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आज का पंचांग 01 जून 2026: पितृदोष निवारण के सरल उपाय, 51 शक्तिपीठों की महिमा, पुरुषोत्तम मास का महत्व और सभी राशियों का राशिफल

Daily panchang,पितृदोष निवारण के लिए कुछ सरल उपाय एवं इक्यावन शक्तिपीठ महत्व कथा,आज का आपका राशिफल

🌤️ दिनांक – 01 जून 2026
🌤️ दिन – सोमवार
🌤️ विक्रम संवत 2083
🌤️ शक संवत -1948
🌤️ अयन – उत्तरायण
🌤️ ऋतु – ग्रीष्म ॠतु
🌤️ मास – अधिक ज्येष्ठ
🌤️ पक्ष – कृष्ण
🌤️ तिथि – प्रतिपदा शाम 04:37 तक तत्पश्चात द्वितीया
🌤️ नक्षत्र – ज्येष्ठा शाम 07:08 तक तत्पश्चात मूल
🌤️ योग – सिद्ध सुबह 06:19 तक तत्पश्चात साध्य
🌤️*राहुकाल – सुबह 07:37 से सुबह 09:17 तक*
🌤️ सूर्योदय – 05:57
🌤️ सूर्यास्त – 07:15
दिशाशूल – पूर्व दिशा मे

पितृदोष निवारण के लिए कुछ सरल उपाय एवं इक्यावन शक्तिपीठ महत्व कथा,आज का आपका राशिफल आओ जानें

हिंदू मान्यताओं के अनुसार पितरों का आशीर्वाद जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का कारण माना जाता है। यदि किसी को पितृ दोष की चिंता हो, तो श्रद्धा और विश्वास के साथ यह सरल उपाय किया जा सकता है।

सबसे पहले थोड़ा सा चावल पकाएं। ध्यान रखें कि ये चावल केवल पितरों को समर्पित करने के लिए हों।

अपने कुल पुरोहित क़ो ना भूलें अन्यथा पितृदोष नहीं हटेगा

ध्यान रहे
ज़ब भी आप श्राद्ध कर्म करो वैष्णव ब्राह्मणों क़ो ही भोजन कराए जो प्याज़ लहसुन नहीं खाते हों,गुटखा पान तम्बाकू बीड़ी नहीं पीते हों ऐसे सदाचारी ब्राह्मण क़ो चुनें।

प्रत्येक अमावस्या पर पितृ तर्पण पितृ गायत्री पाठ ब्राह्मण भोजन अवश्य कराना चाहिए पितृदोष नहीं रहेगा।

पके हुए चावलों में थोड़ा शुद्ध घी और बूरा (या मिश्री का चूर्ण) मिलाएं।

इस मिश्रण को कौए,चिड़िया या अन्य पक्षियों को श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।

यह उपाय प्रत्येक शनिवार नियमित रूप से करें।

घर की मुख्य महिला या परिवार का कोई भी सदस्य श्रद्धा से यह कार्य कर सकता है।

मान्यता है कि नियमित रूप से यह उपाय करने से पितरों की कृपा प्राप्त होती है, परिवार में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और पितृ दोष के प्रभाव शांत होने लगते हैं।

पितरों का स्मरण, बुजुर्गों का सम्मान और जरूरतमंदों की सेवा भी पितृ तृप्ति के महत्वपूर्ण साधन माने गए हैं।

॥ ॐ पितृदेवताभ्यो नमः ॥

लड़का लड़की की उम्र ज्यादा होगई है विवाह नहीं होरहा है तो एक बार हमें जन्मपत्री अवश्य दिखाए समस्या है तो समाधान भी हैं

