Daily panchang,वेदों के ज्ञाता रामानुजाचार्यजी की जयंती व्रत कथा महत्व पूजा विधि एवं वास्तुदोष निवारण के लिए अपनाये ये उपाय सुख समृद्धि व स्वास्थ लाभ पाये
🌤️ दिनांक – 22 अप्रैल 2026
🌤️ दिन – बुधवार
🌤️ विक्रम संवत 2083
🌤️ शक संवत -1948
🌤️ अयन – उत्तरायण
🌤️ ऋतु – ग्रीष्म ॠतु
🌤️ मास – वैशाख
🌤️ पक्ष – शुक्ल
🌤️ तिथि – षष्ठी रात्रि 10:49 तक तत्पश्चात सप्तमी
🌤️ नक्षत्र – आर्द्रा रात्रि 10:13 तक तत्पश्चात पुनर्वसु
🌤️ योग – अतिगण्ड सुबह 09:08 तक तत्पश्चात सुकर्मा
🌤️*राहुकाल – दोपहर 12:37 से दोपहर 02:13 तक*
🌤️ सूर्योदय – 06:15
🌤️ सूर्यास्त – 06:59
दिशाशूल – उत्तर दिशा मे
वेदों के ज्ञाता रामानुजाचार्यजी की जयंती व्रत कथा महत्व पूजा विधि एवं वास्तुदोष निवारण के लिए अपनाये ये उपाय सुख समृद्धि व स्वास्थ लाभ पाये आओ जानें
भारत की पवित्र भूमि ने कई संत-महात्माओं को जन्म दिया है। जिन्होंने अपने अच्छे आचार-विचार एवं कर्मों के द्वारा जीवन को सफल बनाया और कई सालों तक अन्य लोगों को भी धर्म की राह से जोड़ने का कार्य किया। ऐसे ही एक महान संत हुए श्री रामानुजम।
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म सन् 1017 में श्री पेरामबुदुर (तमिलनाडु) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम केशव भट्ट था। जब उनकी अवस्था बहुत छोटी थी, तभी उनके पिता का देहावसान हो गया। बचपन में उन्होंने कांची में यादव प्रकाश गुरु से वेदों की शिक्षा ली।
हिन्दू पुराणों के अनुसार श्री रामानुजम का जीवन काल लगभग 120 वर्ष लंबा था। रामानुजम ने लगभग नौ पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें नवरत्न कहा जाता है। वे आचार्य आलवन्दार यामुनाचार्य के प्रधान शिष्य थे। गुरु की इच्छानुसार रामानुज ने उनसे तीन काम करने का संकल्प लिया था। पहला- ब्रह्मसूत्र, दूसरा- विष्णु सहस्रनाम और तीसरा- दिव्य प्रबंधनम की टीका लिखना।
श्रीरामानुजाचार्य बड़े ही विद्वान और उदार थे। वे चरित्रबल और भक्ति में अद्वितीय थे। उन्हें योग सिद्धियां भी प्राप्त थीं। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक ‘श्रीभाष्य’ है। जो पूर्णरूप से ब्रह्मसूत्र पर आधारित है। इसके अलावा वैकुंठ गद्यम, वेदांत सार, वेदार्थ संग्रह, श्रीरंग गद्यम, गीता भाष्य, निथ्य ग्रंथम, वेदांत दीप, आदि उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं।
श्री रामानुजाचार्य ने वेदांत दर्शन पर आधारित अपना नया दर्शन विशिष्ट द्वैत वेदांत गढ़ा था। उन्होंने वेदांत के अलावा सातवीं-दसवीं शताब्दी के रहस्यवादी एवं भक्तिमार्गी अलवार संतों से भक्ति के दर्शन को तथा दक्षिण के पंचरात्र परम्परा को अपने विचार का आधार बनाया।
सोलह वर्ष की उम्र में ही श्रीरामानुजम ने सभी वेदों और शास्त्रों का ज्ञान अर्जित कर लिया और 17 वर्ष की उम्र में उनका विवाह संपन्न हो गया। उन्होंने गृहस्थ आश्रम त्याग कर श्रीरंगम के यदिराज संन्यासी से संन्यास की दीक्षा ली।
वे श्रीयामुनाचार्य की शिष्य-परम्परा में थे। जब श्रीयामुनाचार्य की मृत्यु सन्निकट थी, तब उन्होंने अपने शिष्य के द्वारा श्रीरामानुजाचार्य को अपने पास बुलवाया, किन्तु इनके पहुंचने के पूर्व ही श्रीयामुनाचार्य की मृत्यु हो गई। वहां पहुंचने पर श्रीरामानुजाचार्य ने देखा कि श्रीयामुनाचार्य की तीन अंगुलियां मुड़ी हुई थीं।
