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पुरानी रजाई की गर्माहट

सुबह की ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी।
अनिका रसोई में चाय बना रही थी, तभी उसकी 10 साल की बेटी सान्या स्कूल जाने की तैयारी करते हुए बोली –
“मम्मी, मेरी स्कूल की स्वेटर नहीं मिल रही!”

अनिका ने झटपट गैस बंद किया, और बोली –
“देखो तो, अलमारी में नीली रजाई के नीचे रखी होगी।”

सान्या कमरे में गई, और रजाई उठाते ही बोली –
“अरे मम्मी, ये तो बहुत पुरानी रजाई है! इसमें तो धागे निकल रहे हैं।”
अनिका मुस्कुराई,
“हाँ बेटा, ये तुम्हारे दादा जी की है, उन्होंने अपने हाथों से सिलवाई थी। अब तो बस याद के तौर पर रखी है।”

सान्या ने अनमने ढंग से कहा –
“पुरानी चीजें रखकर क्या करेंगे, मम्मी? कबाड़े में दे दो न!”
इतना सुनते ही पास बैठे दादाजी ने धीमी मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा।
“बेटा, कभी-कभी पुरानी चीजों में बीते हुए अपने लोग बस जाते हैं। फेंक दोगी, तो यादें कहाँ रहेंगी?”

सान्या ने भोलेपन से पूछा,
“क्या दादा जी, रजाई में भी यादें रहती हैं?”
“हाँ बेटा,” दादाजी ने कहा,
“इस रजाई में तुम्हारे पापा के बचपन की हंसी, तुम्हारी दादी की सिलाई, और मेरे बीते सर्दियों की गर्माहट है।”

सान्या कुछ पल चुप रही, फिर बोली –
“तो फिर इसे फेंकेंगे नहीं!”

शाम को जब रवि (सान्या के पापा) ऑफिस से लौटे, तो देखा –
अनिका माँ-पापा के कमरे की सफाई कर रही थी।
पुराने अख़बार, टूटे हुए बर्तन, और कुछ पुराने कपड़े इकट्ठे करके बोली –
“माँ जी, अब ये सब पुराना सामान हटा देना चाहिए, घर में जगह ही नहीं बचती।”

माँ ने हँसते हुए कहा,
“बेटी, पुराना सामान नहीं, ये तो हमारी ज़िंदगी का हिस्सा है।”
अनिका थोड़ी खीझ गई –
“माँ जी, हर चीज़ के लिए भावनाएँ नहीं जोड़ते। अब ज़माना बदल गया है।”

दादाजी दरवाजे से सब सुन रहे थे।
कुछ बोले नहीं, बस धीरे से अपनी छड़ी संभालते हुए बालकनी में चले गए।

-अगले दिन रविवार था। बाहर तेज ठंड थी।
अनिका रज़ाई ओढ़े मोबाइल चला रही थी और रवि अख़बार पढ़ रहे थे।
दादाजी अपने कमरे में चुपचाप बैठे थे।
सान्या वहाँ गई और बोली –
“दादा जी, आपको ठंड लग रही है क्या?”
“थोड़ी सी, बेटा। लेकिन कोई बात नहीं, आदत है।”
सान्या भागी-भागी रसोई में गई, और बोली –
“मम्मी, दादा जी को बहुत ठंड लग रही है। उनके कमरे में हीटर रख दो ना!”

अनिका ने कहा –
“वो हीटर तो खराब है। वैसे भी वो तो कम्बल ओढ़े हैं ना, उन्हें आदत है पुरानी रजाई की।”

सान्या कुछ देर चुप रही, फिर चुपके से अपनी नई गुलाबी रजाई लेकर दादाजी के कमरे में रख आई।
“दादा जी, ये मेरी रजाई है। इसमें कार्टून बने हैं, बहुत गर्म रहती है। आप इसे ओढ़ लो।”

दादाजी की आँखें भर आईं –
“बेटा, मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूँ, लेकिन तूने दिल से जो दिया, वो सबसे गर्म है।”

-शाम को रवि ने देखा –
दादाजी की रजाई अब सान्या के बिस्तर पर पड़ी थी।
“सान्या, ये पुरानी रजाई तूने क्यों रख ली?”
“पापा, दादाजी की यादें इसमें हैं ना। वो बोलते हैं इसमें प्यार है, तो मैं भी ओढ़ूंगी।”

रवि कुछ सोचने लगा,
फिर बोला –
“बिलकुल सही कहा तूने बेटा। कभी-कभी पुराने लोग और पुरानी चीजें ही घर को घर बनाती हैं।”

-कुछ दिन बाद दादाजी की तबीयत थोड़ी बिगड़ गई।
डॉक्टर ने आराम करने की सलाह दी।
उस दिन अनिका उनके कमरे में खाना लेकर गई —
गरम सूप, सब्ज़ी, और ताज़ा रोटी।
दादाजी मुस्कुराए –
“लगता है अब मेरा नंबर भी सुधर गया है।”
अनिका हँस पड़ी,
“अब कोई पुराना खाना नहीं मिलेगा, पापा जी। अब सब ताज़ा और गरम।”

दादाजी की आँखें भर आईं –
“अनिका बेटी, तुम्हारे हाथों का ये सूप दवा से भी ज़्यादा काम करेगा।”

-रात को सान्या ने दादा जी से कहा –
“जब मैं बड़ी हो जाऊँगी ना, तो आपके जैसी पुरानी रजाई बनवाऊँगी। उसमें आपकी तस्वीर और हमारे सबके नाम होंगे।”

दादा जी ने उसका सिर सहलाया –
“और जब मैं नहीं रहूँगा, तब भी उसे ओढ़ लेना, क्योंकि उसमें मेरा प्यार रहेगा।”

-कुछ महीनों बाद दादाजी चल बसे।
घर में सबकी आँखें नम थीं।
सान्या चुपचाप जाकर वही पुरानी रजाई अपने सीने से लगाकर बैठ गई।

उसने धीमे से कहा –
“दादा जी, अब आपकी रजाई हमेशा मेरे पास रहेगी। इसमें आपकी खुशबू है।”

रवि और अनिका के आँसू रुक नहीं पाए।
उन्हें एहसास हुआ कि
जिसे वे पुराना सामान समझते थे,
वो किसी की भावनाओं का ख़ज़ाना था।

:- संदेश:
जो पुराना दिखता है, वो हमेशा बेकार नहीं होता।
कभी-कभी वही पुराने रिश्ते, पुरानी बातें, और पुरानी यादें
घर की असली गर्माहट होती हैं। ❤️
कहानी कैसी लगी अपने अनमोल विचार कमेंट में जरुर व्यक्त करें….

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Author: sssrknews

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