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पंचकूला शिव कथा के पांचवें दिन उठा सवाल—‘गाय को माता क्यों कहते हैं?’ स्वामी डॉ. सर्वेश्वर जी ने परंपरा, विज्ञान और संस्कृति के संदर्भ में समझाया महत्व; शिव-पार्वती विवाहोत्सव में झूम उठा सेक्टर-16
पंचकूला | 27 सितंबर 2026, रविवार | अग्रवाल भवन, सेक्टर-16
पंचकूला के सेक्टर-16 स्थित अग्रवाल भवन में चल रही सात दिवसीय “भगवान शिव कथा—सामाजिक एवं आध्यात्मिक जागृति की सूत्रधार” के पांचवें दिन धर्म, आध्यात्मिकता, संस्कृति और समकालीन जीवन से जुड़े विषयों पर विस्तृत चिंतन हुआ। रविवार होने के कारण कथा में श्रद्धालुओं की बड़ी उपस्थिति रही और पंचकूला सहित आसपास के क्षेत्रों से लोग सपरिवार कथा श्रवण के लिए पहुंचे।
23 से 29 सितंबर 2026 तक आयोजित इस कथा का समय प्रतिदिन सायं 6:30 बजे से रात्रि 9:30 बजे तक निर्धारित है। कथा का शुभारंभ पूजन से तथा समापन मंगल आरती के साथ होता है।
पांचवें दिन का प्रमुख विषय रहा—“गाय को माता क्यों कहते हैं—अंधविश्वास या विशुद्ध विज्ञान?” इसके साथ ही शिव श्रृंगार, भगवान शिव की बारात, शिव-पार्वती विवाह, डिजिटल युग में रिश्तों की बदलती तस्वीर और मानव जीवन के महत्व जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।
गाय को माता क्यों कहते हैं? स्वामी डॉ. सर्वेश्वर जी ने बताए पांच प्रमुख आधार
व्यास पीठ पर विराजमान स्वामी डॉ. सर्वेश्वर जी, जो दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य हैं, ने कथा के दौरान गाय के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझाया।
स्वामी जी ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय परंपरा में गाय को केवल दूध देने वाले पशु के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसके साथ मातृत्व और सेवा की भावना को जोड़ा गया है।
उन्होंने इस विषय को पांच प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से समझाया।
1. गोबर और गोमूत्र से जुड़े पारंपरिक एवं वैज्ञानिक दावे
स्वामी जी ने गाय के गोबर और गोमूत्र के पारंपरिक उपयोगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ग्रामीण जीवन में इनका उपयोग लंबे समय से कृषि, ईंधन और अन्य घरेलू कार्यों में होता रहा है।
कथा के दौरान विकिरण, हवन और वातावरण से जुड़े कुछ वैज्ञानिक दावों का भी उल्लेख किया गया। इन दावों को लेकर स्वामी जी ने भारतीय परंपराओं में यज्ञ और गौ-उत्पादों के उपयोग का संदर्भ प्रस्तुत किया।
2. कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गाय का योगदान
स्वामी जी ने कहा कि पारंपरिक भारतीय कृषि व्यवस्था में बैल और पशुधन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। खेतों में पशु-शक्ति के उपयोग से लेकर गोबर आधारित खाद तक, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गौवंश का योगदान लंबे समय से रहा है।
उन्होंने कहा कि इस दृष्टि से गाय को केवल एक पशु के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और कृषि व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में समझना चाहिए।
3. पंचगव्य और आयुर्वेदिक परंपरा
कथा में पंचगव्य का भी उल्लेख हुआ। स्वामी जी ने बताया कि भारतीय परंपरा और आयुर्वेद में दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र से जुड़े प्रयोगों का उल्लेख मिलता है।
उन्होंने पंचगव्य को भारतीय पारंपरिक ज्ञान का हिस्सा बताते हुए इसके धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला।
4. मातृत्व और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक
गाय को माता कहने के भावनात्मक पक्ष को समझाते हुए स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय को मातृत्व, सेवा और पोषण के प्रतीक के रूप में देखा गया है।
उन्होंने कहा कि इसी भाव के कारण भारतीय समाज में गाय के प्रति केवल उपयोगिता नहीं, बल्कि श्रद्धा और संरक्षण की भावना भी विकसित हुई।
5. ‘33 कोटि’ की व्याख्या पर चर्चा
कथा के दौरान ‘33 कोटि देवी-देवताओं’ से जुड़ी प्रचलित धारणा पर भी चर्चा हुई। स्वामी जी ने ‘कोटि’ शब्द की एक अलग व्याख्या प्रस्तुत करते हुए इसे 33 प्रकार या श्रेणियों से जोड़कर समझाया।
उन्होंने श्रद्धालुओं से भारतीय ग्रंथों और परंपराओं को केवल मान्यता के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके संदर्भ और अर्थ को समझने का भी आह्वान किया।
शिव श्रृंगार में छिपा जीवन का संदेश
पांचवें दिन भगवान शिव के श्रृंगार से जुड़े प्रतीकों की भी व्याख्या की गई।
स्वामी जी ने बताया कि भगवान शिव के स्वरूप में दिखाई देने वाले चंद्रमा, नाग और भस्म को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में विभिन्न प्रतीकों से जोड़ा जाता है।