रामानुजाचार्य समझ गए श्रीयामुनाचार्य इनके माध्यम से ‘ब्रह्मसूत्र’, ‘विष्णुसहस्त्रनाम’ और अलवन्दारों के ‘दिव्य प्रबंधनम्’ की टीका करवाना चाहते हैं। इन्होंने श्रीयामुनाचार्य के मृत शरीर को प्रणाम किया और उनके इस अन्तिम इच्छा को पूर्ण किया।
मैसूर के श्रीरंगम से चलकर रामानुज शालग्राम नामक स्थान पर रहने लगे। रामानुज ने उस क्षेत्र में 12 वर्ष तक वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार किया। फिर उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए पूरे देश का भ्रमण किया।
श्रीरामानुजाचार्य सन् 1137 ई. में ब्रह्मलीन हो गए।
रामानुजाचार्य के अनुसार भक्ति का अर्थ पूजा-पाठ, किर्तन-भजन नहीं बल्कि ध्यान करना, ईश्वर की प्रार्थना करना है। आज के समय में भी रामानुजम की उपलब्धियां और उपदेश उपयोगी हैं।
मंगलदोष विचार हेतु कुछ शास्त्रीय सूत्र
मेष, कर्क, वृश्चिक और मकर राशि का होकर मंगल चौथे या 7वें स्थान में बैठा हो, तब स्वक्षेत्री और उच्चराशि का संयोग बनने के कारण इस परिस्थिति में मांगलिक दोष नहीं होता है।
शुभ ग्रहों के साथ युति या सम्बन्ध करने वाला मंगल अशुभ कारक नही होता, कर्क लग्न में स्थित मंगल कभी भी अनिष्ट कारक नहीं हो सकता है
मंगल अपने नीच राशि कर्क में स्थित हो अथवा शत्रु क्षेत्री { मिथुन ,कन्या राशि } का हो या अस्तगत हो तो शुभ या अशुभ कोई भी फल नहीं दे सकता है ! अतः ऐसी स्थिति में मंगल अनिष्टकारी नहीं हो सकता है।
प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश इनमें से किसी भी भाव में यदि मंगल स्थित हो, तब वह वर-वधू के मध्य विघटन (तलाक, दुराव, वैवाहिक अनबन) कराता है परन्तु यदि वही मंगल स्वगृही हो,उच्च का हो, मित्रक्षेत्री हो तो दोष कारक नहीं होता है।
द्वितीय भाव में यदि मिथुन या कन्या राशि का हो, द्वादश भाव में यदि वृष या तुला राशि का हो, चतुर्थ भाव में यदि मेष या वृश्चिक राशि का हो, सप्तम भाव में यदि मकर या कर्क राशि का हो,अष्टम भाव में यदि धनु या मीन राशि का हो, तब इन सभी स्थितियों में उन-उन स्थानो में यदि मंगल स्थित हों तब कुण्डली में मंगल दोष नहीं रहता है, साथ ही यदि कुम्भ अथवा सिंह राशि में अनिष्ट स्थान (6,8,12 भाव में ) स्थित हो तब उस स्थान में भी स्थित मंगल से मांगलिक दोष लागू नहीं होता है।
यदि केन्द्र और त्रिकोण में शुभ ग्रह स्थित हों तथा 3-6-11 स्थानों में पाप ग्रह हों और सप्तम भाव का स्वामी सप्तम भाव में ही मौजूद हो तब मांगलिक जन्य दोष स्वतः समाप्त हो जाता है।
जिस वर-कन्या की कुण्डली में चौथे, सप्तम, अष्टम, द्वादश, आदि अरिष्ट कारक स्थानों में से किसी एक स्थान में मंगल गुरु के अथवा चंद्रमा के साथ युति कर रहा हो, अथवा चंद्रमा मंगल से केंद्र में स्थित हो तब ऐसी स्थिति में भी मांगलिक दोष नहीं बनता है।
