलतियाँ, निर्णयों में भ्रम
मंगल-साहस और ऊर्जा में बाधा
अशुभ मंगल: संघर्ष में हार, चोट या दुर्घटना का खतरा, ऊर्जा का असंतुलन।
गुरु-भाग्य और शिक्षा में बाधा
कमजोर गुरु: शिक्षा में रुकावट, भाग्य के दरवाजे बंद होना, सलाह का विपरीत प्रभाव
शुक्र-धन और संबंध में रुकावट
अशुभ शुक्र: धन हानि, प्रेम और वैवाहिक जीवन में तनाव, सौंदर्य या कला में कमी।
शनि-कठिन परिश्रम और स्थायित्व में रुकावट
दोषग्रस्त शनि: मेहनत का फल देर से मिलना, स्थायित्व की कमी, निराशा।
राहु- अप्रत्याशित रुकावट और भ्रम
अशुभ राहु: अचानक नुकसान, जोखिम, भ्रम और गलत मार्ग पर चलना
केतु – अस्पष्टता और मानसिक उलझन
कमजोर केतु: मानसिक भ्रम, रहस्यमय परेशानियाँ, आध्यात्मिक असंतुलन।
रुकावटों को कम करने के उपाय:
सूर्य: रविवार को दान और सूर्य मंत्र जाप
चंद्रमा: सोमवार को दूध या सफेद वस्त्र दान
गुरु: गुरुवार को ज्ञानार्जन और दान
शनि: शनिवार को तेल या उड़द दाल दान
राहु/केतु: मंत्र जप और साधना।
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पुष्य नक्षत्र योग
21 मई 2026 गुरुवार को सूर्योदय से मध्यरात्रि 02:49 तक गुरुपुष्यामृत योग है ।
१०८ मोती की माला लेकर जो गुरुमंत्र का जप करता है, श्रद्धापूर्वक तो २७ नक्षत्र के देवता उस पर खुश होते हैं और नक्षत्रों में मुख्य है पुष्य नक्षत्र, और पुष्य नक्षत्र के स्वामी हैं देवगुरु ब्रहस्पति | पुष्य नक्षत्र समृद्धि देनेवाला है, सम्पति बढ़ानेवाला है | उस दिन ब्रहस्पति का पूजन करना चाहिये | ब्रहस्पति को तो हमने देखा नहीं तो सद्गुरु को ही देखकर उनका पूजन करें और मन ही मन ये मंत्र बोले –
ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |…… ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |
कैसे बदले दुर्भाग्य को सौभाग्य में
बरगद के पत्ते पर गुरुपुष्य या रविपुष्य योग में हल्दी से स्वस्तिक बनाकर घर में रखें |
गुरुपुष्यामृत योग
‘शिव पुराण’ में पुष्य नक्षत्र को भगवान शिव की विभूति बताया गया है | पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से अनिष्ट-से-अनिष्टकर दोष भी समाप्त और निष्फल-से हो जाते हैं, वे हमारे लिए पुष्य नक्षत्र के पूरक बनकर अनुकूल फलदायी हो जाते हैं | ‘सर्वसिद्धिकर: पुष्य: |’ इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर है | पुष्य नक्षत्र में किये गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है तथा कर्ता को धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है |
इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है परंतु पुष्य में विवाह व उससे संबधित सभी मांगलिक कार्य वर्जित हैं | (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)
वैदिक प्रशनोत्तरी
प्र.१ – वेद किसे कहते है ?
उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।
प्र.२ – वेद-ज्ञान किसने दिया ?
उत्तर- वेद ज्ञान, ईश्वर ने दिया।
प्र.३ – ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?
उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।
प्र.४- ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए।
प्र.५ – वेद कितने है ?
उत्तर- चार प्रकार के ।
१ -ऋग्वेद
२ – यजुर्वेद
३ – सामवेद
४ – अथर्ववेद
प्र.६ – वेदों के ब्राह्मण ग्रन्थ ।
वेद ब्राह्मण ग्रन्थ
१ – ऋग्वेद – ऐतरेय
२ – यजुर्वेद – शतपथ
३ – सामवेद – तांड्य
४ – अथर्ववेद – गोपथ
प्र.७ – वेदों के उपवेद कितने है।
उत्तर – वेदों के चार उप वेद है ।
वेद उपवेद
१ – ऋग्वेद – आयुर्वेद
२ – यजुर्वेद – धनुर्वेद
३ -सामवेद – गंधर्ववेद
४ – अथर्ववेद – अर्थवेद
प्र ८ – वेदों के अंग हैं कितने होते है ।
उत्तर – वेदों के छः अंग होते है ।
१ – शिक्षा
२ – कल्प
३ – निरूक्त
४ – व्याकरण
५ – छंद
६ – ज्योतिष
प्र.९ – वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?
