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आज का पंचांग – 24 अप्रैल 2026 (शुक्रवार)

Daily panchang,शत्रुविनाशनी माँ बगुलामुखी जयंती व्रत कथा महत्व पूजा विधि एवं जन्मकुंडली में कालसर्प योग है या वास्तुदोष निवारण कैसे होगा

🌤️ दिनांक – 24 अप्रैल 2026
🌤️ दिन – शुक्रवार
🌤️ विक्रम संवत 2083
🌤️ शक संवत -1948
🌤️ अयन – उत्तरायण
🌤️ ऋतु – ग्रीष्म ॠतु
🌤️ मास – वैशाख
🌤️ पक्ष – शुक्ल
🌤️ तिथि – अष्टमी शाम 07:21 तक तत्पश्चात नवमी
🌤️ नक्षत्र – पुष्य रात्रि 08:14 तक तत्पश्चात अश्लेशा
🌤️ योग – शूल 25 अप्रैल रात्रि 01:24 तक तत्पश्चात गण्ड
🌤️*राहुकाल – सुबह 11:01 से दोपहर 12:37 तक*
🌤️ सूर्योदय – 06:14
🌤️ सूर्यास्त – 06:59
दिशाशूल – पश्चिम दिशा मे

शत्रुविनाशनी माँ बगुलामुखी जयंती व्रत कथा महत्व पूजा विधि एवं जन्मकुंडली में कालसर्प योग है या वास्तुदोष निवारण कैसे होगा आओ जानें

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बगलामखी जयंती मनाई जाती है। मां बगलामुखी भय और शत्रुओं से मुक्ति देती हैं। इनकी पूजा अर्चना और कृपा से व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति होती है।

हिंदू धर्म में बगलामुखी जयंती का बड़ा महत्व है. बगलामुखी जयंती हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती हैं, क्योंकि इसी दिन मां बगलामुखी प्रकट हुई थी. इसलिए अष्टमी तिथि पर माता रानी की पूजा अर्चना के साथ ही उनके प्रिय भोग लगाते हैं. माता रानी की पूजा अर्चना से व्यक्ति को आरोग्य में वृद्धि और शत्रुओं से मुक्ति मिलती है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 23 अप्रैल को रात 8 बजकर 50 मिनट पर होगी. वहीं इसका समापन अगले दिन 24 अप्रैल को शाम 7 बजकर 22 मिनट पर होगा. इसके बाद नवमी तिथि की शुरुआत होगी. वहीं उदया तिथि को देखते हुए बगलामुखी जयंती 24 अप्रैल 2026 को मनाई जाएगी।

बगलामुखी जयंती का शुभ मुहूर्त

इस बार बगलामुखी जयंती का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 24 मिनट से लेकर 9 बजकर 2 मिनट तक रहेगा. वहीं अमृत काल का शुभ मुहूर्त सुबह 9 बजकर 3 मिनट से लेकर 10 बजकर 42 मिनट तक रहेगा. वहीं शुभ चौघड़ियां मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 18 मिनट से लेकर 1 बजकर 58 मिनट तक रहेगा. प्रदोष काल शाम को 6 बजकर 6 मिनट से लेकर 7 बजकर 38 मिनट तक रहेगा।

बगलामुखी जयंती का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां बगलामुखी की पूजा करने से भय, शत्रु और बाधाओं का अंत होत होता है. इसके साथ ही इस दिन पूजा, हवन और मंत्रोच्चार से घर की नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं. बुरी नजर से छुटकारा मिलता है. मां बगलागुखी की पूजा अर्चना करेन से आरोग्य की समाप्ति और माता रानी की कृपा प्राप्त होती है।