पुरुषोत्तममास में आज से ही शुरू करें ये काम मिलेगी हर पाप से मुक्ति

पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में दो ज्येष्ठ माह होंगे। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से साल के 365 दिनों में ही ये तिथियां भी शामिल होंगी। पंचांगानुसार तीन वर्षों तक तिथियों का क्षय होता है। तिथियों का क्षय होते-होते तीसरे वर्ष एक माह बन जाता है। इस कारण हर तीसरे वर्ष में अधिक मास होता है। अधिक मास को मलमास, पुरुषोत्तम मास आदि नामों से पुकारा जाता है। जिस चंद्र मास में सूर्य संक्राति नहीं होती, वह अधिक मास कहलाता है और जिस चंद्र मास में दो संक्रांतियों का संक्रमण हो रहा हो उसे क्षय मास कहते हैं। इसके लिए मास की गणना शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक की गई है। अधिक मास में शुभ कार्य नहीं किए जाते लेकिन धार्मिक अनुष्ठान कथा आदि के लिए यह महीना उत्तम माना जाता है।

विशेष बात यह है कि दो ज्येष्ठ वाले अधिक मास का योग 8 साल बाद आ रहा है। इसके पूर्व वर्ष 2007 में ज्येष्ठ में अधिक मास का योग बना था। वर्ष 2018 के बाद 2026 में अधिक होगा।

मलमास का महत्व

यह व्रत करने वाले को भूमि पर सोना चाहिए। एक समय सात्विक भोजन करना चाहिए। भगवान पुरुषोत्तम यानी श्रीकृष्ण या विष्णु भगवान का श्रद्धापूर्वक पूजन, मंत्र-जाप एवं हवन करना चाहिए। हरिवंश पुराण, श्रीमद् भागवत, रामायण, विष्णु स्तोत्र, रुद्राभिषेक के पाठ का अध्ययन, श्रवण आदि करें।

अधिक मास की समाप्ति पर स्नान, दान, जप आदि का अत्यधिक महत्व है। व्रत का उद्यापन करके ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ श्रद्धानुसार दान भी करना चाहिए। इस मास में वस्त्र, अन्न, गुड़-घी का दान एवं विशेषकर मालपुए का दान करना चाहिए।

मलमास में यह नहीं करें !

कुछ नित्य कर्म, कुछ नैमित्तिक कर्म और कुछ काम्य कर्मों विवाह, मुंडन, नव वधु प्रवेश, यज्ञोपवीत संस्कार, नए वस्त्रों को धारण करना, नवीन वाहन खरीद, बच्चे का नामकरण संस्कार आदि निषिद्ध हैं।

अधिक मास में क्या करें ?

जिस दिन मलमास शुरू हो रहा हो उस दिन प्रात: स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान सूर्य नारायण को पुष्प, चंदन अक्षत मिश्रित जल से अर्घ्य देकर पूजन करें। अधिक मास में शुद्ध घी के मालपुए बनाकर प्रतिदिन कांसी के बर्तन में रखकर फल, वस्त्र, दक्षिणा एवं अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करें।

संपूर्ण मास व्रत, तीर्थ स्नान, भागवत पुराण, ग्रंथों का अध्ययन विष्णु यज्ञ आदि करें। जो कार्य पूर्व में ही प्रारंभ किए जा चुके हैं, उन्हें इस मास में किया जा सकता है। इस मास में मृत व्यक्ति का प्रथम श्राद्ध किया जा सकता है। रोग आदि की निवृत्ति के लिए महामृत्युंजय, रूद्र जपादि अनुष्ठान किए जा सकते हैं। इस मास में दुर्लभ योगों का प्रयोग, संतान जन्म के कृत्य, पितृ श्राद्ध, गर्भाधान, पुंसवन सीमंत संस्कार किए जा सकते हैं।

51 शक्तिपीठ पौराणिक कथा एवं विवरण
देवी भागवत में जहां 108 और देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का ज़िक्र मिलता है, वहीं तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। देवी पुराण में जरूर 51 शक्तिपीठों की ही चर्चा की गई है। इन 51 शक्तिपीठों में से कुछ विदेश में भी हैं और पूजा-अर्चना द्वारा प्रतिष्ठित हैं।