उत्तर- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने चार ऋषियों को दिया ।
वेद ऋषि
१ – ऋग्वेद – अग्नि ऋषि
२ – यजुर्वेद – वायु ऋषि
३ – सामवेद – आदित्य ऋषि
४ – अथर्ववेद – अंगिरा ऋषि
प्र.१० – वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?
उत्तर- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को समाधि की अवस्था में दिया ।
प्र.११ – वेदों में कैसा ज्ञान है ?
उत्तर- वेदों मै सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान है ।
प्र.१२ – वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- वेदों के चार विषय है।
वेद – विषय
१ – ऋग्वेद – ज्ञान
२ – यजुर्वेद – कर्म
३ – सामवेद – उपासना
४ – अथर्ववेद – विज्ञान
प्र.१३ – किस वेद में क्या है।
ऋग्वेद में।
१ – मंडल – १०
२ – अष्टक – ०८
३ – सूक्त – १०२८
४ – अनुवाक – ८५
५ – ऋचाएं – १०५८९
यजुर्वेद में।
१ – अध्याय – ४०
२- मंत्र – १९७५
सामवेद में।
१ – आरचिक -०६
२ – अध्याय – ०६
३ – ऋचाएं – १८७५
अथर्ववेद में।
१ – कांड – २०
२ – सूक्त – ७३१
३ – मंत्र – ५९७७
प्र.१४ – वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है।
प्र.१५ – क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?
उत्तर- वेदों में मूर्ति पूजा का विधान बिलकुल भी नहीं।
प्र.१६ – क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?
उत्तर- वेदों मै अवतारवाद का प्रमाण नहीं है।
प्र.१७ – सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?
उत्तर- सबसे बड़ा वेद ऋग्वेद है।
प्र.१८ – वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर- वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब ९६ करोड़ ८ लाख ५३ हजार वर्ष पूर्व ।
प्र.१९ – वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों के क्या नाम है ?
उत्तर-
१ – न्याय दर्शन – गौतम मुनि।
२ – वैशेषिक दर्शन – कणाद मुनि।
३ – योगदर्शन – पतंजलि मुनि।
४ – मीमांसा दर्शन – जैमिनी मुनि।
५ – सांख्य दर्शन – कपिल मुनि।
६ – वेदांत दर्शन – व्यास मुनि।
प्र.२० – शास्त्रों के विषय क्या है ?
उत्तर- आत्मा, परमात्मा, प्रकृति, जगत की उत्पत्ति, मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान आदि।
प्र.२१ – प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?
उत्तर- प्रामाणिक उपनिषदे केवल ग्यारह है।
प्र.२२ – उपनिषदों के नाम बतावे ?
उत्तर-
१ -ईश ( ईशावास्य ) २ – केन ३ -कठ ४ -प्रश्न ५ -मुंडक ६ -मांडू ७ -ऐतरेय ८ -तैत्तिरीय ९ – छांदोग्य
१०-वृहदारण्यक ११ – श्वेताश्वतर ।
प्र.२३ – उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?
उत्तर- उपनिषदों के विषय वेदों से लिए गए है !
प्र.२४ – चार वर्ण कौन- कौन से होते हैं।
ों
उत्तर-
१ – ब्राह्मण
२ – क्षत्रिय
३ – वैश्य
४ शूद्र
२५ – चार आश्रम कौन- कौन से हैं।
१- ब्रह्मचर्य आश्रम
२ – गृहस्थ आश्रम
३ – वानप्रस्थ आश्रम
४- सन्यास आश्रम
प्र.२६ – चार युग कौन – कौन से होते है और कितने वर्षों के ।
उत्तर-
१ – सतयुग – १७, २८००० वर्षों का।
२ – त्रेतायुग- १२,९६००० वर्षों का।
३ – द्वापरयुग- ८, ६४००० वर्षों का।
४ – कलयुग- ४,३२००० वर्षों का ।
कलयुग के ५१२६ वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक। ४,२६,८७४ वर्षों का भोग शेष बचा है।
आज का वेद मंत्र
ओ३म् कवन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:।एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे। ( ४०|२ )
भावार्थ :- मनुष्य लोग आलस्य को छोड़कर सबके द्रष्टा न्यायाधीश परमात्मा को, और आचरण करने योग्य उसकी आज्ञा को मानकर शुभ- कर्मों को करते हुए और अशुभ कर्मों को छोड़ते हुए, ब्रह्मचर्य के द्वारा विद्याऔर उत्तम- शिक्षा को प्राप्त करके उपस्य- इन्द्रिय के संयम से वीर्य को बढ़ाकर, अल्पायु में मृत्यु को हटावे, और युक्त आहार-विहार से सौ वर्ष की आयु को प्राप्त करें। जैसे-जैसे मनुष्य श्रेष्ठ कर्मों की ओर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे ही पाप कर्मों से उनकी बुद्धि हटने लगती हैं। जिसका फल यह होता है कि — विद्या,आयु और सुशीलता आदि गुणों की वृद्धि होती है।






