“दुकान अब विरासत नहीं, मजबूरी है।”
कभी दुकान
बाप की मेहनत की खुशबू होती थी,
लकड़ी की गल्ले में भरोसे की खनक होती थी।
बेटा काउंटर के पीछे नहीं,
भविष्य के भीतर खड़ा होता था।
आज तस्वीर उलटी है।
विरासत तब क्या थी?
हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी चलता था
ग्राहक नाम से पहचाना जाता था
दुकान घर का विस्तार थी
बेटे को “कुछ सीख ले” कहकर बैठाया जाता था
➡️ दुकान स्वाभिमान थी।
मजबूरी आज क्या है?
नौकरी नहीं मिली, तो दुकान
दुकान नहीं चली, तो कर्ज़
कर्ज़ नहीं उतरा, तो तनाव
बेटा दुकान पर बैठा है, पर मन कहीं और
➡️ दुकान अंतिम विकल्प है।
पीढ़ियों का टूटता संवाद
बाप कहता है —
“मेरे पिता ने इसी दुकान से घर खड़ा किया।”
बेटा सोचता है —
“मैं इसी दुकान से निकलना चाहता हूँ।”
यहीं विरासत टूटती है।
नीतियाँ और समय
शिक्षा ने सपने बढ़ाए
अर्थनीति ने ज़मीन खिसकाई
कॉरपोरेट ने ग्राहक छीना
सिस्टम ने छोटे को अकेला छोड़ा
➡️ व्यापार रहा, व्यवसाय की आत्मा गई।
सबसे पीड़ादायक सच
जब अगली पीढ़ी दुकान को आगे नहीं बढ़ाती,
तब दुकान बंद नहीं होती—
एक सामाजिक परंपरा समाप्त होती है।
अंतिम पंक्ति
दुकान तब विरासत होती है
जब वह विकल्पों में चुनी जाए।
जब मजबूरी बन जाए—
तो वह सिर्फ़ ज़िंदा रहने का साधन रह जाती है।






