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मैथिली ठाकुर की जीत के पीछे क्या था असली खेल?

एक दोस्त का फोन आया. वो दरभंगा से करीब ढाई हज़ार किलोमीटर दूर थे. उन्होंने कहा लिख कर ले लो अलीनगर से मैथिली ठाकुर कम से कम 30 हज़ार वोट से हारेगी.

अलीनगर में पप्पू सिंह का टिकट काटकर बीजेपी ने मैथिली ठाकुर को टिकट दिया था. पप्पू सिंह ताकतवर थे. चूंकि मेरे दोस्त उसी इलाके के हैं और उन्होंने बहुत ही आत्मविश्वास के साथ यह बात कही थी इसलिये मैं चुप रह गया. पर मेरा अनुभव उनके दावे के बिल्कुल विपरीत था.

अंजीत अंजुम ने तीन उदाहरण दिये है कि किस तरह बीजेपी चुनाव जीतती है. मैं उसके आगे की बात बता रहा हूं. उन्होंने सिर्फ प्रचार को रेखांकित किया है. मैं वह बात लिख रहा हूं जिसकी चुनावी जीत-हार में प्रचार से ज्यादा बड़ी भूमिका होती है.

पप्पू सिंह मैथिली ठाकुर के खिलाफ नॉमिनेशन की तैयारी कर रहे थे. प्रचार में भी लग गये थे. अगर वो नहीं बैठते तो मैथिली निश्चय ही हार जातीं. उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मंत्री को पप्पू सिंह के घर भेजा गया. पप्पू फील्ड में थे और मिलना नहीं चाहते थे. उस मंत्री ने पप्पू सिंह का 6 घंटे से ज्यादा इंतज़ार किया. जब वो लौट कर आये तो रात हो चुकी थी. उनसे कहा गया कि आपको अमित शाह से मिलने पटना जाना है. रात 2 बजे संघ नेताओं के साथ पप्पू सिंह की दरभंगा में बैठक हुई.

सुबह होते-होते पटना पहुंचे. वहां अमित शाह से 8 बजे के बाद मुलाकात हुई. इसके बाद पटना से निकलकर सीधे पप्पू सिंह मैथिली ठाकुर के नॉमिनेशन में ही प्रकट हुए. उन्हीं कपड़ों में. शाम को पप्पू सिंह के यहां एक सभा बुलाई गई जिसमें उन्होंने मैथिली ठाकुर की उम्मीदवारी को एन्डोर्स किया. नतीजा सामने है.

मैंने मैथिली ठाकुर का उदाहरण इसलिये दिया क्योंकि वह सबसे कम उम्र की, गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि से आती हैं. उनके हारने की संभावना वाकई ज्यादा थी.

अगर गठबंधन ने पप्पू सिंह वाली फॉल्ट लाइन पर काम किया होता मैथिली ठाकुर निश्चय ही हार जाती. क्या गठबंधन के किसी नेता ने पप्पू सिंह तक पहुंचने की कोशिश की?

ज़िदगी में जीत-हार किसी एक कारण से नहीं मिलती. खासतौर से चुनाव में तो बहुत सारे कारणों की भूमिका होती है. मैथिली ठाकुर की जीत के पीछे भी बहुत से कारण हैं लेकिन मेरे मित्रों ने जो कारण पकड़ा वह था-अलीनगर का नाम बदलने वाला बयान.

अगर गठबंधन के नेताओं को चुनाव जीतना है तो उन्हें पैसा खर्च करके बीजेपी की चुनाव मशीनरी का अध्ययन करना/करवाना चाहिए. केवल चुनाव आयोग की आलोचना से बात नहीं बनेगी.

PS – दरभंगा की बात हो रही है तो एक बात और बताता चलूँ……. दरभंगा ग्रामीण सीट पर आरजेडी के ललित यादव अजेय माने जाते थे. तीन बार से लगातार विधायक थे. कुल मिलाकर शायद 7-8 बार विधायक रह चुके हैं.

इस बार जेडीयू के ईश्वर मंडल से बीजेपी ने उन्हें हरवा दिया. जिन्हें लगता है कि गठबंधन की हार के लिये केवल इलेक्शन कमीशन जिम्मेदार हैं उन्हें एक बार ललित यादव से बात करनी चाहिए. अगली बार यादव जी मुमकिन हैं बीजेपी के साथ खड़े नज़र आएंगे.

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Author: sssrknews

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