भोजन के साथ भुजाओं में दम
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एक मित्र के किसी कार्यक्रम में डिनर पर गया था। शानदार भोजन। भव्य तैयारी। बहुत बड़ा लॉन, सुंदर लाइटें।
जहां कार्यक्रम था, वहां बैठने का इंतज़ाम था। लेकिन जहां डिनर की व्यवस्था थी, वहां बैठने की व्यवस्था बिल्कुल नहीं थी। मतलब खाना प्लेट में लीजिए, फिर कार्यक्रम वाले स्थान पर लॉन में जहां गोल मेज और कुर्सियां लगी थीं, वहां जाकर बैठ कर खाइए या फिर वहीं खड़े खड़े खा लीजिए।
आपको याद होगा, संजय सिन्हा ने कुछ साल पहले आपको कहानी सुनाई थी कि कैसे वो अपनी साली की शादी की तैयारी के लिए एक बैंक्वेट हॉल वाले से बात करने गए थे। खाने का मेनू तय होने के बाद बैंक्वेट हॉल के मालिक ने अपनी तरफ से फ्री स्नैक्स, छोटे समोसे और कचौड़ी देने की बात कही थी। उसने कहा था, संजय जी, आपकी साली मेरी भी तो कुछ लगी। इतना तो हम अपनी ओर से कर ही सकते हैं। उसने कर दिया था। इमोशन में मेरी तो आंखें भर आई थीं। दिल्ली के लोग कितने दिलदार हैं। पटना वाले तो जरा नहीं पटते।
खैर, बहुत बाद में समझ आया था कि वो फ्री कितना महंगा था।
उसने चार सौ लोगों के लिए जो प्लेट तय किया था, वो तब हजार रुपए प्रति प्लेट था। उसमें ढेरों व्यंजन तय हुए थे।
लेकिन उसने शादी में आए मेहमानों को इतने स्नैक्स फ्री खिलाए थे कि डिनर टाइम में सारे मेहमानों ने प्लेट तो उठा लिया, जूठा कर दिया, पर खा कुछ नहीं पाए। मतलब संजय सिन्हा के हजार रुपए प्रति प्लेट के हिसाब से चार सौ प्लेट के दाम लग गए, लेकिन माल खर्च हुआ सिर्फ सौ के बराबर का। सबके पेट फुल थे, प्लेट में वो क्या लेते।
ये था बैंक्वेट प्रति प्लेट बिजनेस मॉडल। बाद में मैं बहुत हंसा था उसकी बुद्धिमानी पर, अपनी नादानी पर। सुना था कि फ्री लंच कुछ नहीं होता, पर उसने तो फ्री डिनर पर जो चूना लगाया था, वो काबिल ए तारीफ बात थी। उसने चूना भी क्या लगाया, शानदार बिजनेस मॉडल पेश किया था।
यही मॉडल दांतों पर मलने वाले टूथपेस्ट बनाने वाली कंपनियां अमल में लाईं कि टूथपेस्ट निकलने वाले छेद को थोड़ा बड़ा कर दिया। जितना निकलना है, उससे डबल निकलेगा। बड़े तो फिर भी कंट्रोल कर लेंगे, लेकिन बच्चे। मतलब जो पेस्ट महीना चलता था, पंद्रह दिन में निपट लिया।
खैर, आज कहानी डिनर की।
डिनर पर गया। शानदार भोजन। एक से बढ़ कर एक। शानदार क्रॉकरी। प्लेट मजबूत, भारी, चमकदार। धुली हुई। चम्मच भी सुंदर, चमकीली, भारी स्टील की।
संजय सिन्हा ने प्लेट में खाना लिया, खड़े होकर खाने लगे। पर ये क्या। थोड़ी देर में हाथ दुखने लगे। इतनी भारी प्लेट लेकर कोई कितनी देर खड़ा होकर खा सकेगा। कहीं प्लेट रखने की जगह नहीं। आदमी एक बार में कितना माल ले लेगा। पहले खाएगा, फिर प्लेट भरेगा। लेकिन ये संभव ही नहीं था कि आदमी खड़े खड़े खा ले। तो फिर क्या।
देखा, कार्यक्रम वाली जगह पर गोल मेज लगी है। धीरे धीरे चल कर वहां पहुंचे। प्लेट को टेबल पर रखा। चैन से खाया।
अब क्या। कुछ और लेने का मन हो तो इतनी भारी प्लेट लेकर फिर कौन वहां तक जाए। मैंने देखा, अधिकतर लोग प्लेट टेबल पर छोड़ कर दुबारा भोजन स्थल तक गए। फिर नई प्लेट।
ही ही ही। नई काउंटिंग। मेजबान के सामने कैटरर का बिल आएगा, इतने प्लेट लगे। प्रति प्लेट का भाव तो पहले से तय था ही।
ये है बिजनेस का बुद्धिमानी भरा नया मॉडल। भारी प्लेट, भारी चम्मच। जहां भोजन, वहां बैठने की कुर्सियां नहीं। खड़े होकर गपियाते हुए दोस्तों के साथ कितना खा लेंगे। बैठने का मन करेगा ही करेगा। या तो खाना छोड़ देंगे, या बैठ कर खाने चले जाएंगे। एक बार में भारी प्लेट में कितना भर लेंगे। उम्मीद है आप समझ गए होंगे कि संजय सिन्हा कहना क्या चाह रहे हैं।
यह संसार लोगों को ठगने, मूर्ख बनाने के मॉडल पर चल रहा है। किसी ने हम सबके दिमाग में भर दिया है कि पैसे कमाने वाला बहुत बुद्धिमान होता है। किसी ने हमारे रक्त में डाल दिया है कि पैसा ही भगवान है, (भगवान से कम नहीं है)। किसी ने भर दिया है कि जो तमीज से जेब पर हाथ साफ कर ले, वो अपराधी नहीं, समझदार व्यापारी है।
ये सारे व्हाइट कॉलर लोगों की चालाकियां हैं। आदमी ने कब चालाक होना सीखा। क्यों सीखा?
मैं बहुत सोचता हूं। हैरान भी होता हूं। आदमी को कितने दिन इस धरती पर रहना होता है। वो सरल, सहज क्यों नहीं जी सकता।
मुझे याद है, पहले हमारे गांव में और छोटे शहरों में, (अब लोग वहां भी चालाक हो चुके हैं) लोग पत्तल पर भोजन परोसते थे। लोग बैठ कर खाते थे। इत्मीनान से, मनुहार के साथ खिलाया जाता था।
अब?
नोट
अगर आपने खड़े होकर एक ही प्लेट में भर पेट खा लिया तो यकीन मानिए, आपकी भुजाओं में बहुत दम है। नहीं तो बड़े बड़े खाऊ लोगों को मैंने देखा है। खाना लिए, टहलते हुए टेबल तक पहुंचे, फिर नई प्लेट।
बेचारे मेजबान की समझ में ही नहीं आएगा कि आए तो लगभग पांच सौ लोग थे।
प्लेट आठ सौ कैसे?
ऐसे।
नोट- फोटो का कहानी से कोई नाता नहीं। कहानी के साथ फोटो स्वीट डिश की तरह है, बस। पुरानी यादों से….
संजय सिन्हा जी की कलम से