चंद्रमा को शीतलता और मन के संतुलन का प्रतीक, नाग को समय और नियंत्रण के प्रतीक तथा भस्म को वैराग्य और जीवन की नश्वरता के संदेश से जोड़कर समझाया गया।
कथा के दौरान श्रद्धालुओं को संदेश दिया गया कि शिव का स्वरूप बाहरी आडंबर के बजाय आंतरिक शांति, संयम और आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है।
शिव बारात का प्रसंग—सभी को साथ लेकर चलने का संदेश
भगवान शिव की बारात के प्रसंग ने भी श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया। कथा में शिव बारात में विभिन्न प्रकार के गणों और पात्रों का वर्णन करते हुए इसे सामाजिक समावेशिता के प्रतीक के रूप में समझाया गया।
स्वामी जी ने कहा कि शिव का चरित्र समाज के अलग-अलग वर्गों को स्वीकार करने और किसी के प्रति भेदभाव न करने का संदेश देता है।
उन्होंने कहा कि आज के समाज में भी एक-दूसरे के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता की भावना को मजबूत करने की आवश्यकता है।
शिव-पार्वती विवाहोत्सव ने बांधा समां
पांचवें दिन कथा का सबसे भावनात्मक और भक्तिमय प्रसंग शिव-पार्वती विवाहोत्सव रहा।
विवाह प्रसंग के दौरान अग्रवाल भवन का वातावरण भक्तिमय हो गया। DJJS की साध्वियों द्वारा प्रस्तुत मंगल गीतों और भजनों के बीच श्रद्धालु भक्ति में झूमते नजर आए।
महिलाओं और परिवारों ने विवाहोत्सव के प्रसंग को उत्साहपूर्वक मनाया। कथा में शिव-पार्वती के दांपत्य जीवन को पारिवारिक समर्पण, विश्वास और आध्यात्मिक साझेदारी के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
डिजिटल रिश्तों के दौर में परिवार को लेकर महत्वपूर्ण संदेश
पांचवें दिन कथा में आधुनिक डिजिटल जीवन और पारिवारिक रिश्तों पर भी विशेष चर्चा हुई।
स्वामी जी ने सोशल मीडिया और मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल का उल्लेख करते हुए कहा कि आज व्यक्ति डिजिटल माध्यमों पर बड़ी संख्या में लोगों से जुड़ा है, लेकिन कई बार अपने ही परिवार के सदस्यों के साथ संवाद का समय कम हो जाता है।
उन्होंने युवाओं और परिवारों से आग्रह किया कि तकनीक का उपयोग आवश्यक है, लेकिन उसे पारिवारिक संवाद और वास्तविक रिश्तों का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए।
कथा में यह संदेश दिया गया कि रिश्ते केवल डिजिटल कनेक्शन से नहीं, बल्कि समय, संवाद, विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव से मजबूत होते हैं।
मानव जीवन के महत्व पर भी हुआ मंथन
कथा के दौरान मानव जीवन की दुर्लभता और आध्यात्मिक महत्व पर भी चर्चा हुई। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मानव जन्म को आत्मचिंतन और ईश्वर की अनुभूति के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
स्वामी जी ने श्रद्धालुओं को ध्यान, आत्मचिंतन और सकारात्मक जीवन मूल्यों की ओर प्रेरित करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने जीवन का उपयोग केवल भौतिक उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक विकास और समाजहित के लिए भी करना चाहिए।
श्रद्धालुओं में दिखा उत्साह
रविवार होने के कारण कथा में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या देखने को मिली। पंचकूला के अलावा चंडीगढ़, मोहाली, जीरकपुर और आसपास के क्षेत्रों से भी लोग कथा श्रवण के लिए पहुंचे।
कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भजनों, आध्यात्मिक संदेशों और शिव-पार्वती विवाहोत्सव में उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
आयोजकों के अनुसार, इस सात दिवसीय आयोजन का उद्देश्य केवल धार्मिक कथा का श्रवण कराना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना, पारिवारिक संस्कार, सामाजिक समरसता और सकारात्मक जीवन मूल्यों को समाज तक पहुंचाना है।
28 सितंबर को ‘राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका’ पर चर्चा
कथा के छठे दिन यानी 28 सितंबर, सोमवार को “राष्ट्र निर्माण में क्या है युवाओं की भूमिका?” विषय पर विशेष चर्चा प्रस्तावित है।
इसके अंतर्गत गंगा अवतरण, श्री कार्तिकेय चरित्र और तारकासुर वध जैसे प्रसंगों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, युवाओं की भूमिका, नशामुक्ति और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर संदेश दिया जाएगा।
आयोजकों ने श्रद्धालुओं से सपरिवार कथा स्थल पर पहुंचकर आध्यात्मिक एवं सामाजिक संदेशों का लाभ लेने की अपील की है।
आयोजन की पूरी जानकारी
📍 स्थान: अग्रवाल भवन, सेक्टर-16, पंचकूला
📅 तिथि: 23 से 29 सितंबर 2026
⏰ समय: सायं 6:30 बजे से रात्रि 9:30 बजे तक
🎙️ व्यास पीठ: स्वामी डॉ. सर्वेश्वर जी
🙏 गुरु: दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी
📌 आयोजन: सात दिवसीय भगवान शिव कथा—सामाजिक एवं आध्यात्मिक जागृति की सूत्रधार
रिपोर्टर: राजीव कुमार श्रीवास्तव — 8449777680
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