जिस कन्या का 7वां – 8वां स्थान पाप ग्रह से रहित हों तथा उन दोनों स्थानों में शुभ ग्रह स्थित हों अथवा उन स्थानों पर शुभग्रह की दृष्टि पड़ रही हों, तब ऐसी ग्रह स्थिति वाली कन्या अच्छे स्वभाव वाली, पतिव्रता, कुलवन्ती आदि अनेक गुणों से युक्त, अपने पति के अनुकूल दाम्पत्य जीवन व्यतीत करती है और दीर्घायु युक्त होती है साथ ही 9वें स्थान में यदि शुभ ग्रह स्थित हो तब वह अच्छे पुत्र पौत्रों से युक्त होकर सुखी रहती है।
वर-वधू की जन्म कुण्डली के किसी भी अनिष्ट स्थान में स्थित मंगल यदि वक्री हो या नीच कर्क राशि में स्थित हो अथवा शत्रु { मिथुन – कन्या } राशि में स्थित हो या अस्तगत हो तोब इस प्रकार से कुण्डली में स्थित मंगल अनिष्ट कारक नहीं हो सकता है।
यदि वर-वधू दोनों की कुण्डली में लग्न से, चन्द्रमा से और शुक्र से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम एवं द्वादश इन छः स्थानों में से किसी भी स्थान में यदि मंगल एक ही प्रकार से मौजूद हो अर्थात वर की कुण्डली में जिस स्थान में स्थित हो उसी स्थान में कन्या की कुण्डली में भी स्थित हो तब उन दोनों का दाम्पत्य सुख चिरस्थाई रहता है, धन -धान्य पुत्र-पौत्रादि की भी अभिवृद्धि करता है और दोनों सदा सुखी रहते हैं ! किन्तु यदि वर-वधू में से किसी एक ही की कुण्डली मे उक्त प्रकार से मंगल बैठा हो और उसके जोड़े की दूसरी कुण्डली में उससे भिन्न-भिन्न स्थानों में बैठा हो तो अनिष्टकारी, विपरीत फलदायी मृत्यु भय कारक व पुत्र नाशक होता है।
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वास्तुदोष निवारण के लिए अपनाये ये उपाय सुख समृद्धि व स्वास्थ लाभ पाये
👉घर का मुख्य द्वार किसी अन्य के घर के मुख्य द्वार के ठीक सामने न बनाएं।
👉घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगाएं और आंगन का कुछ भाग मिट्टी वाला भी रखें, शुक्र शुभ होता है।
👉ईशान कोण किसी भी मकान का मुख कहलाता है। इस कोण को सदैव पवित्र रखना चाहिए।
👉रसोई घर मुख्य द्वार के ठीक सामने न बनाएं। ऐसा होने से अतिथियों का आवागमन होता रहता है। पूजागृह, शौचालय व रसोईघर के दरवाजे एक साथ न बनवाएं।
👉विद्युत उपकरण आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में रखें।
👉घर में टूटे-फूटे बतरन, टूटा दर्पण, टूटी चारपाई न रखें इनमें दरिद्रता का वास होता है, रात्रि में बर्तन झूठे न रखें।
👉दर्पण, वास बेसिन व नल परब, उत्तर या ईशान कोण में रखें।
👉सैप्टिक टैंक वायव्य कोण या आग्नेय कोण में रखें।
👉किसी भी मकान में दरवाजे व खिड़कियां ग्राउण्ड फ्लोर में ही अधिक रखें। उसके बाद प्रथम, द्वितीय मंजिलों में कम करते जाएं।दरवाजे के उपर ही दरवाजा आये।
👉बच्चों के अध्ययन की दिशा उत्तर या पूर्व होती है, यदि बच्चे इन दिशाओं की ओर मुंह करके अध्ययन करें तो स्मृति बनी रहती है।
👉घर में पोछा लगाते समय पानी में सांभर नमक या सेंधा नमक डाल लें, इससे कीटाणु पैदा नहीं होंगे।
👉कभी भी बीम या शहतीर के नीचे न बैठें। इससे देह पीड़ा (खासकर सिर दर्द) होती है।
👉जल निकास उत्तर, पूर्व, में शुभ होती है।
👉यदि घर में घड़ियां हैं और वे ठीक से नहीं चल रही हैं तो उन्हें ठीक करा लें।
👉घड़ी गृहस्वामी के भाग्य को तेज या मंदा करती है।
👉पूजागृह व शौचालय सीढ़ियों के नीचे न बनाएं।
👉वास्तुदोष निवारण का अतिसुगम उपाय यह है कि घर में वास्तु पूजन विधान हवन करवाएं।वास्तु आचार्य को दिखाये।