ज्ञातव्य है की इन 51 शक्तिपीठों में भारत-विभाजन के बाद 5 और भी कम हो गए और आज के भारत में 42 शक्ति पीठ रह गए है। 1 शक्तिपीठ पाकिस्तान में चला गया और 4 बांग्लादेश में। शेष 4 पीठो में 1 श्रीलंका में, 1 तिब्बत में तथा 2 नेपाल में है।
या देवी सर्व भुतेशु शक्ति रुपेन सस्मिथा नम: तस्ये नम: तस्ये नम: तस्ये नमो नम:||

देश-विदेश में स्थित इन 51 शक्तिपीठों के सन्दर्भ में जो कथा है, वह यह है कि राजा प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में माता जगदम्बिका ने सती के रूप में जन्म लिया था और भगवान शिव से विवाह किया। एक बार मुनियों का एक समूह यज्ञ करवा रहा था। यज्ञ में सभी देवताओं को बुलाया गया था। जब राजा दक्ष आए तो सभी लोग खड़े हो गए लेकिन भगवान शिव खड़े नहीं हुए। भगवान शिव दक्ष के दामाद थे। यह देख कर राजा दक्ष बेहद क्रोधित हुए। दक्ष अपने दामाद शिव को हमेशा निरादर भाव से देखते थे। सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व / ब्रिहासनी’ नामक यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ मेंब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता और सती के पति भगवान शिव को इस यज्ञ में शामिल होने के लिए निमन्त्रण नहीं भेजा था। जिससे भगवान शिव इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए। नारद जी से सती को पता चला कि उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है लेकिन उन्हें निमंत्रित नहीं किया गया है। इसे जानकर वे क्रोधित हो उठीं। नारद ने उन्हें सलाह दी कि पिता के यहां जाने के लिए बुलावे की ज़रूरत नहीं होती है। जब सती अपने पिता के घर जाने लगीं तब भगवान शिव ने मना कर दिया। लेकिन सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी जिद्द कर यज्ञ में शामिल होने चली गई। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष ने भगवान शंकर के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें करने लगे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती को यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ और वहीं यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। सर्वत्र प्रलय-सा हाहाकार मच गया। भगवान शंकर के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया और अन्य देवताओं को शिव निंदा सुनने की भी सज़ा दी और उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता और ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। तब भगवान शिव ने सती के वियोग में यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए सम्पूर्ण भूमण्डल पर भ्रमण करने लगे। भगवती सती ने अन्तरिक्ष में शिव को दर्शन दिया और उनसे कहा कि जिस-जिस स्थान पर उनके शरीर के खण्ड विभक्त होकर गिरेंगे, वहाँ महाशक्तिपीठ का उदय होगा। सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर विचरण करते हुए तांडव नृत्य भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देखकर और देवों के अनुनय-विनय पर भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड कर धरती पर गिराते गए। जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते। ‘तंत्र-चूड़ामणि’ के अनुसार इस प्रकार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र याआभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। इस तरह कुल 51 स्थानों में माता की शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या करशिव को पुन: पति रूप में प्राप्त किया।

शक्तिपीठों का विवरण
किरीट कात्यायनी शक्तिपीठ👉 पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है किरीट शक्तिपीठ, जहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं।

कात्यायनी शक्तिपीठ👉 वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं।

करवीर शक्तिपीठ👉 महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है।

श्री पर्वत शक्तिपीठ👉 इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतान्तर है कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती का दक्षिण तल्प यानी कनपटी गिरा था। यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं।

विशालाक्षी शक्तिपीठ👉 उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं।

गोदावरी तट शक्तिपीठ👉 आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं।

शुचीन्द्रम शक्तिपीठ👉 तमिलनाडु, कन्याकुमारी के त्रिासागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुची शक्तिपीठ, जहां सती के उफध्र्वदन्त (मतान्तर से पृष्ठ भागद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं।

