“महंगे गहनों की शानदार दुकान में, दो फटेहाल बूढ़ों को सबने ठंडेपन से ठुकरा दिया… तभी एक साधारण लड़की ने आगे बढ़कर कहा, ‘पहले आप बैठ जाइए।’ किसी ने नहीं सोचा था कि सिर्फ कुछ ही मिनटों में, यही छोटा सा दयालु व्यवहार उसकी किस्मत को अकल्पनीय तरीके से बदल देगा।”
मुंबई के बांद्रा-कुर्ला इलाके में बने उस चमचमाते लग्ज़री मॉल में हर चीज़ ऐसी लगती थी जैसे वहाँ सिर्फ़ पैसे वालों को ही सांस लेने का हक़ हो। काँच की ऊँची दीवारें, संगमरमर का फर्श, महंगे इत्र की मिली-जुली खुशबू, और हर ब्रांड की दुकान पर झिलमिलाती रोशनी। उसी मॉल की तीसरी मंज़िल पर देश की मशहूर हीरा-जवाहरात श्रृंखला का सबसे बड़ा शोरूम था, जहाँ उस शाम एक खास मुलाकात होने वाली थी।
शहर के बड़े घरों की 8 चुनी हुई युवतियों को वहाँ बुलाया गया था। वजह साफ़ थी, लेकिन किसी ने खुलकर नहीं कही। वे सब आर्यवर्धन मल्होत्रा से मिलने आई थीं — देश की सबसे तेज़ी से बढ़ती कारोबारी समूह का युवा प्रमुख, करोड़ों का मालिक, मीडिया का पसंदीदा चेहरा, और उन परिवारों के लिए सपना, जो अपनी बेटियों की शादी सत्ता और संपत्ति से करना चाहते थे।
लेकिन उसी शाम, उसी शोरूम में, सबसे अजीब दृश्य किसी ने सोचा भी नहीं था।
दरवाज़े के पास खड़े सुरक्षा कर्मी एक पल के लिए उलझ गए जब 2 बूढ़े लोग भीतर चले आए। दोनों की हालत ऐसी थी कि उन्हें देखकर कोई भी यही कहता कि वे सड़क से उठकर आए हैं। बूढ़े आदमी ने फीकी, जगह-जगह से फटी कमीज़ पहन रखी थी, पैरों में घिसी हुई चप्पलें थीं। बूढ़ी औरत की साड़ी पर धूल जमी थी, किनारे उधड़े हुए थे, और कंधे पर पुराना बोरा टंगा था जिसमें शायद बेकार सामान भरा था। उनके बाल बिखरे हुए थे, चेहरों पर थकान थी, और चाल धीमी।
शोरूम के भीतर बैठी युवतियाँ एक साथ उनकी तरफ़ मुड़ीं। कुछ ने भौंहें सिकोड़ लीं, कुछ ने होंठ तिरछे कर लिए, और 2 ने तो सचमुच अपने रुमाल नाक पर रख लिए।
“इन्हें अंदर किसने आने दिया?” मोती जैसे हार पहने एक लड़की ने फुसफुसाकर कहा।
दूसरी ने हंसते हुए जवाब दिया, “शायद इन्हें लगा होगा यहाँ मुफ्त में कुछ मिल जाएगा।”
तीसरी, जो पूरे समय आईने में अपना चेहरा देख रही थी, तेज़ आवाज़ में बोली, “गार्ड, यह कोई धर्मशाला नहीं है।”
लेकिन बूढ़ा दंपति चुपचाप खड़ा रहा। उन्होंने किसी से बहस नहीं की, हाथ नहीं फैलाया, दया नहीं मांगी। वे बस एक-एक चेहरे को गौर से देख रहे थे, जैसे किसी की पहचान कर रहे हों। जैसे वे यहाँ गलती से नहीं, किसी खास वजह से आए हों।
उसी समय काउंटर के पीछे खड़ी एक साधारण सी लड़की सब देख रही थी। उसका नाम सिया था। वह उस शोरूम में पिछले 6 महीने से काम कर रही थी। उसकी वर्दी साफ़ थी, मगर सादी। उसके कानों में छोटे से झुमके थे, हाथों में कोई चमकदार गहना नहीं, और चेहरे पर वह बनावटी आत्मविश्वास भी नहीं था जो बाकी लड़कियों ने ओढ़ रखा था। वह ग्राहकों को देखकर उनके कपड़ों से नहीं, उनकी ज़रूरत से पहचानने की कोशिश करती थी।
उसने देखा कि बूढ़ी औरत हल्का-सा लड़खड़ाई। सिया तुरंत काउंटर से बाहर आई।
“अम्मा जी, आप बैठ जाइए,” उसने पास की कुर्सी खींचते हुए कहा, “लगता है बहुत चलकर आई हैं।”
पूरा शोरूम कुछ पल के लिए शांत हो गया।
एक लड़की ने दबी आवाज़ में कहा, “तुम सच में इन्हें छू रही हो?”
लेकिन सिया ने किसी की तरफ़ देखा तक नहीं। उसने बूढ़ी औरत को संभालकर कुर्सी पर बैठाया, फिर बूढ़े आदमी के लिए भी दूसरी कुर्सी लाई। उसके बाद वह अंदर गई, 2 गिलास पानी लाई, और दोनों के सामने रख दिए।
“धीरे-धीरे पीजिए,” उसने मुस्कुराकर कहा, “यहाँ ठंड ज्यादा है।”
बूढ़ी औरत ने सिया को लंबे समय तक देखा। उसकी आँखों में हैरानी भी थी और किसी गहरी कसौटी का संतोष भी। बूढ़े आदमी ने पानी का गिलास लिया, लेकिन पीने से पहले पूछा, “बेटी, अगर हम कुछ खरीद न सकें तो?”
सिया ने बिना एक पल गंवाए जवाब दिया, “इंसान को बैठने और पानी पीने के लिए कुछ खरीदना नहीं पड़ता।”
कुछ लड़कियाँ अब खुलकर हंस रही थीं। उनमें से एक ने ताना मारा, “लगता है यह नौकरी कम, समाज सेवा ज्यादा करती है।”
दूसरी ने कहा, “ऐसी लड़कियाँ इसी वजह से गरीब रह जाती हैं।”
सिया ने इस बार उनकी ओर देखा, लेकिन कुछ बोली नहीं। उसकी आँखों में अपमान से ज्यादा स्थिरता थी।
उसी क्षण शोरूम के बाहर, काँच की दीवार के पास, एक लंबा आदमी काले बंदगले में खड़ा सब देख रहा था। उसके साथ 2 वरिष्ठ अधिकारी भी थे, मगर वह खुद आगे नहीं बढ़ा। उसकी निगाह सीधे सिया पर थी — उस लड़की पर, जिसने बाकी सबकी तरह घृणा नहीं दिखाई थी।
अंदर बूढ़ी औरत ने पानी का आखिरी घूंट लिया, बूढ़े आदमी की तरफ़ देखा, फिर दरवाज़े की ओर। जैसे उन्हें उसी पल का इंतज़ार हो।
और अगले ही क्षण जो होने वाला था, उस पर वहाँ मौजूद किसी को यक़ीन नहीं होता…






