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कुर्सी की भूख : जब महत्वाकांक्षा ने सरकारें गिराईं

कभी-कभी एक तस्वीर बहुत कुछ कह जाती है।
उस तस्वीर के एक कोने में बैठा व्यक्ति कोई साधारण चेहरा नहीं है — वह सत्ता की भूख, अतृप्त महत्वाकांक्षा और खतरनाक राजनीतिक स्वार्थ का प्रतीक है। ऐसा व्यक्ति, जिसके लिए देश, विचारधारा या नैतिकता कभी प्राथमिकता नहीं रही — केवल कुर्सी रही।

1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी, तब इस व्यक्ति ने भी सत्ता का स्वाद चखा। समर्थन दिया, सहयोग दिखाया — लेकिन नीयत में सहयोग नहीं, सौदेबाज़ी थी। इनकी निगाहें सीधे वित्त मंत्रालय पर थीं। इन्हें लगा था कि सरकार बनेगी तो खजाने की चाबी इन्हीं के हाथ में आएगी।
लेकिन राजनीति केवल चालाकी से नहीं चलती — वहाँ चरित्र भी मायने रखता है।

वाजपेयी जी ने संघ से दो टूक कह दिया था —
“या तो इन्हें वही मंत्रालय दे दीजिए, या फिर मुझे प्रधानमंत्री रहने दीजिए।”
वाजपेयी की यह अडिगता उस व्यक्ति के अहंकार पर हथौड़े की तरह गिरी। महत्वाकांक्षा घायल हुई, क्रोध फूट पड़ा — और वहीं से शुरू हुआ सत्ता गिराने का षड्यंत्र।
जब प्रधानमंत्री पद की बोली लगी
बताया जाता है कि सत्ता गिराने के लिए उस व्यक्ति ने कांग्रेस की शीर्ष नेतृत्व से संपर्क साधा। सौदा साफ था —
सरकार गिराओ, बदले में प्रधानमंत्री की कुर्सी चाहिए।
लेकिन जैसे ही वाजपेयी सरकार गिरी, वही कांग्रेस नेतृत्व अपने वादे से पलट गया। प्रधानमंत्री पद का सपना वहीं चकनाचूर हो गया — और उसी क्षण जन्म लिया एक निजी प्रतिशोध का।

तभी से गांधी परिवार निशाने पर आ गया
उस दिन के बाद से यह व्यक्ति किसी विचारधारा का विरोधी नहीं रहा — वह एक व्यक्तिगत दुश्मन बन गया।
सोनिया गांधी के लिए अपमानजनक शब्द,
राहुल गांधी की नागरिकता पर आरोप,
नेशनल हेराल्ड जैसे मामलों को हवा देना —
ये सब अचानक नहीं हुआ, यह उस टूटे हुए सौदे का बदला था।

राजनीति कम, बदले की आग ज़्यादा थी।
अब वही स्क्रिप्ट नरेंद्र मोदी पर लागू
समय बदला, चेहरे बदले — लेकिन तरीका वही रहा।
आज वही व्यक्ति दिन-रात नरेंद्र मोदी के खिलाफ चरित्र हनन में जुटा है। आरोप, insinuation, विदेशी एजेंसियों की कहानियाँ — सब कुछ परोसा जा रहा है, लेकिन एक भी आरोप आज तक निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हो पाया।

क्योंकि लड़ाई विचारों की नहीं, कुर्सी की थी — और है।
वह ‘चाय पार्टी’, जिसने सरकार की नींव हिला दी
29 मार्च 1999।
दिल्ली का अशोका होटल।
तीन ऐसे नाम, जिनकी विचारधाराएँ सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे की धुर विरोधी थीं —
जयललिता, सोनिया गांधी और वही महत्वाकांक्षी मध्यस्थ।
यह कोई सामाजिक मुलाक़ात नहीं थी, यह राजनीतिक साज़िश की बैठक थी।

मक़सद एक ही — वाजपेयी सरकार को गिराना।
जयललिता उस समय सरकार को समर्थन दे रही थीं, लेकिन उन्हें अपनी ताक़त दिखानी थी। उन्हें लगा कि इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा। बीच में खड़े थे वही व्यक्ति, जो खुद को इस पूरे खेल का सूत्रधार मानते हैं।
खुद उन्होंने बाद में स्वीकार किया कि जुलाई 1998 से ही वे जयललिता को बीजेपी से अलग होने की सलाह दे रहे थे। फोन पर बात करवाई, संदेश भिजवाए, रास्ते बनाए।

मार्च 1999 में जयललिता ने दिल्ली आने से पहले सिर्फ़ इतना कहा —
“एक चाय पार्टी रखिए।”
शर्त साफ थी — अगर सोनिया गांधी उस चाय पर आती हैं, तो सरकार गिराने की प्रक्रिया शुरू होगी।
चाय पार्टी हुई — और उसके बाद भारतीय राजनीति में भूचाल।

एक वोट से गिरी सरकार
17 अप्रैल 1999।
लोकसभा में विश्वास मत।
NDA — 269
विपक्ष — 270
सिर्फ़ एक वोट।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार गिर गई।
कहा जाता है कि उस दिन वाजपेयी जी बेहद आहत थे। भावुक होकर उन्होंने कहा था कि
“देश के भीतर बैठे कुछ लोग विदेशी एजेंडों के मोहरे बन चुके हैं।”
सबका मक़सद एक, नीयत अलग
सरकार गिरने के बाद हर दल अपने-अपने फ़ायदे की गणना में जुट गया।

बसपा भी इस खेल से अलग नहीं रही।
पहले वोटिंग से दूरी, फिर अचानक सरकार के खिलाफ मतदान — यह फैसला सबको चौंकाने वाला था।
लेकिन इस पूरे ऑपरेशन का सबसे मुखर चेहरा वही व्यक्ति था, जिसने बाद में गर्व से कहा —
“मेरे लिए यह एक साहसिक मिशन था, मेरा उद्देश्य सिर्फ़ सरकार गिराना था।”
देश? स्थिरता? लोकतांत्रिक नैतिकता?

इन सवालों के जवाब कभी उनके एजेंडे में नहीं रहे।
निष्कर्ष
यह कहानी किसी एक सरकार की नहीं है।
यह कहानी है अतृप्त महत्वाकांक्षा की,
टूटे हुए सौदों के बदले की,
और उस राजनीति की —
जहाँ देश नहीं, कुर्सी सर्वोपरि होती है।
आज चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन तरीके वही हैं।
और यही कारण है कि इतिहास बार-बार खुद को दोहराता है —
कभी अटल के साथ,
तो कभी मोदी के साथ।

(यह लेख ऐतिहासिक घटनाओं और सार्वजनिक बयानों पर आधारित लेखक की व्यक्तिगत राय व राजनीतिक विश्लेषण है।)

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Author: sssrknews

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