👉शयन करते समय सिरहाना पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर रखने से धन व आयु की बढ़ोत्तरी होती है ।
👉उत्तर की ओर सिरहाना रखने से आयु की हानि होती है ।पूर्व की ओर सिरहाना रखने से विद्या, दक्षिण की ओर रखने से धन व आयु की बढोत्तरी होती है।
👉अन्नागार, गौशाला, रसोईघर, गुरू स्थल व पूजागृह जहां हो उसके ऊपर शयनकक्ष न बनाएं। यदि वहां शयनकक्ष होगा तो धन-संपदा का नाश हो जाएगा।
👉सवेरे पूर्व दिशा में व रात्रि में पश्चिम दिशा में मल-मूत्र विसर्जन करने से आधा सीसी का रोग होहोने की सम्भावना होती है।
👉घर में बड़ी मूर्ति नहीं रखनी चाहिए। यदि मूर्ति रखनी है तो वह एक बालिस्त जितनी ही होनी चाहिए, अर्थात बारह अंगुल जितनी बड़ी हो।
👉घर के पूजन कक्ष में किसी भी देवता की एक से अधिक मूर्ति न रखें ।
👉पूर्व की ओर मुंह करके भोजन करने से आयु, दक्षिण की ओर मुंह करके भोजन करने से प्रेत, पश्चिम की ओर मुंह करके भोजन करने से रोग,उत्तर की ओर मुंह करके भोजन करने से धन व आयु की प्राप्ति होती है ।
👉घर में सात्त्विक प्रवृत्ति के पक्षियों के जोड़े वाला चित्र रखें, इससे परिवार का वातावरण माधुर्य पूर्ण रहेगा।
👉घर के मुख्य द्वार पर नीबू या संतरे का पौधा लगाएं, ये पौधे संपदा बढ़ाने वाले होते हैं।
👉घर के आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में सिक्कों वाला धात्विक कटोरा अर्थात् धातु का कटोरा रखें, और उसमें ऐसे सिक्के जो मार्ग में पड़े मिले हों डालते जाएं। ऐसा करने से घर में आकस्मिक रूप से धनागम होने लगेगा।
👉घर के मुख्य द्वार पर बाहर की ओर पौधे लगाएं। परिवार के सदस्यों में माधुर्य भाव बना रहे, इसके लिए सभी सदस्यों का एक हंसमुख सामूहिक चित्र ड्राइंगरूम में लगाना चाहिए।
👉घर में झाडू व पोंछा खुले स्थान पर न रखें । खासकर भोजन कक्ष में झाडू नहीं रखनी चाहिए। इससे अन्न व धन की हानि होती है।
👉रात्रि में झाडू को उलटी करके घर के बाहर मुख्य दीवार के सामने रखने से चोरों का भय नहीं रहता।
👉पति-पत्नी में माधुर्य संबंधों के लिए शयनकक्ष के नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में प्रेम व्यवहर करते पक्षियों का जोड़ा रखना चाहिए।
👉शौच से निवृत्त होने के बाद शौचालय का द्वार बंद कर दें, यह नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
👉दिन में एक समय परिवार के सभी सदस्यों को एकसाथ भोजन करना चाहिए। इससे परस्पर
संबंधों में प्रगाढ़ता आती हैं।
कैसे बदले दुर्भाग्य को सौभाग्य में
23 अप्रैल 2026 गुरुवार को रात्रि 08:57 से 24 अप्रैल सूर्योदय तक गुरुपुष्यामृत योग है।
बरगद के पत्ते पर गुरुपुष्य या रविपुष्य योग में हल्दी से स्वस्तिक बनाकर घर में रखें |
धन और स्वास्थ्य की कमी दूर करने के लिए