माँ बगलामुखी पौराणिक कथा
एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। संसार की रक्षा करना असंभव हो गया। यह तूफान सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए।
इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे, तब भगवान शिव ने कहा: शक्ति रूप के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएं।
तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया। भगवान विष्णु के तप से देवी शक्ति प्रकट हुईं। उनकी साधना से महात्रिपुरसुंदरी प्रसन्न हुईं। सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीतांबरा स्वरूप देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। इस तेज से ब्रह्मांडीय तूफान थम गया।
मंगलयुक्त चतुर्दशी की अर्धरात्रि में देवी शक्ति का देवी बगलामुखी के रूप में प्रादुर्भाव हुआ था। त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रुक सका। देवी बगलामुखी को वीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वयं ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं। इनके शिव को महारुद्र कहा जाता है। इसीलिए देवी सिद्ध विद्या हैं। तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं। गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं।
दसमहाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या है देवी बगलामुखी। इनकी उपासना इनके भक्त शत्रु नाश, वाकसिद्ध और वाद- विवाद में विजय के लिए करते है। इनमें सारे ब्रह्मांड की शक्ति का समावेश है, इनकी उपासना से भक्त के जीवन की हर बाधा दूर होती है और शत्रुओं का नाश के साथ साथ बुरी शक्तियों का भी नाश करती है। देवी को बगलामुखी, पीताम्बरा, बगूलामुखी ब्रह्मास्त्र विद्या आदि नामों से भी जाना जाता है।

माता बगलामुखी जयंती शक्तिशाली मंत्र का राज
हर साल वैशाख माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बगलामुखी जयंती मनाई जाती है। अंग्रेजी माह के अनुसार इस बार यह जयंती 24 अप्रैल 2026 शुक्रवार को मनाई जा रही है। जानिए कि क्यों हैं यह महाशक्ति खास और क्या है इनका शक्तिशाली मंत्र।

महाशक्ति क्यों है खास?

10 महाविद्याओं में से एक 8वीं महाविद्या बगलामुखी है। माता बगलामुखी की साधना युद्ध में विजय होने और शत्रुओं के नाश के लिए की जाती है। इनकी साधना शत्रु भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है। कहते हैं कि नलखेड़ा में कृष्ण और अर्जुन ने महाभारत के युद्ध के पूर्व माता बगलामुखी की पूजा अर्चना की थी।

माता बगलामुखी शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है। इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है। शांति कर्म में, धन-धान्य के लिए, पौष्टिक कर्म में, वाद-विवाद में विजय प्राप्त करने हेतु देवी उपासना व देवी की शक्तियों का प्रयोग किया जाता हैं। देवी का साधक भोग और मोक्ष दोनों ही प्राप्त कर लेते हैं। वे चाहें तो शत्रु की जिव्हा ले सकती हैं और भक्तों की वाणी को दिव्यता का आशीष दे सकती हैं। देवी वचन या बोल-चाल से गलतियों तथा अशुद्धियों को निकाल कर सही करती हैं।

भारत में मां बगलामुखी के तीन ही प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं जो क्रमश: दतिया (मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा जिला शाजापुर (मध्यप्रदेश) में हैं। तीनों का अपना अलग-अलग महत्व है। यहां देशभर से शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत तांत्रिक अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं।

शक्तिशाली मंत्र का राज : हल्दी या पीले कांच की माला से आठ माला ‘ऊँ ह्नीं बगुलामुखी देव्यै ह्नीं ओम नम:’ दूसरा मंत्र- ‘ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ॐ स्वाहा।’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें, देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढ़ाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है।

बगलामुखी जयंती का क्या महत्व है?

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि जो भक्त देवी बगलामुखी की पूजा करते हैं, वे अपने शत्रुओं पर सम्पूर्ण नियंत्रण पा कर उनसेस छुटकारा पा लेते हैं।

देवी व्यक्ति को उसकी भावनाओं और व्यवहार पर नियंत्रण की भावना भी प्रदान करती है अर्थात् क्रोध, मन के आवेग, जीभ और खाने की आदतों पर। आत्म-साक्षात्कार और योग की प्रक्रिया में, इस तरह के नियंत्रण की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

यह भी माना जाता है कि देवी की पूजा करने से, भक्त खुद को काले जादू और अन्य गैर-घटनाओं से बचा सकते हैं।

व्यक्ति दूसरों को सम्मोहित करने के लिए शक्तियों को प्राप्त करने के लिए भी देवता की पूजा करते हैं।

किसी कानूनी समस्या से मुक्त होने के लिए भी देवता की पूजा की जाती है।

जो भक्तिपूर्वक देवी की आराधना करता है, वह प्रभुत्व, वर्चस्व और शक्ति से परिपूर्ण हो जाता है।

बगलामुखी माता जयंती के अनुष्ठान क्या हैं?

