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“जिसे पहचानना नामुमकिन था: चंद्रशेखर आज़ाद, इंसान और इंक़लाब”

????एक अंग्रेज अफ़सर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था—
“मैं रेलवे क्रॉसिंग पर तलाशी ले रहा था।
ख़बर थी कि आज़ाद शहर में दाख़िल हो चुका है।
दो थानों की पूरी फ़ोर्स मेरे साथ थी।”

उसी वक़्त एक नौजवान साइकिल से मेरी आँखों के सामने से गुज़रा।
मैंने उसे जाने दिया।

तभी मेरा एक भारतीय सिपाही धीमे स्वर में बोला—
“साहब… ये पंडित जी हैं।
कंधे पर जनेऊ, कसा हुआ शरीर,
और मूँछों में जो ठहराव है—
वो सिर्फ़ आज़ाद का ही हो सकता है।”

मैंने उसकी ओर देखा और कहा—
“मुझे अपनी जान की फ़िक्र नहीं है।
लेकिन इस भीड़ और इस फ़ोर्स में
इतनी औक़ात नहीं
कि ऐसे अकेले बाग़ी को रोका जा सके।”

कानपुर में भूमिगत जीवन के दिनों में
आज़ाद ने एक तंग-सा कमरा किराए पर लिया था।
पहचान थी—एक साधारण छात्र।

आस-पास नौकरीपेशा परिवार रहते थे,
कुछ और छात्र भी।
कानपुर उन दिनों सिर्फ़ शहर नहीं,
क्रांति की धड़कन था—
कोलकाता के साथ एक और छुपा हुआ केंद्र।

अकेलेपन का जीवन था।
कभी खाना बनता, कभी नहीं।
जब उनके कमरे से चूल्हे की आहट नहीं आती,
तो पास रहने वाली एक महिला
चुपचाप खाना लेकर आ जाती।

आज़ाद दोनों हाथ जोड़कर
नज़रें झुका लेते—
“बहन, कष्ट मत करो।”

आज़ाद कम बोलते थे,
पर उनका मौन भी भारी होता था।

मोहल्ले वाले उस महिला के पति से परेशान थे—
शराब, झगड़ा, मारपीट,
और बच्चों का रोना।

पर महानगर की बेरुख़ी यही सिखाती है—
“ये उनका निजी मामला है।”

एक दिन हद टूट गई।
नशे में धुत पति फिर हाथ उठा रहा था।
तभी सीढ़ियों पर
पहली बार आज़ाद की पदचाप गूँजी।

जो आदमी कभी किसी से नहीं बोलता था,
वो आज सामने खड़ा था।

पति ने अकड़ कर पूछा—
“तुम कौन होते हो बीच में पड़ने वाले?”

आज़ाद की आवाज़ गूँजी—
“ये मेरी बहन है।
आज के बाद अगर हाथ उठाया,
तो हाथ तोड़कर
दूसरे हाथ में पकड़ा दूँगा।”

उस दिन पहली बार
मोहल्ले ने आज़ाद की आवाज़ सुनी।
और उसी दिन
वो तमाशा हमेशा के लिए ख़त्म हो गया।

अब जब उनके कमरे से चूल्हा नहीं जलता,
तो वही आदमी—
कभी बच्चों के हाथ, कभी पत्नी के हाथ
खाना भिजवा देता।

और हर बार की तरह
आज़ाद सिर झुकाकर
मना कर देते।

फरारी के दिनों में
एक रात पूरा शहर घिर चुका था।
नाकाबंदी हर गली में थी।

छिपने के लिए
आज़ाद एक बुज़ुर्ग और उसकी बेटी के घर पहुँचे।

बुज़ुर्ग ने शरण तो दे दी,
पर नींद आँखों से कोसों दूर थी।
घर में जवान बेटी थी।

आज़ाद सब समझ गए।
धीरे से बोले—
“माँ…
अगर आप मुझे भी अंग्रेज सरकार जैसा समझती हैं,
तो अभी पुलिस बुला लीजिए।
इनाम के पैसों से
मेरी बहन की शादी कर दीजिएगा।”

बुज़ुर्ग फूट-फूट कर रो पड़ी—
“पागल कहीं के…
मैं देशद्रोही नहीं,
बस एक माँ हूँ।
और हाँ…
मैं भूल गई थी,
मेरा सामना एक पंडित से है।”

सुबह हुई।
आज़ाद जा चुके थे।

तकिये के नीचे
एक चिट्ठी थी।
बुज़ुर्ग ने बेटी से पढ़वाई।

लिखा था—
“दस हज़ार रुपये—
बहन की शादी के लिए।
सादर चरण स्पर्श,
माताजी
— आपका आज़ाद।”

जेल में भगत सिंह से लोग पूछते थे—
“आज़ाद दिखते कैसे हैं?”

अंग्रेज़ों के खुफ़िया विभाग के पास भी
उनकी कोई साफ़ तस्वीर नहीं थी।
बस एक धुंधली-सी फोटो,
मूँछ पर हल्का ताव देते हुए।

भगत सिंह मुस्कुराए और बोले—
“जिसे कभी हँसते न देखो,
जो गंभीरता ओढ़े रहे,
जिसके इरादे लोहे जैसे हों
और दिल मोम का—
समझ लेना…
वही आज़ाद है।”

ऐसे लोग मरते नहीं।
वो देश की आत्मा में
हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

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Author: sssrknews

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