कल्पना कीजिए — आप नौ महीने की गर्भवती हों और उसी दौरान शतरंज जैसे मानसिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण खेल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रही हों। असंभव सा लगता है, है ना? लेकिन ग्रैंडमास्टर हरिका द्रोणावल्ली के लिए यह असंभव भी एक उपलब्धि बन गया।
चेन्नई में हुए 44वें शतरंज ओलंपियाड में हरिका ने न सिर्फ़ बोर्ड पर शानदार प्रदर्शन किया, बल्कि मातृत्व और महत्वाकांक्षा के बीच एक नई मिसाल कायम की। अपने अजन्मे बच्चे और तिरंगे के गर्व को साथ लेकर, उन्होंने भारत को ओलंपियाड इतिहास में पहली बार महिला टीम का पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। ????????????
इस ऐतिहासिक पल के बाद, हरिका ने एक भावुक संदेश साझा किया:
“13 साल की उम्र में भारतीय महिला टीम के लिए खेलना शुरू किया था। 18 साल और नौ ओलंपियाड बाद, हमेशा एक सपना देखा था — टीम के साथ पोडियम पर खड़े होने का। और आज, वह सपना हकीकत बन गया।”
हरिका का सफर प्रेरणादायक है — जहां मातृत्व की चुनौतियों, स्वास्थ्य की सीमाओं और विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धा की मानसिक दृढ़ता के बीच उन्होंने संतुलन बनाए रखा। उन्होंने साबित कर दिया कि एक महिला के लिए ‘माँ बनना’ और ‘महान बनना’ दोनों एक साथ संभव है। ????♟️????
यह जीत सिर्फ़ एक पदक की नहीं, बल्कि उन सीमाओं की है जिन्हें हर दिन तोड़ा जा रहा है। यह उस बदलाव की कहानी है जो कहता है — भारतीय महिलाएं सिर्फ़ खेल की नहीं, पूरे समाज की तस्वीर बदल सकती हैं — चाहे वह शतरंज की बिसात हो या ज़िंदगी का कोई और मोर्चा। ????????





