NASA-ISRO का निसार मिशन: जानिए क्यों है यह ऐतिहासिक, कैसे करेगा काम और क्या होगा असर
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका की अंतरिक्ष साझेदारी आज एक ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंच रही है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (NASA) के संयुक्त प्रयास से विकसित NISAR (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) सैटेलाइट को आज शाम 5:40 बजे आंध्र प्रदेश के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया जाएगा। इस सैटेलाइट को GSLV Mk-II रॉकेट के जरिए पृथ्वी से 747 किलोमीटर ऊंची सूर्य-समकालिक कक्षा (Sun-Synchronous Orbit) में स्थापित किया जाएगा।
क्या है निसार सैटेलाइट?
निसार एक अत्याधुनिक पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट है, जिसका कुल वजन 2,392 किलोग्राम है। यह दुनिया का पहला सैटेलाइट है जो दो अलग-अलग फ्रीक्वेंसी—NASA का L-बैंड और ISRO का S-बैंड—का एक साथ इस्तेमाल करेगा। यह सैटेलाइट धरती की सतह पर हो रहे बदलावों को बेहद उच्च सटीकता से माप सकेगा।
इस परियोजना की लागत लगभग 1.5 बिलियन डॉलर (करीब ₹12,500 करोड़) है, जिससे यह इसे दुनिया के सबसे महंगे पृथ्वी निरीक्षण मिशनों में से एक बनाता है। इसे विकसित करने में करीब 10 साल का समय लगा है।
सैटेलाइट में एक 12 मीटर का गोल्ड मेश रडार एंटीना है, जो निम्न पृथ्वी कक्षा में सबसे बड़ा है। यह ISRO के I-3K सैटेलाइट बस पर आधारित है, जिसमें कमांड, डेटा हैंडलिंग, प्रणोदन प्रणाली, और 4 किलोवाट तक की सौर ऊर्जा व्यवस्था शामिल है।
निसार कैसे करेगा काम?
लॉन्च के बाद, निसार को सूर्य-समकालिक कक्षा में 747 किमी की ऊंचाई पर 98.4° के झुकाव पर स्थापित किया जाएगा। हालांकि, लॉन्च के तुरंत बाद यह काम शुरू नहीं करेगा—पहले 90 दिन इसे कमीशनिंग और इन-ऑर्बिट टेस्टिंग में बिताने होंगे।
NISAR का मुख्य उपकरण “Synthetic Aperture Radar (SAR)” है, जो धरती की सतह पर रडार सिग्नल भेजता है और उनकी वापसी से सतह की बनावट और हलचलों को मापता है।
यह दो बैंड्स पर काम करेगा:
- L-बैंड SAR (1.257 GHz): लंबी तरंगें, जो घने जंगलों, बर्फ और मिट्टी के भीतर की गतिविधियों को पहचान सकती हैं।
- S-बैंड SAR (3.2 GHz): छोटी तरंगें, जो सतह की बारीकियों, जैसे फसलों, पानी की परत और वनस्पति पर फोकस करती हैं।
यह मिशन पहली बार SweepSAR तकनीक का उपयोग करेगा, जिससे यह 242 किमी की चौड़ाई में उच्च-रिजॉल्यूशन डेटा इकट्ठा कर सकेगा। निसार हर 12 दिन में पूरी पृथ्वी को स्कैन करेगा—वो भी दिन-रात, हर मौसम में, चाहे बादल हों या अंधेरा।
क्यों खास है निसार मिशन?
निसार, भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग का सबसे बड़ा और सबसे महत्वाकांक्षी मिशन है। यह मिशन निम्नलिखित क्षेत्रों में क्रांति लाएगा:
- पर्यावरण और इकोसिस्टम की निगरानी
- ग्लेशियर और बर्फ की चादरों में बदलाव का अध्ययन
- वनों और वनस्पति की निगरानी
- समुद्र स्तर में वृद्धि और भूजल स्तर की जांच
- प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, भूस्खलन और सुनामी पर नजर
इसके दोहरे रडार और SweepSAR तकनीक की मदद से यह बादलों, धुएं या जंगलों के बावजूद हर मौसम में काम कर सकेगा। इसका डेटा वैज्ञानिकों, किसानों, और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को मुफ्त में उपलब्ध कराया जाएगा, खासकर आपातकालीन परिस्थितियों में कुछ ही घंटों में।
निसार का प्रभाव क्या होगा?
- भूकंप संभावित क्षेत्रों जैसे हिमालय में भूमि की हलचल को पहचानना और जोखिम आकलन करना
- ज्वालामुखियों की गतिविधि को ट्रैक करना
- बुनियादी ढांचे और बांधों की निगरानी
- किसानों को फसल की स्थिति और मिट्टी की नमी संबंधी जानकारी देना
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ट्रैक कर नीतिगत निर्णयों में मदद देना
निष्कर्ष:
NISAR मिशन न केवल भारत और अमेरिका के अंतरिक्ष सहयोग का प्रतीक है, बल्कि यह जलवायु, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में पूरी दुनिया के लिए एक नई दिशा तय करेगा। इसकी मदद से हम अपनी धरती के बदलते स्वरूप को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे और भविष्य की चुनौतियों के लिए बेहतर तैयारी कर सकेंगे।