पंच सागर शक्तिपीठ👉 इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता का नीचे के दान्त गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं।

ज्वालामुखी शक्तिपीठ👉 हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां सती का जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं।

भैरव पर्वत शक्तिपीठ👉 इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतदभेद है। कुछ गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का उफध्र्व ओष्ठ गिरा है। यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं।

अट्टहास शक्तिपीठ👉 अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। जहां माता का अध्रोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति पफुल्लरा तथा भैरव विश्वेश हैं।

जनस्थान शक्तिपीठ👉 महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है जनस्थान शक्तिपीठ जहां माता का ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष हैं।

कश्मीर शक्तिपीठ👉 जम्मू-कश्मीर के अमरनाथ में स्थित है यह शक्तिपीठ जहां माता का कण्ठ गिरा था। यहां की शक्ति महामाया तथा भैरव त्रिसंध्येश्वर हैं।

नन्दीपुर शक्तिपीठ👉 पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है यह पीठ, जहां देवी की देह का कण्ठहार गिरा था। यहां कि शक्ति निन्दनी और भैरव निन्दकेश्वर हैं।

श्री शैल शक्तिपीठ👉 आंध्रप्रदेश के कुर्नूल के पास है श्री शैल का शक्तिपीठ, जहां माता का ग्रीवा गिरा था। यहां की शक्ति महालक्ष्मी तथा भैरव संवरानन्द अथव ईश्वरानन्द हैं।

नलहरी शक्तिपीठ👉 पश्चिम बंगाल के बोलपुर में है नलहरी शक्तिपीठ, जहां माता का उदरनली गिरी थी। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव योगीश हैं।.

मिथिला शक्तिपीठ👉 इसका निश्चित स्थान अज्ञात है। स्थान को लेकर मन्तारतर है तीन स्थानों पर मिथिला शक्तिपीठ को माना जाता है, वह है नेपाल के जनकपुर, बिहार के समस्तीपुर और सहरसा, जहां माता का वाम स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति उमा या महादेवी तथा भैरव महोदर हैं।

रत्नावली शक्तिपीठ👉 इसका निश्चित स्थान अज्ञात है, बंगाज पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के चेन्नई में कहीं स्थित है रत्नावली शक्तिपीठ जहां माता का दक्षिण स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति कुमारी तथा भैरव शिव हैं।

अम्बाजी शक्तिपीठ, प्रभास पीठ👉 गुजरात गूना गढ़ के गिरनार पर्वत के प्रथत शिखर पर देवी अिम्बका का भव्य विशाल मन्दिर है, जहां माता का उदर गिरा था। यहां की शक्ति चन्द्रभागा तथा भैरव वक्रतुण्ड है। ऐसी भी मान्यता है कि गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का उध्र्वोष्ठ गिरा था, जहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण है।

जालंधर शक्तिपीठ 👉 पंजाब के जालंधर में स्थित है माता का जालंधर शक्तिपीठ जहां माता का वामस्तन गिरा था। यहां की शक्ति त्रिपुरमालिनी तथा भैरव भीषण हैं।

रामागरि शक्तिपीठ👉 इस शक्ति पीठ की स्थिति को लेकर भी विद्वानों में मतान्तर है। कुछ उत्तर प्रदेश के चित्राकूट तो कुछ मध्य प्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का दाहिना स्तन गिरा था। यहा की शक्ति शिवानी तथा भैरव चण्ड हैं।

वैद्यनाथ का हार्द शक्तिपीठ👉 झारखण्ड के गिरिडीह, देवघर स्थित है वैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ, जहां माता का हृदय गिरा था। यहां की शक्ति जयदुर्गा तथा भैरव वैद्यनाथ है। एक मान्यतानुसार यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था।

वक्त्रोश्वर शक्तिपीठ👉 माता का यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैिन्थया में स्थित है जहां माता का मन गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव वक्त्रानाथ हैं।

