नीरजा भनोत की गाथा साहस, कर्तव्य और बलिदान की अद्वितीय मिसाल है। मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने न केवल 350 से अधिक यात्रियों की जान बचाई, बल्कि पूरी दुनिया को दिखा दिया कि सच्ची वीरता क्या होती है।
7 सितम्बर 1964 को चंडीगढ़ में जन्मी नीरजा बचपन से ही उड़ान भरने का सपना देखती थीं। इस सपने को उन्होंने पैन एम एयरलाइंस में एयर होस्टेस बनकर पूरा किया। 5 सितम्बर 1986 को कराची एयरपोर्ट पर पैन एम 73 विमान के हाईजैक ने उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा ली।
विमान में सवार 350 से अधिक यात्रियों की ज़िंदगी दांव पर थी। चार आतंकियों ने गनपॉइंट पर विमान को अपने कब्जे में ले लिया। नीरजा को यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा करने का आदेश दिया गया, लेकिन उन्होंने अद्भुत साहस दिखाते हुए अमेरिकी नागरिकों के पासपोर्ट छिपा दिए ताकि आतंकियों के नापाक इरादे न पूरे हो सकें।
पूरे 16 घंटे तक नीरजा ने यात्रियों को हिम्मत दी, उनके लिए भोजन का इंतज़ाम किया और आपातकालीन द्वारों से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया। जैसे ही विमान का ईंधन खत्म हुआ और अंधेरा छा गया, उन्होंने तुरंत दरवाज़े खोल दिए और यात्रियों को भागने में मदद की।
लेकिन नीरजा खुद नहीं भागीं। आखिरी क्षणों में जब उन्होंने बच्चों को सुरक्षित निकालने की कोशिश की, तो आतंकियों ने उन पर गोलियां दाग दीं। नीरजा ने अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन सैकड़ों लोगों को नई ज़िंदगी दी।
उनके इस असाधारण साहस के लिए भारत सरकार ने उन्हें अशोक चक्र, पाकिस्तान ने तमगा-ए-इन्सानियत और अमेरिका ने जस्टिस फॉर क्राइम अवॉर्ड से सम्मानित किया। दुनिया उन्हें “हाइजैक गर्ल” के नाम से याद करती है।
आज जब हम सुविधाओं और अधिकारों की बात करते हैं, हमें नीरजा जैसी महान आत्माओं को याद करना चाहिए, जिन्होंने अपने जीवन से यह सिखाया कि सच्ची वीरता कर्तव्य निभाने और दूसरों की रक्षा करने में है।
नीरजा भनोत का बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का शाश्वत स्रोत है।
उन्हें कोटि-कोटि नमन। ????






