अगर अमित शाह के ही अंदाज़-ए-बयाँ में सुनाएँ तो भैया, अगले दस साल की तैयारी तुम्हारे पास न हो तो तुम अमित शाह के सामने इलेक्शन लड़ने मत जाया करो सिवाय फ्रस्ट्रेशन के कुछ हाथ नहीं लगेगा।
संतोष भारतीय के लेखों से मैंने समझना शुरू किया था कि भाजपा (संघ) अपनी राजनीति चुनावों के आधार पर नहीं बनाती। उनकी राजनीति समय रेखा में चलती है। अमित शाह ने उस समझ को आँखों के सामने फ़िल्म की तरह दिखाया है। वही निर्माता हैं, वही निर्देशक हैं, वही पटकथा लिखते हैं, वही अभिनेता चुनते हैं। वही बॉक्स ऑफिस पर भीड़ जुटाते हैं और सफलता के बाद, प्रधानमंत्री के बगल में खड़े बग़ैर किसी श्रेय की इच्छा जताए चुपचाप मुस्कुराते हैं।
कल्पना कीजिए आप 2013 में यूपी प्रभारी बनकर आए हैं, आपके सरदार केंद्र की चढ़ाई करने की तैयारी में हैं, यूपी सबसे महत्वपूर्ण गढ़ है। इसे फ़तह किए बग़ैर आप लाल क़िले पर भगवा लहराने की सोच भी नहीं सकते। मगर आप यहाँ तीसरे दर्जे की पार्टी हैं। आपका एक बेस वोट ठाकुरों का समाजवादी पार्टी के साथ राजनीति कर रहा है, एक वोट बेस ब्राह्मणों का बहुजन समाज पार्टी के साथ कर रहा है। संगठन में भयंकर गुटबाजी है। बेस्ट केस सिनेरियो में भी आपको कोई पचास से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं है। और जब परिणाम आता है, तो आप 73/80 का परिणाम लेकर आते हैं। सपा और कांग्रेस दोनों अपनी चौखट तक सिमट चुके होते हैं। केंद्रीय राजनीति में यह अमित शाह की डेब्यू इनिंग थी। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
दस करोड़ सदस्यों की पार्टी बनाने का अभियान हो या भाजपा पर लगे ब्राह्मण-बनिया जनता पार्टी का टैग मिटाकर उसे बतौर बैकवर्ड जनता पार्टी स्थापित करना हो। अमित शाह 2014 से ही अगले दशक की राजनीतिक स्थितियों के हिसाब से भाजपा को तैयार कर रहे थे। आज भारत के राजनैतिक परिदृश्य में कोई पार्टी भाजपा से सांगठनिक और वैचारिक धरातल पर लड़ती हुई कहीं दिख भी नहीं रही है।
आज बंगाल की जीत महज़ एक चुनाव जीत नहीं है, यह भाजपा के लिए एक ऐसा जैकपॉट है जो उसे हिंदुत्व 2.0 प्रोजेक्ट के लिए तैयार करेगा।मगर 2016 में बंगाल में भाजपा के पास महज़ 3 सीटें थीं।
अमित शाह ने भाजपा के भविष्य लिए उसे तभी ही मज़बूत गढ़ के तौर पर पहचान लिया था और चैलेंज की तरह लिया था। I-PAC द्वारा कोविड के बीच में मोदी द्वारा इलेक्शन कैंपेन करने पे पूरे बीजेपी कैडर को गिल्ट ट्रैप करने और बंगाल इलेक्शन के हिंसक छापा कल्चर को न समझने की वजह से, भाजपा 3 से 77 सीटों तक पहुँचकर भी भले हारी हुई लग रही थी। लेकिन अमित शाह बंगाल की किलेबंदी को समझ चुके थे। अब उनकी योजना में छापा वोटरों को हटवाना और भयमुक्त चुनाव करवाना था। बस इतना मुकम्मल काम उन्हें जीत की दहलीज़ पर ला खड़ा करने वाला था। और यहीं दोनों काम ने भाजपा की जीत सुनिश्चित कर दी है ल।
भवानीपुर के काउंटिंग सेंटर में बैठी जिद्दी ममता बनर्जी और उनके बदतमीज भतीजे को आज समझ नहीं आ रहा होगा कि बंगाल में ऐसी भगवा बरसात इंद्र ने किसके कहने पर बरसाई है, मगर पूरा बंगाल और समूचा देश जानता है , उस शख़्स का नाम अमित अनिलचंद्र शाह है।






