उत्तराखंड के रहने वाले संदीप पांडे की कहानी वाकई प्रेरणादायक है। नैनीताल में अपना रेस्टोरेंट खोलने का सपना लेकर उन्होंने दिल्ली का अपना इंजीनियरिंग करियर छोड़ दिया और अपने पहाड़ लौट आए। लेकिन साल 2013 में आई विनाशकारी बाढ़ ने उनका यह सपना टूटने से पहले ही छीन लिया। रेस्टोरेंट खुलने ही वाला था कि बाढ़ ने सब कुछ तबाह कर दिया।
हालांकि, इसी कठिन समय ने उनकी जिंदगी को एक नया मोड़ दिया। एक दिन उन्होंने एक मजदूर महिला को रोटी के साथ “पिस्युन लून” खाते हुए देखा। पिस्युन लून पारंपरिक पहाड़ी नमक होता है, जिसे सिलबट्टे पर पीसकर बनाया जाता है। यही दृश्य उनके लिए एक बड़े बिजनेस आइडिया की शुरुआत बन गया। उन्होंने सोचा कि क्यों न इस पारंपरिक स्वाद को बड़े स्तर पर लोगों तक पहुंचाया जाए।
सिर्फ मुनाफा कमाना ही उनका उद्देश्य नहीं था, बल्कि पहाड़ी महिलाओं को रोजगार और सम्मानजनक काम देना भी उनका सपना था। अपने दोस्तों सौरभ पंत और योगेंद्र सिंह के साथ मिलकर उन्होंने केवल 160 रुपये से “हिमफ्ला” (हिमालयन फ्लेवर्स) की शुरुआत की। शुरुआत में उन्होंने सिलबट्टा, ताजा धनिया और हरी मिर्च खरीदकर एक मेले में छोटा सा स्टॉल लगाया। लोगों को उनका फ्लेवर्ड नमक बेहद पसंद आया और यहीं से उनके सफर ने रफ्तार पकड़ ली।
धीरे-धीरे वे अलग-अलग मेलों में स्टॉल लगाने लगे और उनका ब्रांड पहचान बनाने लगा। आज हिमफ्ला 55 तरह के फ्लेवर्ड नमक बनाती है। उनकी कंपनी हर महीने करीब 2000 किलो नमक तैयार करती है, जो पूरे भारत में बिकता है और विदेशों तक भी पहुंच चुका है।
आज हिमफ्ला का सालाना रेवेन्यू करीब 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। सबसे खास बात यह है कि इस कंपनी ने पहाड़ी महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
संदीप पांडे की कहानी यह सिखाती है कि असफलता अंत नहीं होती, बल्कि एक नई शुरुआत का मौका होती है। सपने टूटते हैं, लेकिन हौसले हों तो वही सपने किसी और रूप में साकार हो जाते हैं। 💙






