सिर्फ 16–17 साल की उम्र में ही खुदीराम बोस अनुशीलन समिति से जुड़ गए — यह एक क्रांतिकारी संगठन था, जो अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष चला रहा था। उस समय वे स्कूल में पढ़ रहे थे, लेकिन अंग्रेजी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों ने उनका दिल बदल दिया। उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और पूरी तरह स्वतंत्रता संग्राम के मार्ग पर चल पड़े।
अंग्रेजी हुकूमत ने उन पर मुकदमा चलाया, लेकिन खुदीराम ने अपने कार्य पर जरा भी शर्म महसूस नहीं की। उन्होंने गर्व से स्वीकार किया कि उन्होंने अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई है। 11 अगस्त 1908 को, मात्र 18 वर्ष की आयु में, उन्हें फांसी की सज़ा दी गई।
जब जज ने मौत का फैसला सुनाया, खुदीराम के चेहरे पर डर नहीं, बल्कि मुस्कान थी। जहां जनता की आंखें आंसुओं से भरी थीं, वहीं वह भगवद गीता हाथ में लिए, देश के लिए बलिदान को अपना सौभाग्य मान रहे थे।
उनकी शहादत के बाद बंगाल और बिहार में लोग उनके नाम के गीत गाने लगे। लड़कियों के लिए ‘खुदीराम’ नाम की चूड़ियां और गीत बनाए गए। उनका बलिदान साहस, देशभक्ति और निडरता का प्रतीक बन गया।
खुदीराम बोस सिर्फ इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि हर भारतीय के दिल में आज भी अमर हैं।