जिन लोगों के घर में धन और स्वास्थ्य सम्बन्धी कमी का एहसास नित्य होता है, पैसों की भी कमी रहती है और स्वास्थ्य में भी कभी कोई बीमार तो कभी कोई बीमार रहता हो उनके लिए पद्म पुराण में बताया है- वैशाख मास का एक प्रयोग | वैशाख मास की बहुत महिमा बताई है | वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को पद्म पुराण में उसको शर्करा सप्तमी कहा गया है और वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि इस बार 23 अप्रैल 2026 गुरूवार को है। इस दिन पानी में सफ़ेद तिल मिलाकर भगवन्नाम सुमिरन करते हुए स्नान करें | फिर सूर्य भगवान की ओर मुख करके सूर्यदेव और माँ गायत्री को प्रणाम करें | सूर्य भगवान को इन मंत्रों से प्रणाम करें-
ॐ नम: सवित्रे | ॐ नम: सवित्रे | ॐ नम: सवित्रे |
विश्व देव मयो यस्मात वेदवादी ति पठ्यसे |
त्वमेवा मृतसर्वस्व मत: पाहि सनातन ||
ये मंत्र बोलकर सूर्यनारायण को व अन्य देवों को मन ही मन प्रणाम करें | अर्घ्य तो देते ही हैं | सूर्य भगवान को जो अर्घ्य ना दें वो आदमी हिंदू कहलाने के लायक नहीं है |
ये कर लिया फिर दूसरे दिन को हो सके तो अपने हाथों से दूध चावल की खीर बनाकर उसमें थोड़ा घी डालकर.. थोड़ा-सा भले ज्यादा ना डाल सके एक चम्मच डाल दें और किसी को .. १-२ व्यक्तियों को खिला दें | कोई ब्राह्मण हो, कोई साधू-महात्मा हो | खीर के साथ थोड़ा रोटी सब्जी दे दें किसी १ व्यक्ति को भी ।
अगर ब्राह्मण न मिले, कोई साधू ना मिले तो छोटी बच्चियों को खिला दें | कन्या को खिला दो तो भी अच्छा है | ऐसा करने से ऐश्वर्य और आरोग्य दोनों की वृद्धि होती है |
वैशाख शुक्ल सप्तमी को ही सुख और आरोग्य की वृद्धि के लिए पद्म पुराण में इस सप्तमी को ‘कमल सप्तमी’ भी कहा गया है | हो सके तो उस दिन १ कमल का फूल मिल जाये तो लोटे में जल भरा और कमल का पुष्प लोटे में डाल दिया और सूर्य भगवान को अर्घ्य दिया | कमल ना मिले तो कमल की जगह अक्षत भी डाल सकते हैं | कुम – कुम वाले अक्षत कर लिए और लोटे में डाल दिए क्योंकि वैदिक कर्मकांड में जो भी वस्तु उपलब्ध ना हो उस स्थान पर अक्षत लेने का विधान है | ये अपने देश के ग्रंथो की बड़ी दया है हम पर | ग्रंथो के रचयिता भगवान वेदव्यासजी की भी बड़ी कृपा है हम पर | इस तीर्थ धाम में हम भगवान वेदव्यासजी को भी बार-बार प्रणाम करते हैं | तो कमल ना मिला तो चावल तोष सबके घर में होते ही है | कुम -कुम वाले चावल लोटे में डाल दिए और सूर्य भगवान को जल देते समय ये मंत्र बोलेंगे, साथ में सब बोलना –
नमस्ते पद्म हस्ताय नमस्ते विश्व धारणे ||
दिवाकर नमस्तुभ्यम प्रभाकर नमोस्तुते ||
वैशाख शुक्ल सप्तमी का खूब-खूब फायदा उठाइये और उस दिन जप भी खूब करिये गुरु मंत्र का |
भविष्योत्तर पुराण में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को ‘निम्ब सप्तमी’ भी कहते हैं | उस दिन सूर्य देव को प्रणाम करके नीम् के पत्ते भी खाएं तो रोगों से मुक्ति प्राप्त होती है | जिनके शरीर में बीमारियाँ रहती हो पेट की, सिर दर्द की कोई भी तकलीफ रहती हो और वो कमबख्त मिट नहीं रही है, बड़ा परेशान कर रही है वो तकलीफ तो आप नीम के पत्ते वैशाख शुक्ल सप्तमी को सूर्य भगवान को अर्घ्य देकर प्रणाम करके फिर ये मंत्र बोलते हुए नीम के पत्ते खाएं । ये मंत्र बोलकर नीम के पत्ते खाने से आरोग्य की प्राप्ति हो सकती है हम दृढता से करें –
आजकल लोग अंग्रेजी बडबड करते हैं पर देव भाषा संस्कृत है | वो घर में बोली जानी चाहिए थी पर अब संस्कृत में आप और हम नहीं बोल सकते तो कम से कम ये संस्कृत के वैदिक-पौराणिक मंत्र बोलते हुए ये नियम करें तो घर में भी सुख-शांति बढती है |
