#सीमा_आनंद
जिन्हें लोग कभी सेक्सोलॉजिस्ट कहते हैं,
कभी माइथोलॉजी की व्याख्याकार,
कभी तांत्रिक चेतना की कथावाचक।
पर सच यह है कि वे काम की नहीं,
चेतना की बात करती हैं।
उनकी चर्चित पुस्तक “मोहक कलाएँ”
कामवासना को पशु-वृत्ति नहीं,
बल्कि ऊर्जा, संवेदना और संबंधों की
सूक्ष्म यात्रा के रूप में देखती है।
63 वर्ष की आयु में उनका आत्मविश्वास,
उनकी गरिमा और उनका निर्भीक संवाद
समस्या नहीं है—
समस्या वह दृष्टि है
जो स्त्री को समझने के बजाय
उसे मापने लगती है।
अगर कोई स्त्री निर्भीक है,
खुले मन से बोलती है,
वर्जनाओं को प्रश्न करती है—
तो क्या यह समाज को
उसे वस्तु बना देने का अधिकार दे देता है?
शुभंकर मिश्रा के पॉडकास्ट में
उन्होंने केवल कामुकता के विविध रूपों पर
संवाद किया था।
लेकिन उसी क्षण
नैतिकता का नकाब ओढ़े
भीड़ सक्रिय हो गई—
गालियाँ, आक्षेप, चरित्र-हनन।
विडंबना यह है कि
जिन विचारों पर यहाँ शोर है,
उन पर पश्चिम में शोध है,
संवाद है, सम्मान है—
और वहीं सीमा आनंद
ससम्मान अपना जीवन जी रही हैं।
जो समाज उन्हें अश्लील कहता है,
वह यह भी बताए कि
इसी संस्कृति में
135 करोड़ की आबादी कैसे जन्मी?
सोशल मीडिया पर
वल्गर कंटेंट की खपत में
हम आज भी अग्रणी हैं।
निजी वीडियो वायरल करने में
प्रतियोगिता है।
महिलाओं और बच्चियों पर
हिंसा रोज़ की खबर है—
लेकिन वहाँ मौन है।
ग्वालियर की दीवारों पर
स्त्री-चित्रों के साथ हुई
नीच हरकतें बता देती हैं कि
यह समाज स्त्री की स्वतंत्रता से नहीं,
अपनी कुंठा से असहज है।
जहाँ गंदगी को
लाखों दर्शक मिलते हों,
वहाँ चेतना का ज्ञान
आवश्यक भी हो जाता है।
आत्ममंथन केवल बोलने वालों को नहीं,
सुनने वालों को भी करना चाहिए।
शायद समस्या स्त्री की बेबाकी नहीं,
समस्या हमारी असंस्कृत दृष्टि है।