कण्यकाश्रम कन्याकुमारी शक्तिपीठ👉 तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ीद्ध के संगम पर स्थित है कण्यकाश्रम शक्तिपीठ, जहां माता का पीठ मतान्तर से उध्र्वदन्त गिरा था। यहां की शक्ति शर्वाणि या नारायणी तथा भैरव निमषि या स्थाणु हैं।

बहुला शक्तिपीठ👉 पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता का वाम बाहु गिरा था। यहां की शक्ति बहुला तथा भैरव भीरुक हैं।

उज्जयिनी शक्तिपीठ👉 मध्य प्रदेश के उज्जैन के पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है उज्जयिनी शक्तिपीठ। जहां माता का कुहनी गिरा था। यहां की शक्ति मंगल चण्डिका तथा भैरव मांगल्य कपिलांबर हैं।

मणिवेदिका शक्तिपीठ👉 राजस्थान के पुष्कर में स्थित है मणिदेविका शक्तिपीठ, जिसे गायत्री मन्दिर के नाम से जाना जाता है यहीं माता की कलाइयां गिरी थीं। यहां की शक्ति गायत्री तथा भैरव शर्वानन्द हैं।

प्रयाग शक्तिपीठ👉 उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है। यहां माता की हाथ की अंगुलियां गिरी थी। लेकिन, स्थानों को लेकर मतभेद इसे यहां अक्षयवट, मीरापुर और अलोपी स्थानों गिरा माना जाता है। तीनों शक्तिपीठ की शक्ति ललिता हैं।विरजाक्षेत्रा,

उत्कल शक्तिपीठ👉 उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है जहां माता की नाभि गिरा था। यहां की शक्ति विमला तथा भैरव जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं।

कांची शक्तिपीठ👉 तमिलनाडु के कांचीवरम् में स्थित है माता का कांची शक्तिपीठ, जहां माता का कंकाल गिरा था। यहां की शक्ति देवगर्भा तथा भैरव रुरु हैं।

कालमाध्व शक्तिपीठ👉 इस शक्तिपीठ के बारे कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। परन्तु, यहां माता का वाम नितम्ब गिरा था। यहां की शक्ति काली तथा भैरव असितांग हैं।

शोण शक्तिपीठ👉 मध्य प्रदेश के अमरकंटक के नर्मदा मन्दिर शोण शक्तिपीठ है। यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था। एक दूसरी मान्यता यह है कि बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मन्दिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है। यहां सती का दायां नेत्रा गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी तथा भैरव भद्रसेन हैं।

कामरूप कामाख्या शक्तिपीठ👉 कामगिरिअसम गुवाहाटी के कामगिरि पर्वत पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का योनि गिरा था। यहां की शक्ति कामाख्या तथा भैरव उमानन्द हैं।

जयन्ती शक्तिपीठ👉 जयन्ती शक्तिपीठ मेघालय के जयन्तिया पहाडी पर स्थित है, जहां माता का वाम जंघा गिरा था। यहां की शक्ति जयन्ती तथा भैरव क्रमदीश्वर हैं।

मगध् शक्तिपीठ👉 बिहार की राजधनी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है जहां माता का दाहिना जंघा गिरा था। यहां की शक्ति सर्वानन्दकरी तथा भैरव व्योमकेश हैं।

त्रिस्तोता शक्तिपीठ👉 पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के शालवाड़ी गांव में तीस्ता नदी पर स्थित है त्रिस्तोता शक्तिपीठ, जहां माता का वामपाद गिरा था। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव ईश्वर हैं।

त्रिपुरी सुन्दरी शक्तित्रिपुरी पीठ👉 त्रिपुरा के राध किशोर ग्राम में स्थित है त्रिपुरे सुन्दरी शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण पाद गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुर सुन्दरी तथा भैरव त्रिपुरेश हैं।

विभाष शक्तिपीठ👉 पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक ग्रााम में स्थित है विभाष शक्तिपीठ, जहां माता का वाम टखना गिरा था। यहां की शक्ति कापालिनी, भीमरूपा तथा भैरव सर्वानन्द हैं।