निम्ब पल्लव भद्रनते सुभद्रं तेस्तुवई सदा |
ममापि कुरु भद्रं वै त्राशनाद रोगा: भव ||
ये बोलकर नीम के पत्ते खा लेना | कोमल-कोमल धो कर खाना और उस दिन हो सके तो रात को पलंग पर नहीं धरती पर बिस्तर बिछाकर कम्बल आदि बिछाकर उस पर आराम करना| जिनको कोई भी रोग है वो यह करें |
शिव_भस्म क्यों लगाते हैं
महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा आप किसको प्रणाम करते रहते हैं?
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शिव जी ने अपनी धर्मपत्नी पार्वती जी से कहते हैं की, हे देवी! जो व्यक्ति एक बार ‘राम’ कहता है उसे मैं तीन बार प्रणाम करता हूं।
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पार्वती जी ने एक बार शिव जी से पूछा आप श्मशान में क्यूं जाते हैं और ये चिता की भस्म शरीर पे क्यूं लगते हैं?
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उसी समय शिवजी पार्वती जी को श्मशान ले गए। वहां एक शव अंतिम संस्कार के लिए लाया गया। लोग ‘राम’ नाम सत्य है कहते हुए शव को ला रहे थे।
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शिव जी ने कहा की देखो पार्वती इस श्मशान की ओर जब लोग आते हैं तो ‘राम’ नाम का स्मरण करते हुए आते हैं।
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और इस शव के निमित्त से कई लोगों के मुख से मेरा अतिप्रिय दिव्य ‘राम’ नाम निकलता है उसी को सुनने मैं श्मशान में आता हूँ…
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और इतने लोगो के मुख से ‘राम’ नाम का जप करवाने में निमित्त बनने वाले इस शव का मैं सम्मान करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, और अग्नि में जलने के बाद उसकी भस्म को अपने शरीर पर लगा लेता हूँ।
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‘राम’ नाम बुलवाने वाले के प्रति मुझे इतना प्रेम है।
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एक बार शिवजी कैलाश पर पहुंचे और पार्वती जी से भोजन मांगा। पार्वती जी विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहीं थी।
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पार्वती जी ने कहा अभी पाठ पूरा नही हुआ, कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए।
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शिव जी ने कहा की इसमें तो समय और श्रम दोनों लगेंगे।
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संत लोग जिस तरह से सहस्र नाम को छोटा कर लेते हैं और नित्य जपते हैं वैसा उपाय कर लो।
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पार्वती जी ने पूछा वो उपाय कैसे करते हैं? मैं सुनना चाहती हूँ।
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शिव जी ने बताया, केवल एक बार ‘राम’ कह लो तुम्हे सहस्र नाम, भगवान के एक हजार नाम लेने का फल मिल जाएगा।
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एक ‘राम’ नाम हजार दिव्य नामों के समान है। पार्वती जी ने वैसा ही किया।






