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सन्तान प्राप्ति स्तोत्र की महिमा: जानिए षष्ठी देवी की कृपा और शिशु रक्षा का दिव्य रहस्य

सन्तान प्राप्ति स्तोत्र की महिमा क्या है एवं वास्तुदोष निवारण उपाय :

सतत् 1 वर्ष तक सन्तान प्राप्ति स्तोत्र का पाठ करने अथवा श्रवण करने से श्रेष्ठ और दीर्घजीवी पुत्र प्राप्त होता है।

जो स्त्री एक वर्ष तक देवी की भक्ति के साथ पूजा कर इस स्तोत्र को सुनती है, वह वीर, गुणी, विद्वान सन्तान उत्पन्न करती है।

बालक के रोगी होने पर यदि उसके माता-पिता इस स्तोत्र का पाठ करें अथवा श्रवण करें तो देवी की कृपा से एक मास के भीतर ही बालक महारोग से मुक्त हो जाता है।

सन्तान प्राप्ति के अनन्तर छठे दिन षष्ठी महोत्सव संस्कार होता है। इस दिन भगवती षष्ठी देवी की विशेष आराधना की जाती है षष्ठीदेवी शिशुओं की अधिष्ठात्री है। उनकी रक्षा करना देवी का स्वाभाविक गुण है।

मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने से इनका नाम षष्ठी हुआ।

षष्ठी देवी ब्रह्माजी की मानस पुत्री एवं भगवान कार्तिकेय की पत्नी ‘देवसेना’ के नाम से विख्यात है।

भगवती षष्ठी देवी अपनी योगमाया के प्रभाव से शिशुओं के पास सदैव वृद्ध माता के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहती हैं, देवी बालकों को स्वप्न में कभी खिलाती हैं, कभी हॅंसाती हैं, कभी रुलाती हैं, कभी दुलारती हैं।

नन्दबाबा ने श्रीकृष्ण जन्म के छठे दिन पुत्र के अरिष्ट निवारणार्थ ब्राह्मणों को आमन्त्रित कर भगवती षष्ठीदेवी का पूजन विधिपूर्वक करवाया था।

भगवान श्रीराम सहित सभी भाइयों का भी अयोध्या में छठी पूजन महोत्सव हुआ था।

बालक जन्म के बाद घर में 10 दिवसीय सूतक (अशौच) लग जाता है। इस अवधि में घर में प्रतिष्ठित देवताओं का पूजन परिवार के असगोत्रीय सदस्य (बहन-बेटी के परिवार) या ब्राह्मण द्वारा कराया जाता है।

इसी कारण नामकरण संस्कार, हवन-पूजन का विधान 11वें दिन सम्पन्न कराया जाता है। परन्तु
षष्ठीदेवी का पूजन शिशु के पिता एवं माता द्वारा छठे दिन ही किया जाता है। इसमें जननाशौच का विचार नहीं माना गया है।

जननाशौचमध्ये प्रथमषष्ठदशमदिनेषु दाने प्रतिग्रहे च न दोषः। अन्नं तु निषिद्धम्।
(पारस्करगृह्य० पञ्चभाष्य 1/16)

सूतिकावासनिलया जन्मदा नाम देवताः।
तासां यागनिमित्तं तु शुद्धिर्जन्मनि कीर्तिता।।
प्रथमे दिवसे षष्ठे दशमे चैव सर्वदा।
त्रिष्वेतेषु न कुर्वीत सूतकं पुत्रजन्मनि।।
(पा०गृ०सूत्र, पञ्चभाष्य में व्यासजी का वचन)

षष्ठीदेवी का पूजन प्राय: सायंकाल करने की परम्परा है।
छठे दिन षष्ठीदेवी पूजन करने के पीछे मान्यता है कि छठी रात्रि बालक के लिए विशेष अरिष्ट-योग रहता है।

छठे दिन की रात्रि को अनेक बाहरी बाधाऍं उपस्थित होती हैं; अतः बालक की रक्षा के लिए हाथ में शस्त्र धारण कर पुरुषों को रातभर शिशु की रक्षा करना चाहिए, सूतिकागृह में अखण्ड दीपक, शस्त्र आदि स्थापित करने चाहिए।

रक्षणीया तथा षष्ठी निशा तत्र विशेषतः।
रात्रौ जागरणं कार्यं जन्मदानां तथा बलिः।।
पुरुषाः शस्त्रहस्ताश्च नृत्यगीतैश्च योषितः।
रात्रौ जागरणं कुर्युः
(पारस्कर गृह्यसूत्र के मिताक्षरा में मार्कण्डेय जी का वचन)

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Author: sssrknews

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