देवीकूप पीठ कुरुक्षेत्र (शक्तिपीठ)👉 हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ, जिसे श्रीदेवीकूप(भद्रकाली पीठ के नाम से मान्य है। माता का दहिने चरण (गुल्पफद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति सावित्री तथा भैरव स्थाणु हैं।

युगाद्या शक्तिपीठ (क्षीरग्राम शक्तिपीठ)👉 पश्चिम बंगाल के बर्दमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित है युगाद्या शक्तिपीठ, यहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था।

विराट का अम्बिका शक्तिपीठ👉 राजस्थान के गुलाबी नगरी जयपुर के वैराटग्राम में स्थित है विराट शक्तिपीठ, जहाँ सती के ‘दायें पाँव की उँगलियाँ’ गिरी थीं।। यहां की शक्ति अंबिका तथा भैरव अमृत हैं।

काली शक्तिपीठ👉 पश्चिम बंगाल, कोलकाता के कालीघाट में कालीमन्दिर के नाम से प्रसिध यह शक्तिपीठ, जहां माता के दाएं पांव की अंगूठा छोड़ 4 अन्य अंगुलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव नकुलेश हैं।

मानस शक्तिपीठ👉 तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति की दाक्षायणी तथा भैरव अमर हैं।

लंका शक्तिपीठ👉 श्रीलंका में स्थित है लंका शक्तिपीठ, जहां माता का नूपुर गिरा था। यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं। लेकिन, उस स्थान ज्ञात नहीं है कि श्रीलंका के किस स्थान पर गिरे थे।

गण्डकी शक्तिपीठ👉 नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम पर स्थित है गण्डकी शक्तिपीठ, जहां सती के दक्षिणगण्ड(कपोल) गिरा था। यहां शक्ति `गण्डकी´ तथा भैरव `चक्रपाणि´ हैं।

गुह्येश्वरी शक्तिपीठ 👉 नेपाल के काठमाण्डू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है गुह्येश्वरी शक्तिपीठ है, जहां माता सती के दोनों जानु (घुटने) गिरे थे। यहां की शक्ति `महामाया´ और भैरव `कपाल´ हैं।

हिंगलाज शक्तिपीठ👉 पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रान्त में स्थित है माता हिंगलाज शक्तिपीठ, जहां माता का ब्रह्मरन्ध्र गिरा था।

सुगंध शक्तिपीठ👉 बांग्लादेश के खुलना में सुगंध नदी के तट पर स्थित है उग्रतारा देवी का शक्तिपीठ, जहां माता का नासिका गिरा था। यहां की देवी सुनन्दा है तथा भैरव त्रयम्बक हैं।

करतोयाघाट शक्तिपीठ👉 बंग्लादेश भवानीपुर के बेगड़ा में करतोया नदी के तट पर स्थित है करतोयाघाट शक्तिपीठ, जहां माता का वाम तल्प गिरा था। यहां देवी अपर्णा रूप में तथा शिव वामन भैरव रूप में वास करते हैं।

चट्टल शक्तिपीठ 👉 बंग्लादेश के चटगांव में स्थित है चट्टल का भवानी शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना बाहु यानी भुजा गिरा था। यहां की शक्ति भवानी तथा भेरव चन्द्रशेखर हैं।

यशोरेश्वरी शक्तिपीठ👉 बांग्लादेश के जैसोर खुलना में स्थित है माता का प्रसि( यशोरेश्वरी शक्तिपीठ, जहां माता का बायीं हथेली गिरा था। यहां शक्ति यशोरेश्वरी तथा भैरव चन्द्र हैं।

आज का आपका राशिफल

मेष राशि : आज का दिन व्यावसायिक और सामाजिक दायरे में सम्मान और प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए अनुकूल है। पारिवारिक जीवन आरामदायक और शांतिपूर्ण रहेगा। आपकी जीवन-शैली में सुधार होगा।

