पढ़ने में आया कि एक वृद्ध वामपंथी कवि ने कहा है कि “संघ ने सौ साल में कोई लेखक नहीं दिया जिसे संघ से बाहर कोई जानता हो।” मैं पढ़ कर मुस्कराया, लगा जैसे कोई अंधा कह रहा हो सूर्योदय कभी हुआ ही नहीं ! और सूर्य कहे भाई तूने आँखें खोली नहीं और दोष मुझ पर डाल दिया!
वामपंथ का खेमा सोचता है कि लेखक वही जो कॉफी हाउस में बहस करे, तीस चालिस लोगों के मध्य कविता पाठ में तालियाँ पाए और किसी अकादमी के मंच पर जुगाड़ लगा कर पुरस्कृत हो जाए। संघ का लेखक यह नहीं करता है क्योंकि संघ ने कभी ऐसा लेखक नहीं दिया, जिसने अपने ही धर्म, अपने ही समाज, अपने ही देवता से घृणा की हो।
संघ ने न कभी ईश्वर-विरोध को बौद्धिकता का प्रतीक माना, ना ही संस्कृति से द्वेष को आधुनिकता का चिह्न। हाँ, संघ ऐसे लेखकों को नहीं पैदा करता जो जीवनभर वेद और पुराणों को मूर्खता कहें, और बुढ़ापे में सत्यनारायण कथा सुनकर शांति खोजें। संघ ऐसे बुद्धिजीवी भी नहीं गढ़ता जो अपनी पूरी ऊर्जा धर्म का विरोध करने में खर्च कर दें, और अंत समय में प्रभु को याद करने लगें। संघ ऐसे लोगों को भी नहीं गढ़ता जो पहले राम का उपहास करें और फिर राम की शरण में जाएँ।
वामपंथी बुद्धिजीविता का सबसे बड़ा संकट यही है वह जीवन और विचार में संगति नहीं रख पाती। वह युवावस्था में क्रांति का शोर मचाती है और वृद्धावस्था में शांति के श्लोक गुनगुनाती है।
संघ का लेखक ऐसा नहीं है। वह बाल्यावस्था में भी “भारत माता की जय” कहता है, युवा अवस्था में भी, और अंतिम क्षणों में भी वही कहता है। उसकी आस्था कोई रणनीति नहीं जीवन की निरंतरता है। संघ का लेखक कलम से नहीं, कर्म से लिखता है।
संघ का लेखक मंचों की तालियों के लिए नहीं, मिट्टी की गंध के लिए लिखता है। वह पुरस्कार नहीं चाहता, वह चाहता है कि एक बालक “भारत” कहे तो उसके भीतर श्रद्धा जगे। कभी कभी तो उसके हिस्से के पुरस्कार भी छल से वामपंथी उठा ले जाते हैं! उसकी स्याही चीन और रूस से नहीं, शाखा की मिट्टी से बनती है। वह विचार नहीं बेचता वह संस्कृति बोता है।
तुम्हारे लिए लेखक वह है जो मार्क्स का भक्त हो और जो भारत को “वर्ग-संघर्ष की प्रयोगशाला” मानता हो। हमारे लिए लेखक वह है जो भारत को माँ मानता है और उसकी आँखों से भारतीय दृष्टि टपकती हो।
तुम्हारे पास लेनिन है तो हमारे पास स्वामी विवेकानंद हैं। तुम्हारे पास फूको है तो हमारे पास पंडित दीनदयाल उपाध्याय हैं! तुम्हारे पास ग्रैशियस है तो हमारे पास सीता राम गोयल और रामस्वरूप अग्रवाल हैं।तुम पश्चिम से विचार आयात करते हो, हम वेदों से विचार निकालते हैं।
सच कहा जाये तो वामपंथी समुदाय की समस्या यह है कि वे संघ के लेखकों को “लेखक” मानने की दृष्टि खो चुके हैं।
जब दीनदयाल उपाध्याय “एकात्म मानव दर्शन” लिखते हैं, तो वह दर्शन नहीं, क्रांति लिखते हैं। जब सीताराम गोयल “हिन्दू दृष्टि से इतिहास” लिखते हैं तो वह पुस्तक नहीं, प्रतिशोध की पुकार होती है और वामपंथ उस पुकार से काँप जाता है।
संघ का साहित्य कागज़ पर नहीं, जनता के हृदय पर लिखा जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि तुम्हारी कविताएँ “वर्ग चेतना” जगाती हैं, हमारी कविताएँ “राष्ट्र चेतना”।
तुम्हारे लेखक अंग्रेज़ी विश्वविद्यालयों में शोध विषय बनते हैं, हमारे लेखक बच्चों के संस्कारों में दिखाई देते हैं।तुम्हारा लेखक सत्ता के गठजोड़ से सिलेबस में होता है तो संघ के लेखकों का लेख नयी पीढ़ी के संस्कारों में झलकता है।
अब बताओ कौन बड़ा?
तुम नाम पूछते हो। वह तुम्हारी मानसिकता है जो ब्रांड में विश्वास रखती है। हमारे लेखक तो उस लोकदेव की तरह हैं जो रात के अंधेरे में पूजे जाते हैं, नाम नहीं लिया जाता, पर सब जानते हैं कि यही रक्षा करता है।
यह संघ की ही दृष्टि है कि कांतारा की धरती में जब लोकदेव गूँजता है, यह दृष्टि धर्म को जीवित रखती है।
जब भारत अपनी जड़ों में लौटता है तो उसके भीतर वही संस्कार बोलते हैं जिन्हें तुम “संघी विचार” कहकर हँसी में टाल देते हो। पर याद रखना हँसी कभी विचार को पराजित नहीं कर सकती।
अंत में इतना कहना चाहूँगा कि संघ लेखक नहीं गढ़ता, वह ऐसे मनुष्य गढ़ता है जो राष्ट्र लिखता है। उनकी कलम नहीं दिखती, पर उनका हर लेखन भारत का हित चाह कर उसको मजबूत करने में लहू की तरह लगा हुआ है।
और जो कवि यह कहता है कि संघ ने कोई लेखक नहीं दिया, उसे एक दिन अपने भीतर झाँकना चाहिए कि कहीं उसकी कलम की स्याही अब भी उस लाल रंग में डूबी तो नहीं जो भारत को देखने से पहले मॉस्को की ओर झुक जाती है!
तुम नाम ढूँढ़ते रहो, संघ विचार बोता रहेगा, जब इतिहास फिर लिखा जाएगा तो तुम्हारे नाम मिट जाएंगे, पर संघ के विचार तब भी जीवित होंगे।
संघ के सैकड़ों लेखकों के नाम मैं गिना सकता हूँ जिनकी लोकप्रियता वामपंथी तथाकथित बेस्टसेलर से ज्यादा है, लेकिन ये सब उस विचार के वाहक हैं जो न पुरस्कार से बनता है, न प्रचार से। संघ ने कभी लेखक नहीं बनाए उसने दृष्टि दी। और यही वामपंथ की पीड़ा है कि उनकी किताबें मर जाती हैं, पर संघ की दृष्टि बार-बार जन्म लेती है और कहते हैं न कि जिनकी दृष्टि स्वदेशी है, जिनके कलम में लोक है उनकी कलम अमर है।
– जलज कुमार मिश्र
साभार : डॉ. विकास दवे जी की वाल से