भक्त सबसे पहले सुबह पवित्र स्नान करते हैं और फिर पीले रंग के कपड़े पहनते हैं।

बगलामुखी जयंती के दिन बगलामुखी माता की पूजा करने के लिए, भक्त वेदी पर मूर्ति या देवता की मूरत रखते हैं।

इसके बाद, वे अनुष्ठानों के साथ शुरुआत करने के लिए अगरबत्तियां और एक दीया जलाते हैं।

भक्त फूल, नारियल और माला के साथ देवता को तैयार किया हुआ पवित्र भोजन (प्रसाद) अर्पित करते हैं ।

देवी बगलामुखी की आरती की जाती है और देवता को जगाने के लिए पवित्र मंत्रों का जाप किया जाता है।

आमंत्रितों और परिवार के सदस्यों के बीच प्रसाद वितरित किया जाता है।

भक्तगण देवता का दिव्य आशीर्वाद लेने के लिए बगलामुखी जयंती के दिन दान और पुण्य के कई कार्य करते हैं।

बगलामुखी जयंती कैसे मनाई जाती है?

बगलामुखी जयंती के शुभ दिन, भक्त देवी बगलामुखी की पूजा और अर्चना करते हैं।

छोटी लड़कियों की भी पूजा की जाती है और पवित्र भोजन उन्हें चढ़ाया जाता है क्योंकि उन्हें देवी का अवतार माना जाता है।

मंदिरों में और पूजा स्थल पर, कीर्तन और जागरण आयोजित किए जाते हैं।

भक्तगण अति उत्साह और समर्पण के साथ बगलामुखी पूजा करते हैं।

बगलामुखी जयंती की किंवदंती क्या है?

शास्त्रों के अनुसार, यह माना जाता है कि एक बार भारी बाढ़ आई थी जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का पूर्ण विनाश हुआ था। सभी जीवित प्राणी और पूरी सृष्टि दांव पर थी। देवताओं ने तब भगवान शिव से सहायता मांगी। देवता ने सुझाव दिया कि केवल देवी शक्ति में ही तूफान को शांत करने की शक्ति है। पृथ्वी को पीड़ा से बचाने के लिए देवी बगलामुखी हरिद्रा सरोवर से निकलीं और उन सभी को बचाया। उस दिन के बाद से, देवी बगलामुखी को विपत्तियों और बुराइयों से राहत पाने के लिए पूजा जाता है।

कुंडली में ग्रहण योग और काल सर्प योग
सूर्य सिद्धांत के अनुसार सूर्य से 6 राशि के अंतर अर्थात 180 अंश की दूरी पर पृथ्वी की छाया रहती है। पृथ्वी की छाया को भूच्छाया, पात या छाया ग्रह राहु, केतु भी कहते हैं। पूर्णिमा की रात्रि के अंत में जब चंद्रमा भूच्छाया में प्रवेश कर जाता है तो चंद्रमा का लोप हो जाता है। इस खगोलीय घटना को खग्रास (पूर्ण) चंद्र ग्रहण कहते हैं। चंद्र ग्रहण के समय पृथ्वी, सूर्य व चंद्रमा के मध्य में आ जाती है, इस कारण पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है जिससे चंद्रमा आच्छादित हो जाता है। जब भूछाया से चंद्रमा का कुछ हिस्सा ही आच्छादित होता है तो इसे खंडग्रास चंद्र ग्रहण रहते हैं।

चंद्र ग्रहण : पूर्णिमा तिथि के अंत में सूर्य व पात का अंतर 9के भीतर रहने पर चंद्र ग्रहण अवश्य होता है। तथा 9 से 13 अंशों के बीच अंतर रहने पर भी कभी चंद्र ग्रहण होने की संभावना रहती है।

सूर्य ग्रहण : अमावस्या के दिन जब सूर्य की राहु या केतु से युति हो तथा सूर्य से राहु या केतु का अंतर 15 अंश से कम हो तो अवश्य ही सूर्य ग्रहण होता है। और 18 अंशों के अंतर पर कभी-कभी सूर्य ग्रहण संभावित रहता है। इससे अधिक अंतर पर ग्रहण नहीं होता है।

