गोल्डा मेयर — वो 75 साल की दादी, जिसने आतंकवाद को चुनौती दी
75 साल की एक बुज़ुर्ग महिला थी — गोल्डा मेयर, इज़रायल की प्रधानमंत्री।
उसने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि अगर इज़रायल के नागरिकों पर हमला किया तो उसका अंजाम क्या होगा।
5 सितंबर 1972 — जर्मनी में चल रहे ओलंपिक खेलों के दौरान
फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) के आतंकियों ने
इज़रायल के 11 खिलाड़ियों की निर्मम हत्या कर दी।
पूरा देश ग़ुस्से और दुख में डूब गया।
लेकिन उस वक्त इज़रायल की “दादी माँ” कहलाने वाली गोल्डा मेयर ने
ना आंसू बहाए, ना शोर मचाया।
उसने ऐसा फैसला लिया कि पूरी दुनिया के आतंकवादियों की रूह कांप गई।
मेयर के आदेश पर इज़रायली सेना ने
सिर्फ 48 घंटे के भीतर
सीरिया और लेबनान में घुसकर
फिलिस्तीनी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की —
10 कैंप तबाह, और करीब 200 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…
200 मौतों के बाद भी गोल्डा मेयर के दिल में
अपने खिलाड़ियों का बदला बाकी था।
उसने शुरू किया इतिहास का सबसे खतरनाक मिशन —
???? “ऑपरेशन Wrath of God” (ईश्वर का क्रोध)
इस मिशन की जिम्मेदारी सौंपी गई
दुनिया की सबसे गुप्त और घातक एजेंसी — मोसाद को।
अगले 7 सालों तक, मोसाद ने एक-एक कर
उन सभी 35 आतंकियों को ढूंढ निकाला
जो ओलंपिक हत्याकांड से जुड़े थे —
और सबको खत्म कर दिया।
मोसाद हर बार टारगेट को मारने से पहले
एक फूलों का बुके भेजती थी,
जिसमें लिखा होता था —
“हम न तो भूलते हैं,
और न ही माफ करते हैं।”
उसके बाद आतंकवादी के शरीर में
ठीक 11 गोलियाँ दागी जाती थीं —
इज़रायल के 11 शहीद खिलाड़ियों की याद में।
और यही मिशन — “Wrath of God” —
लगातार 20 साल तक चलता रहा।
मोसाद दुनिया के कोने-कोने में
फिलिस्तीनी आतंकियों को ढूंढकर खत्म करती रही।
एक 75 साल की महिला ने दुनिया को दिखाया —
कमज़ोरी उम्र से नहीं, हिम्मत की कमी से आती है।
और इज़रायल ने साबित किया —
“हमारे नागरिकों को मारना आसान नहीं,
लेकिन उसका अंजाम बहुत भारी है।” ????????






