तब… 2015 की उस काली रात में, जब घड़ी ने 2:30 बजाए थे, सुप्रीम कोर्ट के भारी-भरकम दरवाज़े अचानक खुल गए।
लाइटें जलीं… जज साहब रात के अंधेरे में रोब पहनकर आए…
सिर्फ इसलिए कि एक आतंकी – याकूब मेमन – को फांसी से पहले आख़िरी कानूनी मौका मिल जाए।
257 मासूमों का खून अभी सूखा भी नहीं था…
फिर भी देश की सबसे बड़ी अदालत रात भर जागी, उसकी दया-याचिका सुनने के लिए।
और अब…
2025 एक नई सुबह लेकर आया है।
जब जस्टिस सूर्य कांत खड़े होकर कहते हैं —
???? “मैं गरीब के लिए आधी रात को भी कोर्ट में बैठ सकता हूँ।”
तो दिल सच में कह उठता है —
तब दरवाज़े एक आतंकी के लिए खुले थे…
आज दरवाज़े एक गरीब के लिए खुलने को बेताब हैं।
तब रातें जागी थीं एक दोषी की जान बचाने के लिए…
अब रातें जागेंगी उन लोगों की उम्मीद बचाने के लिए,
जिनकी कोई आवाज़ ही नहीं।
तब न्यायपालिका ने दिखाया था कि कानून सबसे ऊपर है,
आज न्यायपालिका दिखा रही है कि इंसानियत सबसे ऊपर है।
तब कोर्ट खुला था एक गुनहगार के लिए…
अब कोर्ट खुलने को तैयार है लाखों मासूमों के लिए।
ये सिर्फ एक जज की बात नहीं…
ये पूरी व्यवस्था के दिल बदलने की निशानी है।
जब जज साहब कहते हैं —
???? “गरीब का केस हो तो मुझे 3 बजे रात को भी बुला लो।”
तो सच में लगता है —
न्याय अब सिर्फ अंधा नहीं रहा…
वो अब रो भी सकता है, और गरीब के आँसू देखकर रात भर जाग भी सकता है।
सलाम है जस्टिस सूर्य कांत साहब को!
आपने वो कर दिखाया जो सालों से सिर्फ सपना था —
न्याय को आतंकियों से छीनकर, गरीब के हाथों में सौंप दिया।
अब सच में कह सकते हैं —
???????? “देश बदल रहा है… क्योंकि अब न्याय, गरीब का हो रहा है।” ❤️⚖️