सूर्य ग्रहण के समय सूर्य बिंब के आच्छादित होने का तात्पर्य यह लगाया जाता है कि राहु/केतु ने सूर्य को ग्रस लिया है। पृथ्वी के जिस हिस्से में सूर्य ग्रहण दिखाई देता है, उस हिस्से पर राहु-केतु का अधिक कुप्रभाव पड़ता है।

ग्रहण का शुभाशुभ प्रभाव :

महर्षि वशिष्ठ के अनुसार जिनकी जन्मराशि में ग्रहण हो, उन्हें धन आदि की हानि होती है। जिनके जन्मनक्षत्र पर सूर्य या चंद्र ग्रहण हो, उन्हें विशेष रूप से भयप्रद रोग व शोक देने वाला होता है।

महर्षि गर्ग के अनुसार अपनी जन्मराशि से 3, 4, 8, 11 वें स्थान में ग्रहण पड़े तो शुभ और 5, 7, 9, 12 वें स्थान में पड़े तो मध्यमफल तथा 1, 2, 6, 10 व स्थान में ग्रहण अनिष्टप्रद होता है।” इस प्रकार जन्म राशि में ग्रहण का होना सर्वाधिक अनिष्टप्रद होता है।

जन्मकुंडली में ग्रहण योग :

1. जिस जातक की जन्मकुंडली में चंद्रमा की राहु या केतु से युति हो उस जातक की कुंडली में ग्रहण योग होता है।

2. सूर्य, चंद्र और राहु या केतु यह तीन ग्रह यदि एक ही राशि में स्थित हों तो भी ग्रहण योग होता है। यह योग पहले वाले योग से अधिक अशुभ है क्योंकि इसमें चंद्र व सूर्य दोनों ही दूषित हो जाते हैं।

3. ग्रहणकाल में अथवा ग्रहण के सूतक काल में जन्म लेने वाले जातकों के जन्मस्थ सूर्य व चंद्रमा को राहु-केतु हमेशा के लिए दूषित कर देते हैं।

4. राहु-केतु की भांति सूर्य या चंद्रमा से शनि की युति को भी बहुत से आचार्य ग्रहण योग मानते हैं।

प्रभावी ग्रहण योग :

1. तुला राशि को छोड़कर अन्य किसी भी राशि में यदि युवावस्था (10 से 22 अंश) का सूर्य हो तथा उसकी राहु या केतु से युति हो तो ऐसा ग्रहण योग प्रभावहीन होता है क्योंकि प्रचंड किरणों वाले सूर्य के सम्मुख छाया ग्रह (राहु-केतु) टिक ही नहीं सकते तो फिर ग्रहण क्या लगाएंगे? कृष्ण पक्ष की चतुर्दर्शी, अमावस्या और शुक्ल प्रतिपदा को ही राहु-केतु प्रभावी रहते हैं।

2. कर्क या वृषभ राशि में शुक्लपक्ष का बलवान चंद्रमा हो तथा ग्रहणकाल का जन्म न हो तो चंद्र+राहु या केतु की युति से बनने वाला ग्रहण योग अप्रभावी रहता है अर्थात अनिष्ट प्रभाव नहीं देता है।

ग्रहण योग का फल :

1. जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में ग्रहण योग होता है, वह व्यक्ति अपने जीवन में अनेक बाधाओं व कष्टों से दुखी रहता है। उसे शारीरिक, मानसिक या आर्थिक परेशानी बनी रहती है।

2. जिस भाव में ग्रहण योग होता है, उस भाव का शुभफल क्षीण हो जाता है। तथा ग्रहणशील सूर्य, चंद्र जिस भाव के स्वामी होते हैं, उस भाव से संबंधित वस्तुओं की हानि होती है।

3. यदि चंद्रमा राहु की युति हो तो जातक बहुत सी स्त्रियों के सेवन का इच्छुक रहता है। वृद्धा स्त्री और वैश्य से भी संभोग करने में नहीं हिचकिचाता है। ऐसा व्यक्ति चरित्रहीन, दुष्ट स्वभाव का, पुरुषार्थहीन, धनहीन व पराजित होता है।

