ज़िंदगी में अगर कुछ पाना है तो मेहनत का हाथ थामना पड़ता है, और अगर कुछ बचाना है तो अपना ‘आत्मसम्मान’ बचाना पड़ता है।
मिलिए महाराष्ट्र की इस 65 वर्षीय जांबाज महिला से, जिन्होंने बुढ़ापे को मजबूरी नहीं बल्कि अपनी मज़बूती बना लिया है। जहाँ इस उम्र में लोग दूसरों के सहारे की तलाश करते हैं, वहाँ ये माँ रोज़ाना सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक कराड-उंडाले (Karad-Undale) रूट पर अपना ऑटो चलाती हैं। दिन भर की धूप और थकान के बीच जब वो करीब ₹600 की कमाई करके घर लौटती हैं, तो उस कमाई में जो गर्व और सुकून होता है, वो किसी आलीशान महल में भी नसीब नहीं होता।
आज के दौर में जहाँ लोग छोटी-सी मुश्किल आने पर अपनी किस्मत को कोसने लगते हैं, वहाँ खाकी वर्दी पहने यह महिला हमें याद दिलाती है कि अनुशासन और जज़्बा कभी बूढ़ा नहीं होता। उन्होंने किसी से सहानुभूति बटोरने या हाथ फैलाने के बजाय अपने पसीने से अपना रास्ता बनाना बेहतर समझा। यह कहानी उन तमाम लोगों के लिए एक करारा जवाब है जो काम को छोटा समझते हैं या उम्र के बहाने मेहनत से जी चुराते हैं। हकीकत तो ये है कि अगर मन में कुछ कर गुजरने की ठान ली जाए, तो दुनिया की कोई भी चुनौती आपके स्वाभिमान को नहीं झुका सकती।
“क्या आपको भी लगता है कि असली ‘सुपरहीरो’ वही है जो बिना किसी शिकायत के अपनी ज़िम्मेदारी खुद उठाता है? महाराष्ट्र की इस जांबाज माँ के जज़्बे के लिए कमेंट्स में एक ‘सलाम’ ज़रूर लिखें।”