वृष राशि : आज आपका परिवारिक जीवन आनंदमय और आरामदायक होगा। आप में से कुछ विलासिता पर खर्च करेंगे, जो आपकी सामाजिक स्थिति को बढ़ाएंगे। आज आपको सफलता के नए अवसर मिलेंगे जो समाज में सम्मान दिलाएंगे।

मिथुन राशि : नौकरीपेशा लोगों को आज अधिक यात्राएं करनी पड़ सकती हैं। आज त्वरित पैसा बनाने की योजनाओं या आकर्षक प्रस्तावों से दूर रहना बेहतर है। अगर किसी को प्रपोज़ करना चाहते हैं तो आज का दिन उचित नहीं है।

कर्क राशि : छात्रों और श्रमिक वर्ग के लिए आज का दिन शुभ नहीं है किन्तु आपको अपने लक्ष्यों और महत्वाकांक्षाओं की प्राप्ति के प्रति गतिशील रहने चाहिए। यदि अति आवश्यक न हो तो चीजों से छेड़छाड़ न करें।

सिंह राशि : आज प्रेमपूर्ण संपर्क यदि कोई हो तो यह एक बुरा मोड़ ले सकता है और आप में से कुछ लोग बदनामी और अपमान का शिकार हो सकते हैं। जीवनसाथी या संतान की सेहत को लेकर चिंता हो सकती है।

कन्या राशि : आर्थिक स्थिति शुभ रहेगी। कार्य संबंधी यात्राएं और सहयोग आने वाले महीनों में सकारात्मक परिणाम देंगे। आज आप रोमांटिक संपर्क के मामले में भाग्यशाली रहेंगे। आपके आवेग पर नियंत्रण रखें।

तुला राशि : यह आपकी सामाजिक स्थिति को बढ़ावा देने के लिए एक अनुकूल समय है। विवाह के लिए रिश्ता आ सकता है। आपका साथी कुछ मुद्दों को विकसित कर सकता है, जो स्थानांतरण या माइग्रेशन का कारण हो सकता है। अपने मन को शांत रखें।

वृश्चिक राशि : भावनात्मक फैसलों के लिए समय बहुत अ’छा नहीं है क्योंकि इस अवधि के दौरान आप जो भी निर्णय लेंगे, उसे पूरा करना मुश्किल होगा। इस समय अपने साहस को बटोरें तथा समय का अधिकतम लाभ उठाएं। आर्थिक दृष्टि से चीजें यथावत रहेंगी।

धनु राशि : आज आपको अपने रिश्तों और संबंधों पर अत्यधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। सरकारी नौकरी की चाह रखने वालों के लिए समय अच्छा है। व्यापारियों के लिए समय अनुकूल है। माता की सेहत को लेकर समय, धन और ऊर्जा खर्च होगी।

मकर राशि : यह आपके लिए बाधाओं और मुश्किल से निपटने के लिए एक कठिन समय है। आज कार्य स्थल पर दूसरों की आकांक्षाओं को आगे बढ़ाने से बचें। लंबे समय से लंबित मुकदमेबाजी और अदालती मामले आपके पक्ष में सुलझेंगे।

कुम्भ राशि : प्रियजनों के साथ समय बिताना आनंददायक रहेगा। भाई-बहनों की सामाजिक स्थिति में अप्रत्याशित और अचानक वृद्धि होगी। प्रेमी युगलों के लिए आज का दिन शुभ नहीं है। कुछ अनिष्ट घट सकता है।

मीन राशि : परिवारिक जीवन में खुशी और सद्भाव कायम रहेगा। नौकरीपेशा जातकों के लिए अच्छा समय है। कानूनी उलझनों, वाहनों और तेज वस्तुओं से सावधान रहें। अपने काम को सुखद बनाने के लिए सभी प्रयास करें। शत्रु बनता काम बिगाड़ सकते हैं।

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Author: sssrknews

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