4. यदि चंद्र-केतु की युति हो तो जातक आचार-विचार से हीन, कुटिल, चालाक, प्रतापी, बहादुर, माता से शत्रुता रखने वाला व रोगी होता है। ऐसा जातक चमड़ा या धातु से संबंधित कार्य करता है।

5. जिनकी जन्म कुंडली में सूर्य, चंद्र, राहु एक ही राशि में बैठे हों वह पराधीन रहने वाला, काम-वासना से युक्त, धनहीन व मूर्ख होता हैं

6. सूर्य, चंद्र, केतु की युति हो तो वह पुरुष निम्न दर्जे का इंजीनियर या मैकेनिक होता है, लज्जाहीन, पाप कर्मों में रत, दयाहीन, बहादुर व कार्यकुशल होता है। ग्रहण योग व कालसर्प दोष का अशुभ फल राहु या केतु की दशा या अंतर्दशा में प्राप्त होता है अथवा राहु-केतु से संबंधित ग्रह की दशा या अंतर्दशा में प्राप्त होता है अथवा गोचरीय राहु-केतु जिस समय जन्मस्थ राहु-केतु की राशि में संचार करते हैं, उस समय कालसर्प व ग्रहण योग का फल प्राप्त होता है। इन अशुभ योगों की शांति में महामृत्युंजय मंत्र का जाप एवं श्री रुद्राभिषेक कारगर है।

ग्रहणयोग कालसर्प दोष को भयानक बनाता है :

1. यदि जन्मकुंडली में कालसर्प दोष है तथा राहु-केतु की अधिष्ठित राशियों में सूर्य चंद्र भी बैठे हों तो इस ग्रहण योग की स्थिति में कालसर्प दोष और भी भयानक अर्थात् अनिष्टप्रद हो जाता है।

2. कालसर्प दोष तभी मान्य होगा जब कुंडली में ग्रहण योग हो। एक ही राशि में चंद्रमा और राहु या केतु 13 अंश से कम अंतर पर बैठे हों। अथवा सूर्य की राहु या केतु से युति 18 अंश से भी कम अंतर पर हो।

3. कालसर्प दोष में यह आवश्यक है कि उस कुंडली में ग्रहणयोग भी हो। कालसर्प योग में राहु-केतु अपने साथ स्थित ग्रहों को एवं उनकी वक्र गति में आने वाले (राहु-केतु से 12 वें स्थान में स्थित) ग्रहों को दूषित कर देते हैं। यह कालसर्प योग/दोष की सीमा है।

4. यदि किसी जन्मकुंडली में आंशिक कालसर्प योग हो किंतु पूर्ण ग्रहण योग हो तो राजयोग प्रदायक सूर्य या चंद्र के दूषित होने के कारण कालसर्प योग अशुभ फल देता है।

5. यदि राहु-केतु केंद्र स्थान में हो तथा ग्रहण योग हो और कालसर्प भी हो तो कालसर्प दोष सर्वाधिक अशुभ हो जाता है क्योंकि केंद्रीय भावों में सभी पापग्रहों के होने से प्राचीन सर्पयोग होता है। सर्पयोग में उत्पन्न जातक दुखी, दरिद्री, परस्त्रीगामी, कामी, क्रोधी व अदूरदर्शी होता है।

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अपने बच्चों को दी जाने वाली 12 सबसे बेहतरीन विरासतें..

1. बुद्धिमत्ता ……
बुद्धिमत्ता स्कूलों में नहीं सिखाई जाती, यह जीवन के अनुभवों से प्राप्त होती है। माता-पिता ही सबसे अच्छे शिक्षक होते हैं। अपने बच्चों को मार्गदर्शन दें, अपने अनुभव साझा करें ताकि वे गलतियों से सीखने की बजाय समझदारी से आगे बढ़ें।

2. सामाजिक कौशल …..
जीवन रिश्तों का खेल है। बच्चों को आत्म-संयम, भाईचारे, विपरीत लिंग से व्यवहार, सही संगति चुनना, मित्रता बनाना और निभाना, संवाद करना आदि सिखाएं। ये कौशल उन्हें जीवनभर काम आएंगे।

3. परिवार के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण..
अगर आप अपने बच्चों के मन में शादी या परिवार के प्रति नकारात्मक सोच भरते हैं, तो उनका भविष्य प्रभावित हो सकता है। चाहे आप एक जोड़ा हों या अकेले माता-पिता, बच्चों को परिवार के महत्व की समझ दें।

4. अच्छी यादें …..
बचपन की यादें या तो जीवन को संबल देती हैं या कष्ट देती हैं। अपने बच्चों को ऐसा बचपन दें जिसे याद करके उन्हें खुशी मिले। उन्हें यह अनुभव कराएं कि इस दुनिया में अच्छे लोग हैं — जैसे उनके माता-पिता।

5. मानसिक स्वास्थ्य…….
बच्चों को भावनात्मक चोट, गाली, उपेक्षा, तुलना और तिरस्कार से दूर रखें। उन्हें प्यार, सम्मान और सुरक्षा दें ताकि वे मानसिक रूप से स्वस्थ बड़े हों।

6. अच्छा नाम …….
ऐसी प्रतिष्ठा बनाएं जिस पर आपके बच्चे गर्व करें। वे गर्व से आपका नाम लें और अगली पीढ़ी को भी उसी नाम से जोड़ें।

7. पहचान …….
बच्चों को उनके वंश, पूर्वजों और पारिवारिक इतिहास के बारे में बताएं। उन्हें यह समझ दें कि वे किस परंपरा और विरासत से जुड़े हैं।

8. आर्थिक संपत्ति ….…
बच्चों को जीवन में आगे बढ़ने के लिए धन की आवश्यकता होगी। उन्हें संपत्ति, धन, शेयर या पारिवारिक व्यवसाय दें, साथ ही उन्हें धन प्रबंधन भी सिखाएं।

9. आस्था की विरासत ……
बच्चों को ईश्वर के बारे में बताएं, उनके साथ प्रार्थना करें ताकि वे जीवन के कठिन समय में आत्मिक संबल पा सकें। उन्हें यह भी समझाएं कि माता-पिता सीमित हैं लेकिन ईश्वर असीम हैं।

10. आत्मविश्वास …….
बच्चों में आत्म-विश्वास भरें, उन्हें उनके उद्देश्य और सामर्थ्य का बोध कराएं। उन्हें सिखाएं कि वे विपरीत परिस्थितियों में भी डटकर खड़े रहें।

11. मूल्य और परंपराएं…..
बच्चों को सच्चाई, मेहनत, ईमानदारी, पारिवारिक एकता जैसे मूल्यों और परंपराओं की शिक्षा दें ताकि वे इन्हें जीवनभर अपनाएं और आगे बढ़ाएं।

12. सहारा और नेटवर्क ..….
बच्चों को ऐसे मार्गदर्शक, अध्यात्मिक गुरु, शिक्षकों, पुस्तकों, समुदायों और क्लबों से परिचित कराएं जो उनके जीवन को समृद्ध करें। कुछ आशीर्वाद ऐसे लोगों से मिलते हैं जो हम नहीं होते।

याद रखें: हम सभी अपने पूर्वजों की विरासत हैं। अगर हम अच्छे इंसान हैं तो हमारे माता-पिता ने अच्छे बीज बोए होंगे। अब हमारी बारी है कि हम अगली पीढ़ी को सशक्त बनाएं।

तुलसी के बीज का चमत्कार
तुलसी के बीज पीसकर रखो । एक चुटकी बीज रात को भिगा दो । सुबह खा लो । इससे ….
पेट की तकलीफ़ भागेगी|
यादशक्ति बढेगी ।
बुढ़ापे की कमजोरी से बचोगे ।
heart attack नहीं होगा ।
High Blood Pressure भी नहीं होगा ।
वास्तु शास्त्र
यदि घर में लक्ष्मीजी की फोटो लगानी हो तो ऐसी फोटो लगाए, जिसमें वे बैठी हुई हों। जिस फोटो में लक्ष्मीजी खड़ी हुई दिखाई देती हैं, वह फोटो घर में लगाने से बचना चाहिए।

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भूख नहीं लगती हो तो
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Author: sssrknews

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